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भारत के बेहतर प्रदेशों में नए जन्म योरप के देशों जितने कम हो चुके हैं!
सुनील कुमार ने लिखा है
07-Jun-2026 3:50 PM
भारत के बेहतर प्रदेशों में नए जन्म योरप के देशों जितने कम हो चुके हैं!

दुनिया के सबसे चर्चित कारोबारी, और अब शेयर बाजार में पूंजी जुटाने के लिए दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ लेकर आ रहे एलन मस्क ने कल भारत के बारे में एक ट्वीट किया है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने एक अमरीकी समाचार स्रोत की पोस्ट दुबारा डाली है जिसमें भारत की आबादी की घटती हुई बढ़ोत्तरी दिख रही है। उन्होंने अपनी तरफ से लिखा है कि कुछ लोगों को आज लग रहा है कि भारत की जन्मदर रिप्लेसमेंट रेट से नीचे आ गई है। लेकिन जानकार जानते हैं कि यह तो कई बरस पहले ही हो चुका था।

एलन मस्क से परे, भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक ताजा आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली राज्य, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और आंध्रप्रदेश ये प्रति महिला बच्चों के मामले में फिनलैंड और नॉर्वे तक पहुंच चुके हैं। तेलंगाना भी नॉर्वे के करीब है। दूसरी तरफ राजस्थान, उत्तरप्रदेश, और बिहार में प्रति महिला बच्चों की संख्या बांग्लादेश से भी अधिक है। पूरे भारत में यह आंकड़ा पिछले एक दशक में ही 2.3 से घटकर 1.9 हो चुका है। जनसंख्या-शब्दकोष की भाषा में कहें, तो भारत में अब आबादी उतनी ही बनी रहने लायक नए जन्म नहीं हो रहे हैं। मौजूदा आबादी की वजह से अभी कुछ अरसा जनसंख्या बढ़ती दिखेगी, लेकिन दुनिया में आबादी को स्थिर करने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चों का जन्म जरूरी होता है, और भारत उसके नीचे आ चुका है।

2019 के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनसंख्या विस्फोट की चर्चा की थी, उस वक्त भी कई जनसंख्या-विशेषज्ञों ने कहा था कि भारत जनसंख्या-विस्फोट के दौर से निकल चुका है, अब यह बात प्रासंगिक नहीं रह गई है। फिर भी प्रधानमंत्री ने वह बात एक ऐतिहासिक मौके पर कही थी, इसलिए जनसंख्या के संदर्भ में हम उसे कम महत्वपूर्ण नहीं आंकते। उसका विश्लेषण करने और तथ्य ढूंढने पर पता लगता है कि 1990 के दशक में भारत का टीएफआर (टोटल फर्टिलिटी रेश्यो) यानी प्रति महिला पैदा होने वाले बच्चे, यह आंकड़ा करीब 4 था। पन्द्रह बरसों के भीतर, 2005-06 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3 के मुताबिक यह 2.7 तक पहुंच गया था। इसके दस बरस बाद के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के मुताबिक यह लगभग 2.2 हो गया था। 2019 में जब यह भाषण हुआ, तब भारत आबादी स्थिरीकरण के स्तर, 2.1, के बहुत करीब पहुंच गया था। इस भाषण के बाद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) में टीएफआर 2.0 दर्ज हुआ। मतलब यह कि जिस वक्त प्रधानमंत्री इसे विस्फोट पा रहे थे, उस दिन वह स्थिरीकरण से कम आबादी-बढ़ोत्तरी दर हो चुकी थी। उसी समय जनसंख्या विशेषज्ञ यह हिसाब लगा रहे थे कि अगले किस सर्वे में, कितने दिनों में, बच्चों का जन्म आबादी स्थिरीकरण से कम हो जाएगा। और अगले ही बरस के सर्वे में यह हो चुका था।

कुल मिलाकर मतलब यह कि आबादी के बढ़ते हुए आंकड़े हमेशा ही भविष्य की बढ़ती हुई आबादी का संकेत नहीं रहते। कुछ बरस या कुछ दशक बाद जाकर यह आबादी गिरने वाली भी हो सकती है। अब जैसे भारत के राज्यों को अलग-अलग करके देखें, तो जनसंख्या स्थिर रखने के लिए जरूरी, प्रति महिला 2.1 बच्चों से भारत नीचे आ चुका है, अब देश में प्रति महिला कुल 1.9 बच्चे पैदा हो रहे हैं। दिल्ली में तो एक महिला के 1.2 बच्चे ही हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ दूसरे राज्यों को भी देखने की जरूरत है। भारत का दक्षिणी हिस्सा योरप के करीब पहुंच चुका है, केरल, और तमिलनाडु में यह आंकड़ा 1.3 तक आ गया है, तेलंगाना में 1.5 है, पश्चिम बंगाल और आंध्र में भी यह आबादी स्थिर रखने की जरूरत से खासा नीचे आ चुका है। दूसरी तरफ इस देश में आबादी का संतुलन राजस्थान (2.3), यूपी (2.6), और बिहार (2.9), (बच्चे प्रति महिला) की वजह से राष्ट्रीय औसत 1.9 बना हुआ है।

अब हमने यह समझने की कोशिश की कि जिन राज्यों में आबादी-बढ़ोत्तरी गिरती जा रही है, उन राज्यों में तो प्रति व्यक्ति आय अधिक दिख रही है, जैसे दिल्ली, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, आंध्र। दूसरी तरफ आबादी बढ़ाने के लिए बदनाम तीन राज्यों, बिहार, यूपी, और राजस्थान में औसत आय दक्षिण के इन राज्यों और दिल्ली के मुकाबले बहुत कम है। क्या इसका एक मतलब यह निकाला जाए कि भारत में आबादी अभी जो कायम बने रहने के आसार हैं, वे आसार गरीब पैदा करने वाले राज्यों की मेहरबानी से हैं? क्या पैदा होने वाली बहुतायत गरीब राज्यों की गरीब आबादी रहेगी, और उससे देश को कुछ हासिल नहीं हो सकेगा?

