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-उमंग पोद्दार
बुधवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन ने एक मामले में सुनवाई टालते हुए अपने लिखित आदेश में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) पर कड़ी टिप्पणी की.
उन्होंने कहा कि देश के मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में भी दखल देने की कोशिश कर रहे हैं, जो असल में अदालत में आने चाहिए.
उन्होंने लिखा कि जिन मामलों में मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमला होता है, कभी-कभी उनकी हत्या (लिंचिंग) तक हो जाती है, और आरोपियों के ख़िलाफ़ ठीक से केस दर्ज नहीं होता या जांच सही तरीके से नहीं होती.
उन्होंने लिखा कि ऐसे मामलों में खुद से संज्ञान लेने के बजाय, मानवाधिकार आयोग उन मामलों में पड़ता दिखता है जो पहली नज़र में उससे जुड़े नहीं होते.
कौन से मामले की थी सुनवाई
फरवरी 2025 में एनएचआरसी के पास एक शिकायत आई थी कि उत्तर प्रदेश में 588 मदरसों को सरकारी अनुदान मिल रहा है, लेकिन वे ज़रूरी अच्छी इमारत, योग्य शिक्षक जैसे पैमाने को पूरा नहीं कर रहे.
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि शिक्षकों की नियुक्ति रिश्वत देकर हो रही है और यूपी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारी भी इसमें शामिल हैं.
इसके बाद एनएचआरसी ने उत्तर प्रदेश की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग को इन आरोपों की जांच कर रिपोर्ट देने को कहा था.
एनएचआरसी के इस आदेश के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई, जिसकी सुनवाई जस्टिस श्रीधरन की अगुवाई वाली दो जजों की बेंच कर रही थी.
इस मामले में याचिकाकर्ता ने सुनवाई टालने की मांग की, जबकि यूपी सरकार के वकील इसका विरोध कर रहे थे.
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि पहली नज़र में इस मामले में कोई मानवाधिकार का मुद्दा नज़र नहीं आता.
हालांकि, उनके साथ बैठे दूसरे जज जस्टिस विवेक सारन ने कहा कि वे एनएचआरसी के ख़िलाफ़ की गई टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं, क्योंकि आयोग की ओर से इस मामले में कोई पक्ष मौजूद नहीं था.
फिर भी, उन्होंने मामले में सुनवाई टालने की बात से सहमति जताई. अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होगी. (bbc.com/hindi/)


