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सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधानपीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है, और इस मंदिर में महिलाओं को दाखिला दिया जाए, या नहीं, इस मुख्य मुद्दे पर बहस के साथ-साथ धर्म और आस्था के कई दूसरे मामलों पर भी दिलचस्प और महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण करने, और सडक़ों को घेरने को लेकर जजों ने बड़ी सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि किसी धार्मिक गतिविधि के नाम पर, मंदिर के वार्षिक उत्सव, या रथयात्रा के नाम पर मंदिर के आसपास की सभी सडक़ों को बंद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, जो कि धार्मिक गतिविधि का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी है। जजों ने कहा कि अगर धार्मिक आयोजनों के कारण धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां, या नागरिकों के सामान्य अधिकार प्रभावित होते हैं, तो राज्य सरकार को दखल देने, और इसे नियमित करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि धार्मिक सम्प्रदायों को अपनी पूजा पद्धति के प्रबंधन की स्वायत्तता है, लेकिन यह स्वायत्तता सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे, या आवश्यक नागरिक कार्यों में बाधा डालने तक फैली हुई नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार बिना सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के नहीं हो सकता, अराजकता नहीं चल सकती। जजों ने कहा कि प्रबंधन का यह मतलब नहीं है कि इंतजाम का कोई ढांचा ही न हो, संविधान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
हमने अभी चार-छह दिन पहले ही इसी जगह पर सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ में चल रही इस बहस के कई दिलचस्प पहलुओं को लेकर लिखा था, और पाठकों को सुझाया था कि लोकतंत्र, न्याय, और आस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं वाले इस मामले के फैसले के पहले भी इसमें चल रही बहस को भी लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, क्योंकि इन तमाम पहलुओं की महत्वपूर्ण व्याख्या सुनना अपने आपमें लोगों की चेतना बढ़ाने वाला है। अब जजों ने यह कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब सार्वजनिक असुविधा पैदा करना नहीं है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस मुद्दे पर यह लिखते आए हैं कि धार्मिक निर्माण आमतौर पर सरकारी या सार्वजनिक जगह पर कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियमों के खिलाफ किए जाते हैं। इन जगहों पर आने वाले लोगों की सुविधा के किसी भी नियम को माना नहीं जाता है, और किसी भी नए धर्मस्थल, उपासनास्थल के उगने के साथ ही आसपास के लोगों का शोरगुल से, ट्रैफिक जाम से जीना हराम करने की गारंटी कर ली जाती है। धर्म के नाम पर लोग ऐसे एकजुट हो जाते हैं कि मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च, या मजार-प्रतिमा, जो भी हो, उन सबको प्रशासन शांतिभंग होने की आशंका बताकर छूने से भी इंकार कर देता है। अगर बिना भेदभाव के सभी धर्मों की जगहों पर एक सरीखी कार्रवाई हो, तो कोई तनाव खड़ा नहीं होता। हम बनारस और दूसरे कई तीर्थस्थानों में लगातार देख रहे हैं कि किस तरह तंग सडक़ को चौड़ा गलियारा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पुराने-पुराने मंदिरों को भी तोड़ दिया गया, और लोगों ने उफ भी नहीं किया। हिन्दूवादी सरकारों के राज में भी ऐसा किया गया, और इसके बाद दूसरे धर्मों के लोगों को भी यह समझ आ गया कि अवैध कब्जा और अवैध निर्माण चल नहीं सकता, इसके साथ-साथ जब सार्वजनिक सुविधाएं बढ़ाने की बात होगी, तो लोगों को अपने मंदिर-मस्जिद हटाने भी पड़ेंगे।
आज भारत में धर्म अराजकता की सीमा को भी पार कर चुका है। बहुत पहले हमने धार्मिक अवैध कब्जों, और अवैध निर्माणों को लेकर जो लिखा था, उसकी हैडिंग बनाई थी- कब तक पांव पसारोगे प्रभु? ईश्वर को खुद को तो धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक एक कण भी बहुत है, क्योंकि वह तो कण-कण में व्याप्त है। कुछ धर्मों में तो ईश्वर को ऐसा अमूर्त मान लिया गया है कि उसकी प्रतिमा या उसकी तस्वीर बनाने पर भी रोक है। लेकिन हमने अपने आसपास हर किस्म के धार्मिक कब्जे देखे हुए हैं। एक सार्वजनिक बगीचे की जगह पर कब्जा करके अदालती छुट्टियों के दो दिनों में एक समुदाय के हजारों लोगों ने श्रमदान करके अवैध निर्माण से पूरा गुरुद्वारा खड़ा कर दिया। स्थानीय प्रशासन और म्युनिसिपल के लिए भी इनको अनदेखा करना सुविधा का होता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही