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एसीआर छिपाकर पदोन्नति रोकी, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
30-Apr-2026 12:25 PM
एसीआर छिपाकर पदोन्नति रोकी, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

हाईकोर्ट ने डीपीसी में निर्णय लेने उच्च-शिक्षा विभाग को तीन माह का समय दिया

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 30 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग के उस निर्णय को मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध माना है, जिसमें एक महिला सहायक प्राध्यापक को पदोन्नति से वंचित कर दिया गया था। अदालत ने विभाग को निर्देश दिया है कि तीन माह के भीतर रिव्यू विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित कर उन्हें प्रोफेसर पद पर पदोन्नत किया जाए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता डॉ. सुनंदा मरावी को वही वेतनमान (पे-ग्रेड) दिया जाए, जो उनके जूनियर को पदोन्नति के समय मिला था। हालांकि, उन्हें बकाया वेतन (एरियर) का लाभ नहीं मिलेगा।

मामले के अनुसार, डॉ. मरावी शासकीय ई. राघवेंद्र राव स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय, बिलासपुर में पदस्थ हैं। उनको 28 जुलाई 2025 के आदेश के जरिए यह बताया गया कि प्रोफेसर पद के लिए उनकी पात्रता सूची में शामिल करने की मांग अस्वीकार कर दी गई है। इसका आधार यह बताया गया कि वे अपने वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन के मूल्यांकन में न्यूनतम 13 अंक हासिल नहीं कर सकीं।

इस फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने अधिवक्ता राहुल झा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में दावा किया गया कि उन्होंने पदोन्नति के लिए आवश्यक सभी पात्रताएं पूरी की थीं।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2008 से 2012 के बीच के एसीआर को आधार बनाकर उन्हें पदोन्नति से वंचित किया गया, जबकि यह भी स्पष्ट तथ्य है कि ये एसीआर समय पर उन्हें बताए ही नहीं गए थे। विशेष रूप से वर्ष 2011 की प्रतिकूल प्रविष्टि की जानकारी 14 साल बाद वर्ष 2025 में दी गई, जो अत्यंत विलंबित थी।

अदालत ने कहा कि एसीआर का उद्देश्य पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना होता है, ताकि कर्मचारी को अपने मूल्यांकन की जानकारी मिल सके और वह समय पर आपत्ति दर्ज कर सके। जब यह प्रक्रिया ही बाधित हो जाए, तो ऐसे एसीआर के आधार पर पदोन्नति रोकना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने विभाग को रिव्यू डीपीसी बुलाकर नियमानुसार पदोन्नति देने का निर्देश दिया। इस प्रकरण में राज्य शासन के उच्च शिक्षा सचिव, आयुक्त उच्च शिक्षा और संबंधित महाविद्यालय के प्राचार्य को पक्षकार बनाया गया था।

 

 


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