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कहा-बापू आश्रम न बनने से सौदा रद्द नहीं होगा
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 4 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिले के बैकुंठपुर स्थित एक जमीन विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए दूसरी अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि निचली अदालतों के तथ्यों और निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
मामले में मनोरंजन प्रसाद पांडेय ने दूसरी अपील दायर दूसरी अपील की थी। उन्होंने वर्ष 1952 में निष्पादित विक्रय विलेख (सेल डीड) को निरस्त करने और जमीन पर अपना स्वामित्व स्थापित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह जमीन मूल रूप से उनके दादा अभयराम पांडेय की थी, जिन्होंने सामाजिक कार्यों के लिए बापू आश्रम स्थापित करने के उद्देश्य से इसे गौरीशंकर शास्त्री के नाम पर दर्ज कराया था। उनका कहना था कि वास्तविक रूप से राशि का कोई लेन-देन नहीं हुआ और आश्रम भी कभी निर्मित नहीं हुआ, इसलिए बिक्री अमान्य मानी जानी चाहिए।
हालांकि, प्रतिवादियों ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि 1952 का पंजीकरण विधिवत और वैध था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बिक्री विलेख में कहीं भी आश्रम निर्माण को अनिवार्य शर्त के रूप में दर्ज नहीं किया गया है और वर्षों से जमीन पर उनका कब्जा व स्वामित्व बना हुआ है। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय न्यायालय पहले ही इस बिक्री को वैध ठहरा चुके थे।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने कहा कि दूसरी अपील केवल तब स्वीकार की जा सकती है, जब उसमें कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न शामिल हो। अदालत ने पाया कि इस प्रकरण में ऐसा कोई प्रश्न नहीं बनता।
अदालत ने यह भी कहा कि आश्रम निर्माण का उल्लेख कोई बाध्यकारी कानूनी शर्त नहीं है। जब वसीयत बनाई गई, तब तक जमीन पहले ही बेची जा चुकी थी, इसलिए उस पर किसी प्रकार का अधिकार या दावा शेष नहीं रहता। केवल इस आधार पर कि आश्रम नहीं बना, बिक्री को निरस्त नहीं किया जा सकता।
अंततः अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता केवल साक्ष्यों की पुनः समीक्षा चाहता है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसी आधार पर दूसरी अपील को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।


