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हम लोग अपने बचपन में एक टोटके को सच मान लेते थे क्योंकि वह चारों तरफ खूब प्रचलित था। मनीप्लांट नाम का एक पौधा जो मिट्टी और पानी किसी में भी पनप जाता है, उसके बारे में कहा जाता था कि अगर उसे चुराकर लाकर लगाया जाए, तो वह अधिक जल्दी बढ़ता है, अधिक वक्त तक रहता है। उस वक्त आसपास इतनी पहचान भी नहीं थी कि पौधे वाले घरों वाले लोगों से पौधा मांगा जाए, मेरा अपना बचपन निम्न आय वर्ग का था, और मोहल्ले के अपनी पहुंच के घरों में पौधों की जगह नहीं रहती थी। फिर यह मशहूर और प्रचलित टोटका भी था, तो किसी एक बड़े घर में कूदकर वहां से मनीप्लांट की बेल तोडक़र लाकर घर की मिट्टी में लगाई थी। लेकिन शायद तपस्या में कुछ कमी रह गई थी, चोरी की भावना ने चोर की तरह सोचना पूरा नहीं हो पाया, और बेल का वह टुकड़ा मर गया।
आज सुबह बीबीसी पर एक वैज्ञानिक शोध आ रही थी, जो बताती है कि लोग अपनी मेहनत से खरीदा हुआ, या किसी दावत में जायज तरीके से पाया हुआ खाना जितना स्वादिष्ट पाते हैं, उससे बहुत अधिक स्वादिष्ट उन्हें वही खाना नाजायज तरीके से पाने, या चुराने के बाद लगता है। मतलब यह कि मेहनत या हक से पाया हुआ उतना मजेदार नहीं लगता, जितना कि गलत तरीके से पाया हुआ लगता है। यह अध्ययन वैज्ञानिकों ने शोध के पूरे पैमानों पर कड़ाई बरतते हुए किया। कुछ लोगों को फ्रेंच फ्राइज सीधे दे दिए गए, कुछ लोगों को दूसरों की प्लेट से चुराने के लिए कहा गया, और कुछ लोगों को ऐसी जगह से इस तरह चुराने के लिए कहा गया जिसमें पकड़े जाने का जोखिम अधिक था, पकड़े जाने पर जोखिम अधिक था। बड़े व्यापक स्तर पर हुए इस शोध का नतीजा यह था कि लोगों को परोसे गए, या उनके हक से पाए गए फ्रेंच फ्राइज के मुकाबले चोरी वाले बहुत अधिक स्वादिष्ट लगे, और जिस चोरी में खतरा जितना अधिक था, उस चोरी के फ्रेंच फ्राइज उतने ही अधिक स्वादिष्ट थे। मतलब यह कि स्वाद खतरे के अनुपात में बढ़ते चले गया, कुछ मामलों में तो यह परोसे गए वैसे ही, एक ही साथ बनाए गए, फ्रेंच फ्राइज के मुकाबले 40 फीसदी तक अधिक स्वादिष्ट करार दिए गए।
इस मनोवैज्ञानिक प्रयोग के पीछे सिद्धांत यह था कि जिस चीज को मना किया जाए, वही ज्यादा आकर्षक लगती है। यही वजह है कि चोरी का खाना, या गलत तरीके से जुटाया गया खाना ज्यादा स्पेशल लगता है। विज्ञान कहता है कि जब आप कुछ गलत करते हैं, तो शरीर में डोपामिन नाम का एक केमिकल बढ़ता है, जिसे कि पुरस्कार-रसायन भी कहते हैं। चोरी करते समय लोगों को उत्तेजना और अपराधबोध दोनों ही होते हैं, और इसी से वैसे जुटाए गए खाने का स्वाद बढ़ जाता है। फिर इसके अलावा एक और बात लागू होती है कि जब कोई चीज आसानी से नहीं मिलती, तो दिमाग में उसका महत्व बढ़ जाता है, यही सिद्धांत उन सामानों पर लागू होता है जिनके साथ इश्तहार किया जाता है कि वे सीमित संख्या में बनाए गए हैं। यही वजहें हैं कि एक साथ बनाई गई फ्रेंच फ्राइज के स्वाद में लोगों को 40 फीसदी तक का फर्क लगा, सबसे फीका स्वाद लगा जायज तरीके से पाने पर, और सबसे अधिक स्वाद लगा सबसे नाजायज तरीके से पाने पर।