प्रधानमंत्री ने जिसे जनसंख्या विस्फोट कहा था, वह बात जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से तो सही नहीं थी, लेकिन हम उस बात का एक दूसरा आर्थिक-सामाजिक विस्तार करके जब देखते हैं तो लगता है कि यह आबादी के आंकड़ों का विस्फोट चाहे न हो, यह देश के भीतर गरीब आबादी में एक विस्फोट जरूर है क्योंकि यूपी-बिहार, और राजस्थान प्रति व्यक्ति आय में एकदम नीचे हैं, और जिस प्रदेश में भी आबादी बढ़ती है, वहां पर गरीब तबके के भीतर बच्चे अधिक बढ़ते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि दक्षिण भारत के राज्यों से पढ़े-लिखे और हुनरमंद लोग दूसरे देशों को अधिक जाएंगे, और भारत के भी दूसरे प्रदेशों में बेहतर कमाई वाले कामकाज के लिए जाएंगे। दूसरी तरफ यूपी-बिहार, राजस्थान से गरीब मजदूर देश के भीतर ही दूसरे प्रदेशों में अधिक जाएंगे, जहां पर उनकी खुद की आबादी बढऩा रूक जाएगी, और फिर धीरे-धीरे घटती भी जाएगी।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने संपादकीय, और इस साप्ताहिक कॉलम में बार-बार यह लिखते हैं कि किसी भी देश में वहां की आबादी बोझ नहीं हो सकती, अगर सरकार इतनी कल्पनाशील हो कि वह आबादी को काम के लायक बनाएं। वही आबादी देश पर बोझ रहती है जिसे सरकारें काम नहीं दे पातीं। देश मेें आबादी के अलग-अलग आयु वर्ग के आंकड़ों को लेकर भारत को बड़ा गर्व रहता है कि उसके पास नौजवान वर्क फोर्स का अनुपात सबसे अधिक है। अब सवाल यह उठता है कि यह वर्क फोर्स किस तरह का काम करने के लायक है?

 

जब हमने चीन में नौजवान कामगार तैयार करने की वहां की सरकार की नीति और रणनीति को देखा, तो यह साफ दिखता है कि भारत को उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। भारत में जरूरत मशीन चलाने वालों की, कारीगरों की लाखों की संख्या में हैं। दूसरी तरफ इस देश में दसियों लाख डिग्रीधारी लोग बेरोजगार भटक रहे हैं, और उनकी बकाया जिंदगी भी उनके लिए कोई काम नहीं रहेगा। भारत में आईटीआई जैसे तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों को दूसरे दर्जे का माना जाता है, न मां-बाप बच्चों को वहां भेजना चाहते, न बच्चे कारीगर और हुनरमंद मैकेनिक बनना चाहते। भारत इतने इंजीनियर उगल चुका है, कि जिनके लायक काम अगले कई बरस पैदा नहीं होगा। दूसरी तरफ चीन में तकनीशियन बनाए जा रहे हैं, और वहां ट्रेनिंग स्कूलों का बड़ा सीधा रिश्ता कारखानों से जुड़ा रहता है। जो कारखाने आने वाले हैं, उनके लिए हुनरमंद कामगार तैयार करना पहले से शुरू हो जा रहा है। भारत में शिक्षा विभाग, और उद्योग विभाग के बारे में एक एआई ने कहा कि वे अलग-अलग ग्रहों पर बसते हैं।

इन सब बातों को देखें, तो यह समझ पड़ता है कि भारत किसी तरह की जनसंख्या विस्फोट का शिकार नहीं है, लेकिन सबसे गरीब प्रदेशों में बढ़ती हुई गरीब आबादी उन प्रदेशों के लिए, और बाकी देश के लिए भी एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। राष्ट्रीय स्तर पर आबादी आज भी एक बिल्कुल ही उल्टी फिक्र का सामान बन गई है कि अगर यह आंकड़ा 1.9 से और नीचे जाएगा, तो कुछ दशकों में भारत की आबादी गिरती चली जाएगी। और वह नौबत आने के पहले भी जिस नौजवान आबादी पर भारत गर्व करता है, आबादी का वह आयु वर्ग अगर बेहतर तैयारी नहीं कर पाएगा, तो वह देश के भीतर ही मजदूरी के कामों के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश भटकते रहेगा। यह देश जनसंख्या विस्फोट का शिकार नहीं है, यह देश आबादी के बेहुनर, और अनुत्पादक होने के विस्फोट का शिकार है, और इसके लिए जनता नहीं सरकार जिम्मेदार और जवाबदेह है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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