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-इमरान क़ुरैशी
अगली बार जब आप किसी स्वास्थ्य जांच शिविर या अस्पताल में जाएं और आपसे 10 मिनट तक एक मास्क के अंदर सांस लेने को कहा जाए, तो बिना झिझक और डर के ऐसा करें.
मेडिकल टीम आपसे मास्क में सांस लेने के लिए इसलिए कह रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं आप कैंसर जैसी छिपी हुई बीमारी से तो नहीं जूझ रहे हैं.
हम जानते हैं कि कैसे कोलोरेक्टल कैंसर जैसी कुछ बीमारियां दूसरी या तीसरी स्टेज में जाकर पकड़ में आती हैं. इस स्टेज पर कैंसर के डॉक्टरों के लिए मरीज़ की जान बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है.
जो मेडिकल टीम आपसे मास्क में सांस लेने को कह रही है, वो दरअसल आपका सैंपल ले रही है, ताकि उसे एक ख़ास तरीक़े से ट्रेन किए हुए कुत्ते को सुंघाया जा सके और यह पता चल सके कि शरीर के किसी हिस्से में कैंसर के निशान हैं या नहीं.
कैंसर जितनी जल्दी पकड़ में आए, जान बचाना उतना आसान होता है.
इसराइल, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, अमेरिका, जर्मनी, ताइवान समेत कई देशों में काफ़ी समय से कुत्तों की मदद से कैंसर का पता लगाने का प्रयोग जारी है और यह एक अच्छा आज़माया हुआ तरीक़ा है.
लेकिन भारत में पहली बार कर्नाटक के छह अलग-अलग अस्पतालों में ट्रेंड कुत्तों की मदद से एक स्टडी की गई है.
इस स्टडी में कुत्तों ने 1502 मरीज़ों के सैंपल सूंघे और 91 फ़ीसदी सटीकता के साथ कुत्तों ने सूंघकर बता दिया कि किन मरीज़ों को सात बड़े तरह के कैंसर हैं और किन्हें नहीं हैं.
इन 1502 लोगों में से 283 ऐसे थे जिनमें बायोप्सी से कैंसर की पुष्टि हो चुकी थी और 1219 को कैंसर नहीं था.
यह स्टडी बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी डॉगनोसिस ने की है. इस स्टडी के नतीजे शुक्रवार को जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं. यह स्टडी डॉ. संजीव कुलकोड की अगुवाई में की गई है, जो कर्नाटक के हुब्बली स्थित रेड ऑन कैंसर सेंटर के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और डायरेक्टर हैं.
डॉगनोसिस के सीईओ और को-फाउंडर आकाश कुलकोड ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "हम अब तक कर्नाटक के अस्पतालों के साथ मिलकर 10 हज़ार सैंपल जमा कर चुके हैं. अगले चरण में हम महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों में जाने की योजना बना रहे हैं. यहां अगले छह से नौ महीनों में क़रीब 15 हज़ार लोगों की जांच की जाएगी."
आकाश कुलकोड ने बताया कि ये 10 हज़ार सैंपल कुत्तों की ट्रेनिंग के साथ-साथ एआई सिस्टम बनाने में भी काम आएंगे. इसका मक़सद इस पूरी प्रक्रिया को बड़े स्तर पर ले जाना है.
उनका कहना है, "हमारा लक्ष्य 30 कुत्तों की मदद से हर साल 10 लाख सैंपल जांचने की क्षमता तैयार करना है."
उनकी बातों में जो एक तरह की जल्दबाज़ी दिखाई देती है, उसकी भी एक वजह है. मौजूदा अनुमानों के मुताबिक इस साल देश में कैंसर के मामले 15 लाख का आंकड़ा पार कर जाएंगे, जो तीन दशकों में 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.
स्टडी के लेखक डॉ. संजीव कुलकोड ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "कैंसर बढ़ने की दो वजहें हैं. एक तो आबादी बढ़ रही है. दूसरा कैंसर उम्र से जुड़ी बीमारी है. जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, कैंसर के मामले भी बढ़ते जाते हैं."
सबसे पहले साल 1989 में कुत्तों पर ध्यान गया.
शोधकर्ताओं एमिली मोजर और माइकल मैककुलॉक ने 2010 में जर्नल ऑफ वेटरनरी बिहेवियर में लिखा, "एक महिला को उसकी त्वचा पर एक धब्बे की जांच कुत्ते से करवाने के लिए कहा गया. वह कुत्ता उस धब्बे वाली जगह में ज़रूरत से ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहा था."
"क्लीनिकल जांच के बाद पता चला कि वह धब्बा मैलिग्नेंट मेलेनोमा यानी एक खतरनाक किस्म का स्किन कैंसर था."
उनके इस पेपर का शीर्षक था- "कुत्तों से मानव कैंसर का पता लगाने की क्षमता, तरीकों और सटीकता की समीक्षा."
