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कहा- बिना सुनवाई वित्तीय बोझ नहीं डाला जा सकता, आयोग को दो माह में नया आदेश देने के निर्देश
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 3 जून। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जिंदल स्टील लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए 153.55 करोड़ रुपये की वसूली संबंधी नोटिस पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की खंडपीठ ने कहा कि किसी पक्ष को सुने बिना उस पर वित्तीय दायित्व नहीं थोपा जा सकता।
मामला वर्ष 2011-12 और 2012-13 के दौरान बिजली आपूर्ति का है। उस समय प्रचलित दरों के आधार पर भुगतान किया गया था। बाद में 2014 में टैरिफ निर्धारण और ट्रू-अप प्रक्रिया के दौरान बिजली को नॉन-फर्म पॉवर मानते हुए दर घटाकर 1.50 रुपये प्रति यूनिट कर दी गई। इसके आधार पर वितरण कंपनी ने जिंदल स्टील से 153.55 करोड़ रुपये वापस करने का नोटिस जारी किया था और ओपन एक्सेस एनओसी भी रोक दी थी।
जिंदल स्टील ने अदालत में दलील दी कि टैरिफ निर्धारण और अपीलीय अधिकरण की कार्यवाही में उसे पक्षकार ही नहीं बनाया गया था। ऐसे में बिना सुनवाई इतनी बड़ी राशि की वसूली प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
खंडपीठ ने माना कि जब किसी निर्णय का सीधा वित्तीय प्रभाव किसी विशेष संस्था पर पड़ता है, तब व्यक्तिगत सुनवाई अनिवार्य हो जाती है। अदालत ने 7 जुलाई 2016 की वसूली नोटिस और ओपन एक्सेस सुविधा निलंबन से जुड़े पत्रों को निरस्त कर दिया।
साथ ही छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत विनियामक आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह दो माह के भीतर जिंदल स्टील को सुनवाई का अवसर देकर नया आदेश पारित करे। तब तक कंपनी के खिलाफ कोई वसूली या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
मामला गुड़ाखू लाइन स्थित शिवाय कॉम्प्लेक्स की दुकान क्रमांक-09 से जुड़ा है। किरायेदार मोहनलाल बजाज पिछले 37 वर्षों से वहां होजरी व्यवसाय चला रहे थे।
दुकान मालिक शिव कुमार चौरसिया और रमेश कुमार चौरसिया ने छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम, 2011 के तहत बेदखली की मांग की थी। उनका कहना था कि प्लास्टिक कारोबार के विस्तार के लिए दुकान की आवश्यकता है और उनके पास अन्य उपयुक्त परिसर उपलब्ध नहीं है।
किरायेदार ने 2017 के समझौते, 3 लाख रुपये सुरक्षा राशि और नियमित किराया भुगतान का हवाला देते हुए दावा किया कि बेदखली का उद्देश्य अधिक किराया वसूलना है। हालांकि हाईकोर्ट ने मकान मालिक की आवश्यकता को वास्तविक मानते हुए याचिका खारिज कर दी।