नदी के किनारे के सबसे बड़े दर्शनस्थल पर एक निजी अवैध निर्माण इतना बड़ा किया गया कि बहुत बड़ा मंदिर बना लिया गया, और उसके सामने शायद दर्जनभर दुकानें बना ली गईं। सुप्रीम कोर्ट से उसे तोडऩे का आदेश हुआ, कब्जा हटाने का आदेश हुआ, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को इस पर अमल करवाने का जिम्मा दिया गया, लेकिन इन दुकानों को जरा-जरा सा तोडक़र बाकी पूरा निर्माण उसी तरह छोड़ दिया गया। अब नदी के एक तरफ सुप्रीम कोर्ट तक ने अवैध निर्माण तोडऩे का आदेश दिया, और इसी नदी के ठीक दूसरी तरफ इससे भी बड़ा अवैध निर्माण नदी की चौड़ाई के हिस्से में बना लिया गया। धर्म के नाम पर अवैध कब्जा, अवैध निर्माण, और अराजकता इतने आम हैं कि उससे बचा हुआ भारत का शायद ही कोई हिस्सा हो।
मस्जिदों में दिन में पांच बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए लाउडस्पीकरों पर अजान होती है, और मंदिरों में हर दिन घंटे-दो घंटे, या चौबीसों घंटे लाउडस्पीकर बजाया जाता है, और इन दो धर्मों के बीच चल रहे मुकाबलों में गुरुद्वारों के बाहर लगाए गए लाउडस्पीकर भी शामिल हो जाते हैं। और तो और कबीर जयंती पर हमने अपने शहर में सबसे मुख्य सडक़ पर कई किलोमीटर तक हर खम्भे पर लाउडस्पीकर लगाकर कबीर के भजन बजते देखे हैं, सुने हैं, और झेले हैं। जो कबीर मस्जिद की मीनार पर चढक़र मुल्ला के बाग देने के खिलाफ सैकड़ों बरस पहले लिख चुका था, आज उसी कबीर के लिखे हुए पर बने फिल्मी संगीत वाले गानों को बजाते हुए पूरे शहर का जीना हराम कर दिया जाता है। किसी भी धर्म के त्यौहार पर सडक़ किनारे भंडारे लगाए जाते हैं, समाज के लोगों से चंदा इकट्ठा किया जाता है, गैरभूखे लोगों को खिलाया जाता है, और हजारों लोगों के पत्तल-दोने, उनकी गिलासों का कचरा चारों तरफ छोड़ दिया जाता है। धार्मिक जुलूस को लेकर हाईकोर्ट बरसों से लगा हुआ है कि उनमें बजने वाले डीजे के शोरगुल से इस राज्य में कई मौतें भी हो चुकी हैं, लेकिन दर्जनों हलफनामे देने के बाद भी सरकार इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करती, और हमें लिखना पड़ता है कि हाईकोर्ट घर के उस बुजुर्ग की तरह होकर रह गया है जिसकी बड़बड़ाहट को परिवार के कोई नहीं सुनते।
आज देश में धर्म के नाम पर फैलाया जा रहा उन्माद, नफरत और साम्प्रदायिकता, कट्टरता, ये सब बातें देश के आगे बढऩे की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन चुकी हैं। हर त्यौहार तरह-तरह की दहशत लेकर आता है, और अब तो इन त्यौहारों का ऐसा हिंसक इस्तेमाल होने लगा है कि अपने धर्मस्थल के सामने खुशियां मनाने के बजाय दूसरे धर्म के धर्मस्थल पर चढक़र झंडे फहराने, उसके सामने लाउडस्पीकरों पर उस धर्म के लिए गंदी गालियां देने, सडक़ किनारे से मांसाहारी ठेले-खोमचों को उठाकर फेंक देने, इन खोमचे-ठेले, खानपान की दुकानों पर साम्प्रदायिक शर्तें लादने की बात आम हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट एक तरफ तो सबरीमाला की सुनवाई के दौरान सभी धर्मों को लेकर एक बराबरी की नसीहत की बात कर रहा है, लेकिन इन 9 जजों में से कितने ऐसे जज हैं जिन्होंने पिछले बरसों में सार्वजनिक रूप से भडक़ाई जा रही हिंसा और साम्प्रदायिकता के खुले सुबूतों को देखते हुए उन पर कार्रवाई की हो? जब संविधान ने इन जजों को यह अधिकार भी दिया है, जिम्मेदारी भी दी है कि वे खुद होकर देश की किसी भी घटना पर केस चलाना शुरू कर सकते हैं, तो उस वक्त वे घटनाओं के मौन गवाह बने रहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने और भागने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। आज भी सुप्रीम कोर्ट के ये बड़े-बड़े जज जो सैद्धांतिक बातें कर रहे हैं, हर कुछ हफ्तों में होने वाली सार्वजनिक साम्प्रदायिक हिंसा पर इन्होंने क्या किया था, यह सवाल भी उठता है। असल घटनाओं को अनदेखा करना, और बाद में मसीहाई अंदाज में सैद्धांतिक नसीहत देना, यह कोई सुप्रीम कोर्ट से सीखे। जब हमारे जैसे छोटे और कमजोर लोग असल जमीनी मुद्दों को उठाते हैं, तब देश के सबसे बड़े जज अपनी ऊंची मीनारों की सबसे ऊंची मंजिलों पर बैठे कागजी बहस में उलझे रहते हैं। अब कल की जिस बहस को लेकर हम जजों की कही बातें यहां पर लिख रहे हैं, इन्हीं को देख लिया जाए, कि ये जज आने वाले हफ्तों और महीनों में सडक़ों पर होने वाली हिंसा, और अराजकता पर क्या करते हैं? अमूर्त मुद्दों पर लिखना-बोलना, और जलती-सुलगती जमीनी हकीकत को अनदेखा करना, यह किसी अदालत को कोई सम्मान नहीं दिला सकता। संवैधानिक अधिकार मिले हुए जजों की जरूरत देश को असली नौबत और जरूरत रहने पर पड़ती है, प्रवचन के लिए नहीं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


