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हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 3 मई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी शासकीय कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा एक साथ चलाए जा सकते हैं। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के नागपुर मंडल में पदस्थ मुख्य स्टाफ एवं वेलफेयर इंस्पेक्टर अनूप कुमार अकले की याचिका खारिज कर दी।
मामले के अनुसार, अनूप कुमार अकले को सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच ने 2 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। आरोप है कि उन्होंने एक मृत रेल कर्मचारी की पत्नी कुंदा चरण सेलोटे से उसके बेटे की अनुकंपा नियुक्ति और सेवा लाभ दिलाने के बदले कुल 2.40 लाख रुपये की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कैप्टन एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच को केवल तब रोका जा सकता है, जब मामला अत्यंत जटिल हो। वर्तमान प्रकरण में आपराधिक ट्रायल पिछले 5 वर्षों से लंबित है और अभी तक गवाहों के बयान भी शुरू नहीं हुए हैं। ऐसे में विभागीय जांच को अनिश्चितकाल तक रोकना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में रेल प्रशासन को स्वतंत्र रूप से जांच करने और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने का अधिकार है। विभागीय जांच और आपराधिक प्रक्रिया के उद्देश्य और तरीके अलग-अलग होते हैं, इसलिए दोनों को एक साथ चलाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।
आरोपी कर्मचारी के खिलाफ रेलवे सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 और आचरण नियम, 1966 के तहत विभागीय कार्रवाई जारी है। साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज है। दोष सिद्ध होने पर उसे 3 से 7 साल तक की सजा हो सकती है। विभागीय जांच में दोषी पाए जाने पर नौकरी से बर्खास्तगी और पेंशन लाभ समाप्त करने की भी कार्रवाई संभव है।