केरल के शव खोजने वाले कुत्ते
कुत्तों के सूंघने की क्षमता सबसे तेज़ मानी जाती है. आसान शब्दों में कहें तो उनमें 30 करोड़ ओल्फेक्ट्री रिसेप्टर यानी गंध पहचानने वाली कोशिकाएं होती हैं. वहीं इंसानों में यह संख्या महज़ 50 लाख है.
हॉन्गकॉन्ग के टिमोथी क्वान लो और उनकी टीम ने फ्रंटियर्स इन मेडिसिन में लिखा, "कुत्ते इंसानी शरीर से निकलने वाले बेहद कम मात्रा के वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड यानी वीओसी को भी पहचान सकते हैं. ये गंध शरीर में हो रहे बदलाव, किसी संक्रमण या कैंसर से जुड़ी हो सकती है."
मेडिकल टीम मरीज़ को मास्क पहनाती है और उसमें 10 मिनट तक सांस लेने को कहती है. ये मास्क तीन महीने या उससे भी ज़्यादा समय तक अपनी क्षमता बनाए रखते हैं. इसके बाद इन मास्क को एक नियंत्रित लैब सेटिंग में कुत्तों के सामने रखा जाता है.
कुत्ते शरीर के वीओसी में हुए बदलावों को भांप लेते हैं और सात तरह के कैंसर की पहचान करते हैं. यहां तक कि शुरुआती स्टेज के कैंसर का भी पता लगा लेते हैं.
एचसीजी कैंसर सेंटर, बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एकेडमिक्स एंड रिसर्च के डीन डॉक्टर विशाल यूएस राव बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहते हैं, "वोमेरोनैसल ऑर्गन, जिसे जैकबसन ऑर्गन भी कहा जाता है, कुत्ते की नाक के भीतर नीचे की तरफ़ मौजूद एक विशेष संरचना होती है. यह उन्हें नमी के साथ आने वाली गंधों और जटिल रासायनिक संकेतों को पहचानने में मदद करती है."
कुत्तों की इसी क्षमता को देखते हुए केरल पुलिस अकादमी ने ऐसे कुत्तों को ट्रेन किया, जिन्होंने जुलाई 2024 में वायनाड लैंडस्लाइड आपदा के दौरान लाशों की पहचान की.
सिर्फ़ तीन दिनों में (31 जुलाई से 2 अगस्त के बीच) माया, मर्फी और एंजल ने उस इलाके से 23 शव ढूंढ निकाले. इस इलाके में बहुत ज्यादा बारिश की वजह से आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने तबाही मचाई थी. केरल ने ऐसी आपदा पहले कभी नहीं देखी थी.
ये कुत्ते मलबे के 25 फीट नीचे दबी लाशों को भी सूंघ कर ढूंढ सकते थे. मेरठ के रिमाउंट वेटरनरी कोर सेंटर के तीन और कुत्तों को भी शव तलाशने में लगाया गया था.
अकादमी के आईजीपी और डायरेक्टर के. सेथुरमन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "हमारे कुत्तों को नेशनल डिज़ास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) भी शव ढूंढने के लिए ले जाती है. फिलहाल हम एनडीआरएफ के लोगों को कुत्ते ट्रेन करने की ट्रेनिंग दे रहे हैं."
इन कुत्तों और उनके ट्रेनर्स को कालीकट यूनिवर्सिटी के फॉरेंसिक विभाग ने ट्रेन किया था.
कालीकट यूनिवर्सिटी के फॉरेंसिक साइंस विभाग के कोर्स कोऑर्डिनेटर शिवा प्रसाद ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "हमने खून को गॉज (एक तरह का पतला, मुलायम मेडिकल कपड़ा) पर लगाकर कुछ समय के लिए छिपी जगह सड़ने के लिए छोड़ा. कुत्तों को ट्रेन करने के लिए इसी तरह की बनावटी गंध का इस्तेमाल किया जाता है."
केरल पुलिस अकादमी और फॉरेंसिक विभाग के बीच हुए एमओयू की वजह से अब पुलिसकर्मियों और आम लोगों के लिए एक सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया गया है. इस कोर्स में कुत्तों को इंसानों में कैंसर पहचानने के लिए ट्रेन करना सिखाया जाएगा.
शिवा प्रसाद का कहना है, "जिन अस्पतालों से हमने बात की है, उनसे अच्छा रिस्पॉन्स मिला है. इन अस्पतालों के करीब एक दर्जन डॉक्टर हमारी ट्रेनिंग फैसिलिटी देखने त्रिशूर भी आ चुके हैं. यह केरल पुलिस अकादमी का मुख्यालय है. हमारा इरादा इन मेडिकल संस्थानों से सैंपल जुटाकर पहले कुत्तों को और फिर कर्मियों को ट्रेन करना है."
कुत्तों को इस्तेमाल करने की एक और बड़ी वजह
कैंसर की जांच में कुत्ते एक अहम ज़रिया बन सकते हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि मौजूदा तरीकों में मरीज़ों को कई दिक्कतें उठानी पड़ती हैं. मैमोग्राम जैसे टेस्ट में मरीज़ को आयोनाइज़िंग रेडिएश का सामना करना पड़ता है. ये रेडिएशन व्यक्ति के लिए शरीर के लिए नुक़सानदायक होता है. वहीं कोलोरेक्टल कैंसर की जांच के लिए इनवेसिव प्रोसीजर करना पड़ता है.
