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एक जज ने उठाए मानवाधिकार आयोग की चुप्पी पर सवाल
प्रयागराज, 30 अप्रैल। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली और उत्तर प्रदेश के मदरसों के खिलाफ जारी जांच को लेकर एक अभूतपूर्व खंडित फैसला सुनाया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की पीठ के बीच यह मतभेद केवल एक तकनीकी कानूनी प्रक्रिया को लेकर नहीं था, बल्कि भारत में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों और आयोगों की निष्पक्षता से जुड़े गहरे संवैधानिक सवालों पर आधारित था।
विवाद की जड़: 558 मदरसों पर 'आर्थिक भ्रष्टाचार' की जांच
यह पूरा मामला 'टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया' द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुआ। याचिका में NHRC के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आयोग ने उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों की वित्तीय अनियमितताओं और शिक्षकों की नियुक्तियों की जांच 'आर्थिक अपराध शाखा' से कराने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि NHRC के पास इस तरह की जांच का आदेश देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन की तीखी और 'हार्ड-हिटिंग' टिप्पणियां
जस्टिस श्रीधरन ने सुनवाई के दौरान NHRC की भूमिका पर कड़े सवाल खड़े किए। उनकी प्रमुख आपत्तियां निम्नलिखित थीं:
मॉब लिंचिंग पर आयोग का 'सन्नाटा': न्यायाधीश ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि देश के मानवाधिकार आयोग उन भयानक मामलों में स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेने में विफल रहे हैं जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों की 'लिंचिंग' की गई या उन पर जानलेवा हमले हुए। उन्होंने कहा कि जहाँ असल में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, वहाँ आयोग मौन है।
दखलअंदाजी बनाम कर्तव्य: उन्होंने कहा कि आयोग उन शैक्षणिक और प्रशासनिक मामलों में अपनी टांग अड़ा रहा है जो उसके कार्यक्षेत्र में नहीं आते। जस्टिस श्रीधरन ने यह भी जोड़ा कि आज के माहौल में दो अलग-अलग समुदायों के लोगों का सार्वजनिक स्थल पर साथ बैठना भी एक जोखिम भरा काम बन गया है, लेकिन इन बुनियादी सुरक्षा मुद्दों पर आयोग कोई कड़ा रुख नहीं अपनाता।
जस्टिस विवेक सरन की कड़ी असहमति
वहीं दूसरी ओर, जस्टिस विवेक सरन ने इन टिप्पणियों को 'अनुचित' और 'एकतरफा' करार दिया। उनकी असहमति के मुख्य बिंदु थे:
पक्ष सुनने का अधिकार: जस्टिस सरन का कहना था कि चूंकि सुनवाई के दौरान NHRC का कोई वकील मौजूद नहीं था और याचिकाकर्ता केवल तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहा था, ऐसे में आयोग के खिलाफ इतनी गंभीर और व्यापक टिप्पणियां करना कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ है।
प्रक्रियात्मक मर्यादा: उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना सभी पक्षों को सुने और बिना ठोस सबूतों के किसी भी संस्था की नीयत पर सवाल उठाना उच्च न्यायालय की मर्यादा के अनुकूल नहीं है।
न्यायिक परिणाम और अगली कार्रवाई
दोनों न्यायाधीशों के बीच इस तीखी बहस और वैचारिक मतभेद के कारण अदालत ने 'विभाजित फैसला' जारी किया।
जांच पर रोक: फिलहाल, हाई कोर्ट ने मदरसों के खिलाफ NHRC की जांच पर लगाए गए पिछले 'स्टे' को बरकरार रखा है।
अगली सुनवाई: अदालत ने अब इस मामले में NHRC को आधिकारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस ऐतिहासिक मामले की अगली सुनवाई 11 मई 2026 को तय की गई है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार है जब किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने खुले तौर पर मानवाधिकार आयोगों की प्राथमिकताओं और उनकी 'चुनिंदा सक्रियता' पर इतना गंभीर हमला किया है। यह लेख अब यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मानवाधिकार संस्थाएं वास्तव में केवल प्रशासनिक जांचों का हथियार बनकर रह गई हैं या वे आम नागरिक की जान और माल की सुरक्षा के लिए भी उतनी ही गंभीर हैं?


