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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : फौजों की बदलती तस्वीर, लोहा-लक्कड़ क्या जल्द ही फिजूल के साबित होंगे?
सुनील कुमार ने लिखा है
10-May-2026 1:36 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : फौजों की बदलती तस्वीर, लोहा-लक्कड़ क्या जल्द ही फिजूल के साबित होंगे?

हिन्दुस्तानी फौज को लेकर अभी तीन-चार दिन पहले आई खबर बताती है कि किस तरह थलसेना की हर बटालियन में ड्रोन यूनिट्स होंगी। पिछले एक बरस में भारतीय सेना ने अपने हर हिस्से में ड्रोन का दाखिला करवा दिया है, और निगरानी रखने, जासूसी करने, या रणनीतिक हमले करने के लिए ड्रोन की तैयारी बड़े पैमाने पर की जा चुकी है। इसके लिए 30 अलग-अलग किस्म के ड्रोन छांटे गए हैं, और उनकी तैनाती हो रही है।

रूस-यूक्रेन जंग के चलते हुए दुनिया ने यह देखा कि जंग के तौर-तरीके किस तरह महंगे लड़ाकू विमानों से हटकर, और जानलेवा फौजी मोर्चों से भी हटकर सस्ते ड्रोन की तरफ बढ़ चुके हैं। इस जंग का सबसे कामयाब हिस्सा ड्रोन साबित हुए, और बाद में यही सिलसिला ईरान पर हुए अमरीकी और इजराइली हमले में भी जारी रहा। कई महीने पहले हमने इसी जगह लिखा था कि भारतीय फौज में सैनिकों की बकाया भर्ती की जगह जो तीन-चार बरस की नौकरी वाले अग्निरक्षक रखे जा रहे हैं, उसके बाद अब स्थाई सैनिकों की भर्ती की जरूरत शायद न भी रहे, क्योंकि अब ड्रोन से लड़ी जाने वाली जंग में इंसानी सैनिकों की जरूरत घटती चली जाएगी। चार बरस से अधिक पहले यूक्रेन पर रूस के हमले का वक्त अलग था, और ट्रम्प की बात पर भरोसा किया जाए तो इस जंग में हर महीने 25 हजार से अधिक सैनिक मारे जा रहे हैं। यह जंग बाकी दुनिया की सरकारों के लिए एक नया तजुर्बा लेकर आई है कि किस तरह ड्रोन एक किफायती, अधिक असरदार, अधिक दूर तक घुसपैठ करने वाला, और अपने सैनिकों को मौत से बचाने वाला, सब कुछ है। इस तकनीक ने दुनिया की सोच बदल डाली है, और अब करोंड़ों या अरबों डॉलर दाम के बड़े-बड़े लड़ाकू फौजी विमान महंगे लगने लगे हैं।

हमने जब ड्रोन के भविष्य, और भविष्य के ड्रोन पर लिखा था, तब हमें भारतीय फौज की इस अघोषित तैयारी के बारे में पता नहीं था। यह जानकारी तो अभी चार दिन पहले ही उजागर हुई है। लेकिन ड्रोन के अलावा हमने एक और पहलू पर लिखा था, और उस पर अभी भारत का कोई नजरिया सामने नहीं आया है। दुनिया के कुछ देशों ने इस पर अधिक हद तक काम किया हुआ है कि किसी देश के सार्वजनिक जगहों के कैमरों के नेटवर्क में घुसपैठ करके वहां की संवेदनशील जानकारी हासिल की जाए, ताकि अधिक महत्वपूर्ण निशानों पर सीधे हमला किया जाए। लेकिन ऐसी साइबर-घुसपैठ के साथ-साथ अब एक और बात जो जरूरी हो गई है, वह साइबर-हमला है। आज एआई की मेहरबानी से दुनिया की सरकारों, फौजों, और आतंकी संगठनों के लिए यह आसान हो गया है कि वे दुश्मनों, या दुश्मन देशों पर साइबर-हमला करके उन्हें ठप्प कर सकें, उन्हें लगभग नष्ट कर सकें। इसमें ड्रोन जैसे हथियार भी नहीं लगते। एक कमरे में कुछ कम्प्यूटरों पर बैठे हुए लोग एआई के इस्तेमाल से किसी देश के, किसी कंपनी के कम्प्यूटरों में घुसपैठ करके उसे पूरी तरह तबाह कर सकते हैं। और हमारे हिसाब से यही दुनिया के युद्धों का आने वाला भविष्य है।