जिस पश्चिम में यह ताजा शोध हुआ है, वहां पर इटली में यह पुरानी कहावत है कि चोरी का खाना ज्यादा स्वादिष्ट होता है। स्पेन में कहा जाता है मना किया गया ही सबसे स्वादिष्ट होता है। इन दोनों बातों को देखकर लगता है कि अपने बचपन में हम आसपास के कुछ बड़े घरों में लगे हुए अमरूद के पेड़ों तक पहुंचकर उसके फल चुराकर खाते थे, तो सचमुच ही उसका स्वाद बहुत लगता था। परिवार की औकात में अमरूद खरीदकर खाना था, लेकिन चुराकर खाने का मजा ही कुछ और था। मतलब यह कि जीभ के साथ-साथ दिमाग भी स्वाद महसूस कराता है। जो वर्जित है, निषिद्ध है, जिसकी मनाही है, उसे पाने की चाह हमेशा ही बड़ी रहती है, खड़ी रहती है।
एक अंग्रेजी अपराध-कथा उपन्यास में अधेड़ होता हुआ एक नौजवान अपने बाप के मरने पर उसके कारोबार का मालिक होने का सपना तो देखते ही रहता है, बाप के मरने पर वह पहला काम उसकी प्रेमिका पर कब्जा जमाने का करता है। पिता की प्रेमिका पर नजर रखना किसी भी समाज में वर्जित संबंध माना जाता है, लेकिन इस नौजवान के लिए पिता के कारोबार को पाने से अधिक महत्वपूर्ण उसकी प्रेमिका को पाना था।
वर्जित संबंधों का हाल बड़ा दिलचस्प रहता है। खाने-पीने की बातों से आगे बढक़र जब मैंने मनोविज्ञान में कुछ और चीजों को तलाशा कि क्या लोगों को दूसरे अविवाहित और अकेले लोगों के मुकाबले किसी और के साथ संबंध वाले, या किसी और से शादीशुदा लोग अधिक सुहाते हैं, तो उसके पीछे बड़ा साफ-साफ मनोवैज्ञानिक कारण है। मनोविज्ञान लोगों के दिमाग में यह बात बैठाता है कि अगर किसी को पहले ही चुना गया है, तो उसका दूसरों से बेहतर होना तय है। इसे मेट-चॉइस कॉपिंग कहा जाता है, मतलब यह कि लोग दूसरों की पहले से की गई पसंद को अतिरिक्त महत्व देते हैं। यह सिर्फ इंसानों में नहीं होता, जानवरों में भी होता है।
इस सिलसिले में मनोविज्ञान कहता है कि जो उपलब्ध नहीं है, उसे हासिल करने की हसरत कुछ अधिक होती है, उसे पाना अधिक उत्तेजना देता है। ऐसे संबंधों में प्रेम या देहसुख के साथ-साथ एक सुख यह भी मिलता है कि जिसकी जिंदगी में कोई और जोड़ीदार भी है, वे भी अगर आपकी तरफ आकर्षित हैं, तो यह अपने आपमें एक जीत हासिल सरीखा रहता है। मनोविज्ञान इसकी कुछ जटिल परिभाषा बनाता है, और कहता है कि जिसे पहले से किसी ने चुना है, उसके बारे में दूसरे के दिमाग में यह आता है कि वह पहले से देखे, परखे, खरे हैं, टेस्टेड हैं। जब दूसरे से शादीशुदा, या दूसरे से किसी प्रेमसंबंध में बंधे हुए से किसी और का संबंध बनता है, तो उस ‘किसी और’ का दिमाग यह अतिरिक्त उत्तेजना पाता है कि उसने पहुंच से परे के किसी को हासिल कर लिया है, और यही परे होना किसी व्यक्ति के महत्व को बढ़ा भी देता है। इसलिए शादीशुदा जिंदगी के एक-दूसरे को जायज तरीके से हासिल जीवनसाथी उतने आकर्षक नहीं लगते, उनके साथ आनंद उतना अधिक नहीं आता, जितना कि किसी विवाहेत्तर साथी के साथ होता है।
