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फैसले में रिकॉर्ड किया और सुनवाई से खुद को बाहर किया
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 19 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक ऐसी घटना हुई है, जो शायद पहले कभी नहीं हुई। एक डिवीजन बेंच ने बेंच हंटिंग को रोकने के लिए जारी सर्कुलर पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह सर्कुलर चीफ जस्टिस के दफ्तर से जारी किया गया है। हालांकि जिस मामले की सुनवाई के पहले यह सर्कुलर जारी हुआ था, उससे डिवीजन बेंच ने खुद को अलग कर लिया है।
हाईकोर्ट में जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस एन के व्यास के सामने सुनवाई के लिए एक मामला आया। सुनवाई के दौरान पता चला कि इसमें से एक अधिवक्ता बेंच के एक जज के रिश्तेदार हैं। इस पर अदालत ने कहा कि फैसले में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि बेंच इस सुनवाई से अलग हो जाए। एडवोकेट्स एक्ट्स के तहत बनाए गए व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार नियम के हवाले से स्पष्ट किया गया कि किसी जज और वकील के बीच यदि पारिवारिक संबंध हो तो वकील को उस अदालत की पेशी में हाजिर नहीं होना चाहिए, किसी दूसरी बेंच में मामले को सूचीबद्ध किया जाए।
यहां तक तो सब ठीक था, मगर मामला बिगड़ गया जब चीफ जस्टिस के आदेश पर रजिस्ट्रार, न्यायिक की ओर से उसी दिन एक सर्कुलर निकल गया। इस सर्कुलर में कहा गया कि जजों को बेंच हंटिग, यानि बेंच का शिकार करने करने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए। चीफ जस्टिस का यह आदेश संयोगवश उसी डिवीजन बेंच के मामले पर था या नहीं, लेकिन डिवीजन बेंच जब तक सुनवाई से खुद को अलग करने जा रही थी, उससे पहले ही यह सर्कुलर जारी हो गया। तब दोनों जजों की खंडपीठ ने इस सर्कुलर को बड़ी गंभीरता से लिया। खंडपीठ ने खुद को सुनवाई से अलग तो किया ही, साथ ही आदेश में लिखा कि किसी मामले की सुनवाई के दौरान उसे बेंच हंटिंग माना जाएगा या नहीं, यह तय करना उस खंडपीठ का विशेषाधिकार है। इस तरह का निर्देश दिया जाना न्यायालय के कामकाज में हस्तक्षेप जैसा प्रतीत होता है।
सर्कुलर में कहा गया था कि किसी बेंच से छूट या अपवाद मांगना सामान्य नियम नहीं होगा और इसे केवल दुर्लभ व वास्तविक परिस्थितियों में ही स्वीकार किया जाएगा। वकीलों को सलाह दी गई थी कि ऐसे मामलों में ब्रीफ लेने से बचें या वापस कर दें। साथ ही, विशेष परिस्थितियों में मामलों को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया गया था।