आज दुनिया के देश अपने फौजी खर्च को इतिहास में सबसे अधिक सीमा तक ले जा रहे हैं। नाटो देशों को अमरीकी धमकी के बाद बाकी नाटो सदस्य अपनी फौजी आत्मनिर्भरता बढ़ाने में लगे हुए हैं, जो कि हथियार खरीदी से आगे बढक़र अपने-अपने देश में हथियार कारखानों को बढ़ाने, उनकी क्षमता बढ़ाने तक जा चुका है। यह सिलसिला आने वाले बरसों में बढ़ते चलना है, क्योंकि अमरीका ने एक तरफ नाटो को अपनी फौजी ताकत आगे न देने के बहुत से इशारे कर दिए हैं, बहुत से बयान दे दिए हैं। दूसरी तरफ दुनिया के कई दूसरे देशों पर जंग का जो खतरा अमरीकी बदनीयत की वजह से छाया हुआ है, उससे वे देश भी अपनी फौजी क्षमता बढ़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। एक तरफ तो परंपरागत हथियारों की ताकत बढ़ाने का भयानक खर्चीला काम चल रहा है, और दूसरी तरफ एआई के कल्पना से परे के विकास की वजह से विनाश के लिए यह एक नया हथियार तैयार हो गया है। दुनिया में पुराने चले आ रहे नेताओं की पुरानी सोच उन्हें सरहदी लड़ाईयों से परे सोचने की ताकत नहीं दे रही है। आज हालत यह है कि एआई की क्षमता के बाद किसी देश पर बम बरसाए बिना, किसी मुल्क की सरहद को पार किए बिना सिर्फ कम्प्यूटरों की लड़ाई से किसी देश को खत्म किया जा सकता है। आज जो फौजी निवेश हो रहा है वह शायद अगले पांच-दस बरस के भीतर फिजूल का साबित हो सकता है, और अगली कोई भी जंग, हो सकता है कि साल-दो साल के भीतर की भी, ऐसी हो सकती है जो कि परंपरागत हथियारों के बिना लड़ी जाए, और महज साइबर हथियारों से जीती जाए। ऐसे में हथियारों के आज के कारखाने धंधे से बाहर हो सकते हैं, और अमरीका-चीन जैसे देश अपनी एआई क्षमता के सहारे दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियां बन सकते हैं।

 

लेकिन आज के अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के तौर-तरीकों को देखें, तो वह जिस तरह तेल के लिए वेनेजुएला पर हमला करके, वहां के राष्ट्रपति का अपहरण करके, उस देश को अमरीकी कंपनियों के हवाले कर रहा है, जिस तरह वह ईरान के तेल पर कब्जा करने की बात कर रहा है, क्या ऐसा मुजरिम अमरीकी राष्ट्रपति आने वाले बरसों में अपने एआई हथियारों की ताकत से दुनिया के किसी भी कोने में बसे हुए देशों पर कब्जा करने की कोशिश नहीं कर सकता? इसके लिए तो उसे उस इलाके में कोई फौजी अड्डा भी नहीं बनाना होगा, वह अपने घर बैठे एआई-हथियारों से किसी भी देश के पूरे कम्प्यूटर सिस्टम पर कब्जा कर पाएगा, और उन देशों से फिरौती में तेल के कुएं, दुर्लभ खनिजों की खदानें, या अपने बेटों के लिए क्रिप्टोकरेंसी के कारोबार, कुछ भी मांग सकेगा। आज इजराइल अगर फिलीस्तीन पर पूरे मालिकाना हक की कोशिश करे, तो उसे मलबे का रेगिस्तान मिलेगा, अमरीका अगर ईरान पर कब्जे की कोशिश करे, तो उसे बड़ी तबाही के बाद ही ऐसा हासिल हो सकेगा, और वह देश खंडहर जैसा रहेगा। लेकिन साइबर-हथियारों से, एआई-हथियारों से किसी देश पर कब्जा करने से वह पूरे का पूरा देश साबुत ही मिल जाएगा। आज भी कुछ साइबर-घुसपैठिए दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों, या ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग के कम्प्यूटरों पर कब्जा कर लेते हैं, और बड़ी फिरौती मांगते हैं। ऐसा लगता है कि उनसे ही सीखकर ट्रम्प राष्ट्रपति भवन पहुंचा है, और उन्हीं के अंदाज में काम कर रहा है। हो सकता है कि उसने सोच-समझकर तैयारी के साथ दूसरे देशों को परंपरागत हथियारों की तरफ धकेला हो, और वह खुद ऐसे एआई हथियार बना रहा हो जिनके सामने, जिनके मुकाबले परंपरागत हथियारों वाली फौज किसी काम की नहीं रहेगी। जब दुश्मन देश, फौज, दिखेंगे ही नहीं, और वे इंटरनेट के रास्ते हमला करेंगे, तो ये फौजें भला किस काम आएंगी?

इसलिए थलसैनिकों के मुकाबले ड्रोन की तरफ आगे बढऩा भारत जैसे देश के लिए एक थोड़ा सा बेहतर फैसला है। चीन जैसे कुछ देश रोबो-सैनिकों की तरफ खासे आगे बढ़ चुके हैं, और जंग के मोर्चों पर हो सकता है कि सैनिकों की जान खतरे में डालने के बजाय मशीनी-मानव का इस्तेमाल बढ़ते चले। फिर भी हमारा मानना है कि आने वाली दुनिया में राज उसी देश का होगा जो दूसरे देशों के कम्प्यूटरों पर कब्जा कर सकेगा, और उनको अपने हिसाब से चला सकेगा। दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए इन देशों का कोई बड़ा देश होना, महाशक्ति होना भी जरूरी नहीं है, और इनका कोई देश होना भी जरूरी नहीं है। लोगों का एक समर्पित समूह भी एआई की असीमित ताकत को लेकर दुनिया के अधिकतर देशों को जीत सकता है, उन्हें अदृश्य बंदूक की नोंक पर रख सकता है। आज हथियारों के लोहा-लक्कड़ पर अधिक पूंजीनिवेश आगे चलकर फिजूल साबित होगा। 

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