ताजा खबर
हालांकि मुद्दा बहुत लोकप्रिय या लुभावना नहीं है, भारत के संविधान की प्रस्तावना में समानता (इक्वलिटी) शब्द का दो किस्म से इस्तेमाल हुआ है। ‘‘...व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए...’’। भारतीय संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना के आगे जाकर भी इसे लागू करने के लिए अनुच्छेद 14 से 18 तक मौलिक अधिकारों में, ‘समानता का अधिकार’, जोड़ा है। अब यही शब्द एक दिलचस्पी खड़ा करता है कि आज के हालात में, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में क्या समानता कोई जिंदा शब्द है, या सभ्यता की कब्र पर लगे पत्थर पर खुदा हुआ एक शब्द रह गया है?
हिन्दुस्तान से बाहर निकलकर बाकी दुनिया को देखें, और उसके बाद फिर हिन्दुस्तान की तरफ लौटें। देशों के बीच की असमानता, और दुनिया का अपने आपको सभ्य मानने और कहने का पाखंड, इन्हें देखें तो समझ आता है कि दुनिया में समानता नाम की कोई चीज नहीं है। वह कहीं-कहीं कतरा-कतरा बिखरी हुई, थोड़े से टुकड़े में जिंदा एक ऐसी चीज रह गई है कि जब तक वह किसी ताकतवर के लिए खतरा साबित नहीं होती, तब तक उसे दिखावे के लिए सांस लेने दिया जाता है, और लोग सभ्य होने की खुशफहमी को जिंदा रखने के लिए भी अलग-अलग वक्त पर समानता शब्द से दूसरों को, और अपने-आपको भी बेवकूफ बनाते चलते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ देखें, या इसके इस किस्म के दूसरे कई अंतरराष्ट्रीय संगठन, कहीं पर पांच महाशक्तियों के हाथ वीटो का एक ब्रम्हास्त्र है, तो कहीं और पर व्यापक संगठन के भीतर एक तंग गिरोहबंदी राज करती है। दूसरे देशों के फौजी मोर्चों से अमरीकी सैनिकों के दो-चार ताबूत लौटते हैं, तो उन पर पूरी दुनिया से बदला लेने के फतवे दिए जाते हैं, लेकिन गाजा और लेबनान पर हमलों में एक-एक दिन में सैकड़ों बेकसूर नागरिकों के मारे जाने पर भी इसी अमरीका से बमों की सप्लाई घंटे भर को भी नहीं थमती। अपने देश के भीतर अमरीका अभी ट्रम्प के आने के पहले तक जिस लोकतंत्र का दंभ भरता था, वैसा लोकतंत्र उसने बाकी दुनिया में कभी नहीं चाहा। दूसरे देशों में दशकों तक उसने नाजायज जंग चलाई, और अपने इक्का-दुक्का सैनिकों के मरने पर भी उसने अपने देश के लोगों को भरोसा दिलाया कि दूसरी सभ्यता को ही खत्म कर दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध-अपराध लगातार करते हुए भी अमरीका और इजराइल हर अंतरराष्ट्रीय संगठन और समुदाय का हिस्सा बने हुए हैं।
मुझे याद है कि मेरा पहला पासपोर्ट जब बना था, तो उस पर छपा हुआ था कि यह पासपोर्ट दक्षिण अफ्रीका और इजराइल छोडक़र बाकी देशों के लिए वैध है। इन दो देशों को भारत के साथ रिश्तों के फेहरिस्त से बाहर रखा गया था। आज इजराइल न सिर्फ ट्रम्प का, बल्कि भारत का भी दामाद सा बना हुआ है, और फिलीस्तीनी अवांछित नवजात संतान की तरह नाली में फेंक दिए गए हैं। क्या आज सचमुच भारत यह कह सकता है कि वह इजराइल के इतिहास को देखते हुए यह अंतरराष्ट्रीय मांग कर सकता है कि फिलीस्तीनियों के समानता के इंसानी हक कायम किए जाएं? आज दुनिया में कानून का हाल यह हो गया है कि खाता न बही, जो ट्रम्प कहे वह सही। दुनिया 21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा पार कर चुकी है, लेकिन सभ्यता, और तथाकथित इंसानियत का हाल यह है कि इनकी गाडिय़ां बैक ब्यू मिरर में देखकर पीछे पाषाण युग की तरफ भाग रही हैं।
