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सरकारी तंत्र और 'बिग-4' कंपनियों के बीच बढ़ती खतरनाक नजदीकियां
25-Apr-2026 5:01 PM
सरकारी तंत्र और 'बिग-4' कंपनियों के बीच बढ़ती खतरनाक नजदीकियां

नईदिल्ली, 25 अप्रैल। देश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों 'बिग-4' ऑडिट कंपनियों और ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों के बीच के 'रोमांस' की खूब चर्चा है। इन्फोसिस के पूर्व सीएफओ मोहनदास पई ने एक बड़ा सवाल उठाकर इस बहस को हवा दे दी है कि आखिर क्यों इन दिग्गज कंपनियों के पे-रोल पर बड़े सरकारी अधिकारियों के रिश्तेदार मौजूद हैं। पई का सीधा आरोप है कि एक तरफ ये कंपनियां बड़े सरकारी ठेके जीत रही हैं और दूसरी तरफ अधिकारियों के करीबियों को नौकरियां दे रही हैं, जो सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' का मामला बनता है। 

येल यूनिवर्सिटी के लेक्चरर सुशांत सिंह ने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा है कि आरबीआई से लेकर ईडी तक, अब हर सरकारी जांच और ऑडिट में इन विदेशी कंपनियों की पैठ इतनी गहरी हो गई है कि वे अब नीतियां बनाने और टेंडर डिजाइन करने में भी शामिल हैं।

आंकड़ों की बात करें तो 2017 से 2022 के बीच लगभग 308 सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स, जिनकी कीमत 500 करोड़ रुपये से ज्यादा है, पीडब्ल्यूसी, डेलॉयट, ईवाई और केपीएमजी की झोली में गए हैं। करीब 16 मंत्रालयों ने अपना काम इन कंपनियों को आउटसोर्स किया है। दरअसल, इन कंपनियों के लिए ये करोड़ों की फीस उतनी मायने नहीं रखती, जितना कि सत्ता के करीब पहुँचने का मौका। इन कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए उन्हें यह पता चल जाता है कि सरकार भविष्य में क्या कदम उठाने वाली है। एक पूर्व आईएएस अधिकारी के मुताबिक, ये कंपनियां मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन्स और सरकार के बीच एक बिचौलिए का काम करने लगी हैं, जिससे कॉर्पोरेट हितों के मुताबिक सरकारी नीतियां प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है।

इस पूरे खेल का सबसे बुरा असर भारतीय सीए (CA) फर्मों पर पड़ रहा है। आईसीएआई के सदस्य मधुकर हिरेगंगे का कहना है कि सरकारी टेंडर की शर्तें ही कुछ इस तरह बनाई जाती हैं कि छोटी या मध्यम भारतीय फर्में उनमें फिट ही न बैठ सकें। टेंडर के लिए 500 करोड़ का टर्नओवर या सैकड़ों कर्मचारियों की जो शर्त रखी जाती है, वह हकीकत में भारतीय फर्मों को बाहर रखने का एक 'फिल्टर' है। कुछ टेंडर्स में तो ऐसी अजीबोगरीब शर्तें डाल दी जाती हैं, जैसे फॉरेंसिक ऑडिट के आधार पर कोर्ट के पुराने फैसले दिखाना, जिन्हें पूरा करना सालों का काम है। जानकारों का कहना है कि जानबूझकर ऐसी शर्तें चुनी जाती हैं जिनसे केवल गिने-चुने ग्लोबल प्लेयर्स ही मैदान में टिक सकें।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2017 में 'देसी बिग-4' बनाने का जो सपना देखा था, वह आज करीब दस साल बाद भी सिस्टम की पेचीदगियों में उलझा हुआ है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि टेंडर में टर्नओवर के बजाय पार्टनर्स के अनुभव को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और संसाधनों की बेतुकी शर्तों को हटाया जाना चाहिए। जब तक नियम इन बड़ी कंपनियों के पक्ष में बने रहेंगे, तब तक भारतीय फर्मों के लिए ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करना नामुमकिन बना रहेगा। यह महज़ इत्तेफाक नहीं हो सकता कि जो कंपनियां सरकार को सलाह दे रही हैं और टेंडर की रूपरेखा बना रही हैं, वही अंत में उन्हें जीत भी रही हैं। (एक्स पर पोस्ट जानकारी गूगल जैमिनी से तैयार)

भारतीय फर्मों के लिए मुख्य चुनौतियां

अतार्किक 'पास्ट एक्सपीरियंस' की शर्त: टेंडर में अक्सर '5 कोर्ट जजमेंट' मांगने जैसी शर्तें भारतीय फर्मों को बाहर कर देती हैं, क्योंकि उनके पास भले ही तकनीकी दक्षता हो, लेकिन वे 'ग्लोबल ब्रांडिंग' वाले कागजात नहीं जुटा पातीं।

क्वालिटी बनाम कॉर्पोरेट वजन: सरकारी टेंडर्स 'क्वालिटी' के बजाय 'कॉर्पोरेट वेटेज' (कितने बड़े ऑफिस हैं या कितने लोग काम पर हैं) को प्राथमिकता देते हैं। एक 1000 सदस्यों वाली फर्म, जिसमें पार्टनर्स के पास दशकों का अनुभव है, उसे केवल इसलिए बाहर कर दिया जाता है क्योंकि उसका ऑफिस 'स्क्वायर फीट' में कम है।

प्रतिभा का पलायन: बिग-4 के पास सरकारी टेंडर्स का अंबार होने के कारण वे बेहतरीन सीए और एमबीए ग्रेजुएट्स को ऊंचे पैकेज पर हायर कर लेती हैं। इसके विपरीत, भारतीय फर्मों को 'पीनट अर्निंग' (कम कमाई) के कारण प्रतिभाएं नहीं मिल पातीं।

स्वदेशी ढांचे का अनदेखा होना: आईसीएआई  के पास पहले से ही 'पियर रिव्यू' और 'एकेडमी ऑफ क्वालिटी मैनेजमेंट' (AQMM) जैसे फ्रेमवर्क हैं जो फर्म की साख और गुणवत्ता प्रमाणित करते हैं। सरकारी टेंडर्स में इनका उपयोग करने के बजाय, विदेशी मानकों (जैसे turnover) को प्राथमिकता दी जाती है।


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