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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ताकत ही कानून है, ट्रम्प हो, या रायपुर का मॉल..
सुनील कुमार ने लिखा है
25-May-2026 4:04 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : ताकत ही कानून है, ट्रम्प हो, या रायपुर का मॉल..

भारत के अलग-अलग राज्यों में सार्वजनिक नियमों पर अमल का अलग-अलग हाल रहता है, देश के कई प्रदेशों में बिना हेलमेट दुपहिया चलाने वाले, या दुपहियों पर बैठने वाले का तुरंत चालान होता है, लेकिन कई दूसरे प्रदेश या शहर देश भर में लागू इस नियम पर अमल पर कोई दिलचस्पी नहीं रखते। इसी तरह शहरी विकास के नियम कोई प्रदेश मानते हैं, कोई प्रदेश नहीं मानते हैं। कहने के लिए हर प्रदेश बड़े कड़े नियम बनाकर चलते हैं, और नियम जितने कड़े रहते हैं, वसूली-उगाही की गुंजाइश उतनी ही अधिक हो जाती है। मतलब यह कि दिखावे के लिए हाथी दांत बहुत बड़े-बड़े बनाए जाते हैं, और फिर हाथी दांत जैसे कीमती दाम वसूलने के लिए दिखावे के ऐसे नियमों का इस्तेमाल होता है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही हम देखते हैं कि ताकतवर लोग अपने पेट्रोल पंप, रेस्त्रां, या मॉल के सामने डिवाइडर काटकर आने-जाने का रास्ता बना लेते हैं, उन पर कोई नियम लागू नहीं होता। राजधानी रायपुर में ही एक एक्सप्रेस हाईवे है, जिसके किनारे बसे हुए छोटे-छोटे बहुत गरीब घरवालों को भी उस सडक़ पर आने की छूट नहीं रहती, क्योंकि तेज रफ्तार ट्रैफिक में वे कुचल न जाएं। सरकार ने इसके लिए नियम भी घोषित किया हुआ है, लेकिन अभी एक मॉल के लिए इस एक्सप्रेस हाईवे पर रास्ता खोल दिया गया। इसके पहले शहर का, या प्रदेश का एक बड़ा कुख्यात बिल्डर अपनी एक महंगी कॉलोनी का रास्ता सरकारी नियमों के खिलाफ इस सडक़ पर खोल चुका था, उसके खिलाफ भारी शिकायत हुई, लोग अस्पताल तक पहुंचे, और तब जाकर वह रास्ता अभी रोका गया है, यह अलग बात है कि दसियों लाख से बनाए गए अवैध गेट का ढांचा अब तक खड़ा है। प्रदेश का कोई भी शहर हो, ताकतवर नेताओं के पेट्रोल पंपों के सामने सारे नियम-कायदे तोडक़र डिवाइडर काट दिए जाते हैं, ताकि नेताजी के धंधे में कोई कमी न रहे। रायपुर के ही कपड़ा बाजार में कारोबारियों ने नियमों के खिलाफ जाकर पार्किंग की जगह पर दुकानों के दरवाजे खोल दिए थे, उसके खिलाफ म्युनिसिपल और प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की, लेकिन बाजार की ताकत नेताओं तक इतनी थी, कि इस अवैध धंधे को फिर खोल दिया गया।

लोगों की अगर ताकत रहे, तो वे सरकार के नियमों को चुइंगम की तरह चबाकर जनता के मुंह पर थूक सकते हैं। इसके लिए सिर्फ नेता होना जरूरी नहीं रहता, परिवार के किसी दूसरे के नाम से कारोबार करने वाले अफसर भी खेत की जमीन पर शराब कारोबार कर सकते हैं, कोटवार की जमीन पर कब्जा कर सकते हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म को कूड़ेदान में फेंक सकते हैं। राजनीति या पैसों की ताकत से बड़ा कोई संविधान नहीं होता। अवैध कब्जे और अवैध निर्माण, अवैध इस्तेमाल के इतने किस्म के मामले दस-दस, बीस-बीस बरस से अदालती आदेशों का मुंह चिढ़ाते हुए खड़े रहते हैं, कि अगर दस्तखत करने वाले जज उन्हें देख लें, तो हीनभावना से ग्रस्त होकर खुदकुशी ही कर लें।