अंग्रेजी का शब्द इक्वलिटी 14वीं सदी के आसपास पुरानी फ्रांसीसी भाषा से निकला, और इसके भी पहले से यह लैटिन के एक शब्द एक्वालितास से जोड़ा जाता है, जिसका मतलब होता था न्यायसंगत, निष्पक्ष, और मानवीय गरिमा में समान होना। 18वीं सदी में फ्रांसीसी क्रांति में स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व का नारा दिया गया, तो वह इंसानों को बराबर मानने के लिए था। भारत में संस्कृत मूल शब्द सम से समानता निकला है, और इसका मतलब हर परिस्थिति, और हर जीवित प्राणी को बराबरी की नजर से देखना था। आज भारत में संपन्न और विपन्न के बीच हक और मौकों का फासला देखें, तो वह इतना गहरा, और इतना चौड़ा है कि समानता नाम के एक शब्द से उसे पाटा भी नहीं जा सकता। विधानसभाओं और संसद को देखें तो जिस तरह वहां गैरअमीरों का अनुपात गिरते चल रहा है, जिस अंदाज में संसद या विधायक बने लोगों की दौलत बढ़ रही है, जिस अंदाज में मंडी में निर्वाचित नेता नीलाम हो रहे हैं, उससे लगता है कि समानता शब्द को फ्रेंच और लैटिन से लेकर संस्कृत तक से हटा देना चाहिए।
आज जब अमरीका को इराक पर हमला करना रहता है, तो वहां का राष्ट्रपति ऐसे झूठे सुबूत पेश करता है जो इराक में जनसंहार के हथियार होने का दावा करते हों। इस झूठ के साथ एक देश को तबाह कर दिया गया, वहां के राष्ट्रपति को फांसी दे दी गई, और बाद में परले दर्जे की बेशर्मी से यह मान लिया गया कि अमरीका के पास कोई सुबूत थे ही नहीं। कभी वियतनाम, तो कभी वेनेजुएला, जहां मर्जी, वहां हमला, और यह दुनिया मानती है कि डिक्शनरी के बाहर भी समानता नाम का कोई शब्द है।
इधर हिन्दुस्तान लौटें, तो यहां अपने-अपने एयरकंडीशंड घर-दफ्तर में बैठे हुए अदालती हुक्मरान बिना सुनवाई बरसों तक देश के तिलचट्टों को कैद रखते हैं, और नफरत फैलाकर जिंदा, जहरीले कारोबारी को गिरफ्तारी से बचाने के लिए देश के सबसे बड़े जज आधी रात अपने बंगले पर सुनवाई करते हैं, जमानत देते हैं। समानता शब्द उतना ही जिंदा है जितना कि वह इस देश में वर्ण व्यवस्था के भीतर जातिवाद में जिंदा है। सवर्ण की पानी की हंडी से एक गिलास पानी ले लेने पर जिस तरह किसी दलित को पीट-पीटकर मार डाला जाता है, उसके लहू से अगर दीवार पर समानता शब्द लिखने की कोशिश की जाए, तो भी दीवार पर कुछ नहीं दिखेगा, क्योंकि दलित के लहू से लाल होने का हक छीन लिया गया है, वह लहू सवर्ण लहू की तरह लाल रंग का होने का हक कैसे पा सकता है?
हमारी लिस्ट तो कभी खत्म होगी ही नहीं, लेकिन लोग खुद अपने आसपास देख सकते हैं। मालिक और नौकर, औरत और मर्द, संपन्न और विपन्न, ताकतवर और कमजोर, सत्तारूढ़ और विपक्षी, क्या इनके हक किसी भी तरह से बराबर हो सकते हैं? और हक बराबर होने की बात तो दूर रही, क्या किसी भी तरह की समानता इनके बीच देखी जा सकती है? समानता संविधान, और सभ्यताओं की डिक्शनरी का एक शब्द ही रह गया है। अब तो हिन्दुस्तान की बड़ी-बड़ी अदालतें अपने फैसलों में मनुस्मृति का हवाला देने लगी हैं। जो मनुस्मृति गैरबराबरी पर लिखी गई हो, उसका हवाला देने वाले जज किस तरह की समानता का सम्मान कर सकते हैं?
आज तो सभ्यता के लंबे इतिहास वाले देशों का भी यह हौसला नहीं बचा है कि दुनिया में सबसे बड़ी हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ भी मुंह खोला जा सके। दुनिया के माफिया-लठैतों की लाठी से अपने सिर को बचा लेना ही जिनकी सबसे बड़ी कामयाबी हो, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? मैं तो आज एक मुद्दे को सामने रख रहा हूं, और आप अपने-अपने दायरे की मिसालें देखकर सोचें कि उनमें कहां-कहां समानता के अधिकार का सम्मान है, और कहां-कहां उनके बारे में समानता शब्द सोचकर भी हँसी भी आती है, और रोना भी आता है। सोचकर देखिए।