जो रक्तसंबंधों या पारिवारिक रिश्तों के हिसाब से वर्जित है, उसे पाने की हसरत भी कई लोगों को अधिक उत्तेजना देती है। सामाजिक नियम-कायदे विवाहेत्तर जिंदगी के बाहर के रिश्तों को वर्जित मानते हैं, और इसलिए ऐसे रिश्ते अधिक उत्तेजना देते हैं। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे रिश्तों में जो खतरा रहता है, गोपनीयता रहती है, अपराधबोध और उत्तेजना रहते हैं, इन सबकी वजह से दिमाग में डोपामिन (एक रसायन) का बड़ा डोज पैदा होता है, और इसलिए ऐसे रिश्ते मान्यता प्राप्त, स्थाई, या लंबे वक्त के रिश्तों के मुकाबले अधिक मजेदार लगते हैं।
इसकी एक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या है कि अगर कोई पहले से किसी रिश्ते में है, तो उसका एक मतलब यह है कि वह सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य है, उसे रिश्ते बनाना, संभालना, और चलाना आता है, और इसके साथ-साथ वह भावनात्मक या शारीरिक रूप से इसके लिए समर्थ भी है। इन चीजों को मिलाकर मेट-वेल्यू-सिग्नल कहा जाता है। और सामाजिक शोध बताती है कि लोग अक्सर ऐसे जोड़ीदार की तरफ अधिक आकर्षित होते हैं। लेकिन साथ-साथ एक बात जरूर जुड़ी रहती है कि अफेयर्स, यानी चक्कर में उत्तेजना तो अधिक होती है, लेकिन शादी जैसे रिश्तों में दीर्घकालीन स्थिरता अधिक होती है। चक्करों में रोजाना की कोई जिम्मेदारी नहीं रहती, रोज मिलने या लौटकर एक-दूसरे के पास आने जैसा कोई बोझ नहीं रहता, सिर्फ चुनिंदा पल रहते हैं जो कि आपसी सहमति से तय किए जाते हैं, इसलिए वह बिना स्थिरता के भी अधिक उत्तेजक दौर रहता है। मतलब यह कि चक्कर में लोग किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, उसके साथ होने वाले अनुभव, उससे मिलने वाली उत्तेजना, और उससे मिलने वाले महत्व, इन तमाम चीजों से आकर्षित होते हैं।
कहां तो आज सुबह चोरी के फ्रेंच फ्राइज पर मनोवैज्ञानिक शोध सुनने मिल गया, और उस पर लिखना शुरू किया, तो बचपन का मनीप्लांट का टोटका, और चोरी की उत्तेजना याद आ गई, और फिर वर्जित पौधे से बात बढ़ते-बढ़ते वर्जित रिश्तों पर आ गई। आपने फ्रेंच फ्राइज या खाने-पीने की और कोई चीज चुराने का सुख पाया हो, तो उसे याद करके बिना नई चोरी उस पुराने सुख को फिर पा सकते हैं, बचपन में मनीप्लांट या अमरूद, बेर या आम, चुराकर एक उत्तेजक सुख पाया हो, तो उसे भी याद कर सकते हैं, और आखिर वाली वर्जित उत्तेजना की यादें तो लोगों को बाकी तमाम जिंदगी घेरे ही रहती हैं, मेरे कहे बिना भी वे तो आपको बीच-बीच में याद आती ही रहती होंगी।
इतनी बार वर्जित शब्द लिखने की वजह से बाइबिल की एक कहानी याद आई जिसमें एक वर्जित फल का जिक्र है। कहानी के मुताबिक ईश्वर ने पहले आदम को बनाया, और फिर हव्वा को। उन्हें एक खूबसूरत बगीचा दिया, और एक ही शर्त रखी कि उसके एक पेड़ के फल को कभी नहीं खाना है। लेकिन एक सांप ने हव्वा को बहकाया, और उसके बहकावे में आकर उसने वर्जित फल खाया, फिर उसके कहे आदम ने भी इसे खा लिया। इसके साथ ही उन्हें अपनी नग्नता का अहसास हुआ, ज्ञान मिला, लेकिन शर्म और डर भी मिला। नतीजा यह हुआ कि बतौर सजा ईश्वर ने उन्हें अपने बगीचे से निकाल दिया, और इंसानों को तकलीफ और मौत का भागीदार बनना पड़ा।
भला कोई ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी वर्जित फल न चखा हो? अपने-अपने धर्म की बाइबिल पर हाथ रखकर ईमानदारी से कहना!