आज जिस तरह की गुंडागर्दी पूरी दुनिया में ट्रम्प दिखा रहा है, जिससे यह साबित हो रहा है कि ताकत ही संविधान रहता है, अगर बेहिसाब ताकत रहे, तो एक अकेला व्यक्ति ही संयुक्त राष्ट्र रहता है। कुछ उसी तरह का हाल भारत के प्रदेशों में रहता है जहां पर शहरीकरण के, जमीन के इस्तेमाल के, निर्माण के नियम ताकतवर लोगों की जेब में रहते हैं। आम जनता की जिंदगी चाहे कितनी ही बर्बाद क्यों न होती हो, ताकतवर का कारोबार कभी बंद नहीं होता। शायद इसीलिए जो सबसे बड़े भू-माफिया रहते हैं, वे सरकार और राजनीति के सबसे बड़े लोगों को अपनी कॉलोनियों में सबसे पहले मिट्टी के मोल जमीनें देकर उसी तरह का प्रोटेक्शन खरीदते हैं, जिस तरह का प्रोटेक्शन पेशेवर माफिया पुलिस से खरीदता है। अब इसके साथ-साथ एक बात और जुड़ गई है कि धर्म के नाम पर प्रवचन करने वाले, या चमत्कारी पाखंडी लोगों के बड़े-बड़े आयोजन करवाकर भी अलग-अलग किस्म के माफिया प्रोटेक्शन खरीदते हैं। वैसे इसमें बहुत नया कुछ नहीं है क्योंकि धर्म को जुर्म से कोई अधिक परहेज तो कभी रहा भी नहीं। माफिया पर बनी हुई सबसे बड़ी फिल्म, गॉडफादर देखें तो समझ पड़ता है कि दुनिया के सबसे बड़े माफिया सरगना भी किस तरह धर्मालु रहते थे, आज भी रहते हैं। धर्म और धर्मगुरू, प्रवचनकर्ता, और आध्यात्मिक गुरू जैसे मुखौटों की आड़ में बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार चलते हैं, और हमने तो कई ऐसे अतिधार्मिक अफसर देखे हैं, जिनके घर-दफ्तर में एक स्पीकर पर धार्मिक आवाज गूंजती ही रहती थी, बाद में वे दफ्तर में ही नगद रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ाए, अपनी धार्मिक पकड़ के चलते जमानत के बाद उसी कमाऊ कुर्सी पर जमे रहे, रिटायर हो जाने के बाद फिर से उसी कुर्सी पर नियुक्त हो गए। अपनी धार्मिक पकड़ की वजह से वे सरकार के लिए ऐसे जरूरी हो गए दिखते थे कि वे नहीं रहेंगे, तो अगली सुबह का सूरज नहीं निकलेगा।

ऐसी अलग-अलग कई किस्म की ताकतों के चलते नियम-कायदे तोडक़र जमीनों पर कब्जा, नाजायज इस्तेमाल, अवैध निर्माण, और फिर अवैध कारोबार, सभी कुछ चलता है। ऐसी ताकतों के चलते शहरी मास्टर प्लान बदलते हैं, और नक्शे पर ही रंग बदलने से पीले रंग का 20 रूपए का नोट हरे रंग का पांच सौ का हो जाता है। जहां आम जनता, गरीब जनता के ठेले-गुमटी भी शासन-प्रशासन की आंखों में चुभते हैं, वहां पर करोड़ों के अवैध निर्माण ताकत के झंडे की तरह लहराते रहते हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज जनता को कॉकरोच कहने में कुछ भी गलत नहीं समझते, जब रोजगार खो देने वाली ऐसी जनता उठ खड़ी होगी, तो सरकार और अदालत, दोनों को दिक्कत होगी। हवा का रूख तो दिखना शुरू हो ही चुका है।

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