भारत जैसे देश में यह भी एक बड़ा सवाल है कि मरीज़ों को ऐसे कैंसर की जांच के लिए भरोसेमंद और आसानी से उपलब्ध जगहें मिल पाती हैं या नहीं.
कैंसर जांच की इन्हीं कमियों को देखते हुए इसराइल की एलिजाबेथ हाफ और उनकी टीम ने 2024 में 'नेचर: साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में एक स्टडी प्रकाशित की.
इस स्टडी में बताया गया है कि इसराइल की कंपनी स्पॉटइट अर्ली लिमिटेड ने कैंसर की जांच का एक नया तरीका विकसित किया है. इसमें शरीर के अंदर कुछ डालने की ज़रूरत नहीं होती और न ही किसी ख़ास मदद की ज़रूरत होती है. इसमें सिर्फ सांस का सैंपल लिया जाता है, जिसके आधार पर कैंसर का पता लगाया जाता है. यह तकनीक कुत्तों की सूंघने की क्षमता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को मिलाकर काम करती है.
उनकी स्टडी में यह भी कहा गया कि सांस के सैंपल अक्सर यूरिन के सैंपल के मुकाबले कैंसर पकड़ने में ज़्यादा कारगर साबित होते हैं.
डॉ. संजीव कुलकोड ने बताया कि कुत्तों को इंसानों के सांस के सैंपल में मौजूद 'ख़ास गंध' पहचानने के लिए ट्रेन किया जाता है. यह ठीक वैसा ही काम है जैसे कुत्तों को बम, नशीले पदार्थ और भूकंप में दबे इंसानों को ढूंढने के लिए ट्रेन किया जाता है.
पता लगाने के लिए कुत्तों की कौन सी नस्लें अच्छी होती हैं?
केरल पुलिस अकादमी और डॉगनोसिस ने अलग-अलग नस्लों के कुत्तों का इस्तेमाल किया है. इनमें देसी कुत्ते (इंडी) भी शामिल हैं.
अकादमी का कहना है कि उसने देसी कुत्ते, लैब्राडोर और एक बीगल का इस्तेमाल किया है. वहीं फॉरेंसिक विभाग ने आठ बेल्जियन मेलिनोइस खरीदे हैं और इन्हें ट्रेन करके सर्टिफिकेट कोर्स के छात्रों को भी ट्रेनिंग दी जाएगी.
डॉगनोसिस ने चार बीगल, एक लैब्राडोर-इंडी मिक्स और एक डच शेफर्ड-बेल्जियन मेलिनोइस मिक्स कुत्ते का इस्तेमाल किया है. खास बात यह है कि लैब्राडोर-इंडी मिक्स को डॉगनोसिस ने एक शेल्टर से गोद लिया था.
केरल पुलिस अकादमी और डॉगनोसिस ने इन कुत्तों को 10 हफ्तों से अधिक समय तक रिवॉर्ड-बेस्ड तरीके से ट्रेन किया. इसमें कुत्तों को सही गंध पहचानने पर इनाम दिया जाता था.
शिवा प्रसाद के मुताबिक, इस प्रक्रिया में जिस व्यक्ति की जांच होनी है उसे मास्क पहना कर करीब 10 मिनट तक सामान्य रूप से सांस लेने को कहा जाता है. इसके बाद जरूरी क्लीनिकल टेस्ट किए जाते हैं और तब यह पुष्टि की जाती है कि कुत्ते का आकलन सही था या नहीं.
आकाश कुलकोड ने कहा, "जिन लोगों के बारे में कुत्ते कैंसर का शक जताते हैं, उन्हें आगे फुल बॉडी पीईटी-सीटी स्कैन जैसी डिटेल जांच करवाई जा सकती है.
उन्होंने बताया, "यह जांच शुरुआती स्टेज में भी ट्यूमर पकड़ लेती है. इससे बड़ी संख्या में लोगों की जांच करना आसान भी हो जाता है और खर्च भी कम आता है"
आसान शब्दों में कहें तो यह सांस वाला टेस्ट कैंसर की बड़े पैमाने पर प्री-स्क्रीनिंग के लिए एक कारगर औजार बनकर उभर रहा है.
लेकिन डॉ. विशाल राव का एक सुझाव है, जिसमें वो "समुदाय स्तर पर इसकी पहचान के लिए अधिक स्टैंडर्ड तरीका विकसित करने के लिए" पशु चिकित्सा विज्ञान और मेडिकल क्लिनिकल पेशेवरों के सक्रिय सहयोग की बात करते हैं.
इस तरह के इनोवेशंस को लेकर वो कहते हैं, "यह भारत के लिए सही समय है कि वह ऐसी कृत्रिम नाक विकसित करे, जो कुत्तों की सूंघने की प्रणाली की नकल कर सके और इन वीओसी (वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स) को पहचान सके."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (bbc.com/hindi)


