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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मालिक के प्रति वफादार नौकर की तरह जजों को संविधान के प्रति वफादार होना चाहिए
सुनील कुमार ने लिखा है
25-Feb-2026 2:40 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : मालिक के प्रति वफादार नौकर की तरह जजों को संविधान के प्रति वफादार होना चाहिए

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन एक बार फिर विवादों में हैं। उनके ताजा बयान, जो 23 फरवरी 2026 को तमिलनाडु के होसुर में एक आध्यात्मिक कार्यक्रम ‘गुरू वंदना उत्सव’ में दिए गए, उसने देशभर में बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि जो लोग आध्यात्मिक गुरुओं को भगवान का रूप नहीं मानते, वे ‘रास्कल्स (दुष्ट), फूल्स (मूर्ख) और बार्बेरियंस (बर्बर)’ हैं। उन्होंने यह बयान तमिलनाडु के कुछ रेशनलिस्टों (तर्कवादियों) के खिलाफ दिया, जो उनके अनुसार गुरु-भक्ति को मूर्खता बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘तमिलनाडु में कुछ लोग खुद को रेशनलिस्ट कहते हैं। वे हमें गुरु को भगवान का रूप मानने पर ‘दुष्ट, मूर्ख और बर्बर’ कहते हैं। मैं कहता हूं कि ऐसे कहने वाले खुद दुष्ट, मूर्ख और बर्बर हैं।’ उन्होंने गुरुओं को ‘भगवान का जीवंत रूप’ बताया और कहा कि गुरु की निकटता से ‘आध्यात्मिक आभा’ मिलती है, जो व्यक्तिगत कमजोरियों को दूर करती है। यह बयान उनकी नौकरी के सेवा के बाकी चार सालों में उनके आलोचकों को और भडक़ा रहा है। यह बयान जस्टिस स्वामीनाथन की हिंदू धर्म और आध्यात्मिक झुकाव वाली छवि को मजबूत करता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि एक जज के रूप में उन्हें सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) रहना चाहिए। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल हो गया है, जहां कुछ ने इसे ‘धार्मिक कट्टरता’ कहा, जबकि समर्थकों ने इसे ‘आस्था की रक्षा’ बताया। रेशनलिस्ट ग्रुप्स ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताया, क्योंकि जज का पद सार्वजनिक बयानों में निष्पक्षता मांगता है। यह बयान उनके पहले के विवादों से जुड़ता है, जहां वे धार्मिक मुद्दों पर बोलते रहे हैं। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन मदुरै बेंच के जज हैं और कई हाई-प्रोफाइल केस संभाल चुके हैं। उनके फैसले और बयान अक्सर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस छेड़ते हैं। उदाहरणस्वरूप, दिसंबर 2025 में तिरुपरनकुंड्रम दरगाह के पास ‘दीपाथून’ (एक पत्थर का स्तंभ) पर दीपक जलाने का आदेश दिया, जो एक हिंदू परंपरा है। उन्होंने राज्य सरकार के कानून-व्यवस्था बिगड़ जाने के तर्क को खारिज किया और कहा कि ‘कानून-व्यवस्था’ कोर्ट के आदेशों को न मानने का बहाना नहीं बन सकता। यह आदेश 1 दिसंबर 2025 को आया, जब एक हिंदू की याचिका पर सुनवाई हुई। दरगाह के वकील ने कहा कि सुनवाई में उन्हें बोलने नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन था।

इस केस ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को जन्म दिया। दिसंबर 2025 में 107 से ज्यादा सांसदों (डीएमके, कांग्रेस, अन्य इंडिया ब्लॉक पार्टियां) ने लोकसभा स्पीकर को प्रस्ताव दिया। आरोप लगाया गया कि पक्षपात, सेकुलरिज्म के खिलाफ काम, ‘एक विशेष राजनीतिक विचारधारा’ से प्रभावित फैसले, और ‘एक विशेष समुदाय’ (ब्राह्मण) के वकीलों को उपकृत करते हैं। सांसदों ने 13-पॉइंट प्रतिनिधित्व पहले राष्ट्रपति और देश के मुख्य न्यायाधीश को दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर महाभियोग प्रस्तुत किया। आलोचकों ने कहा कि यह जज को दबाने-धमकाने की कोशिश है। महाभियोग अभी पेंडिंग है, क्योंकि स्पीकर को इसे स्वीकार या रिजेक्ट करना है। कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि फैसलों से असहमति महाभियोग का आधार नहीं हो सकती, सिर्फ साबित हो रहा दुराचार ही इसका आधार हो सकता है।

जस्टिस स्वामीनाथन पहले भी अपने कई सार्वजनिक बयानों में और अदालती फैसलों-आदेशों में अपना हिंदुवादी रुख दिखाते रहे हैं। 2023 में उन्होंने कहा- ‘अगर हम वेदों की रक्षा करेंगे, तो वेद हमारी रक्षा करेंगे’ उन्होंने कहा अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक बहस में यह कहा था- ‘देश का संविधान इसकी आबादी के धर्म के अनुपात (डेमोग्राफिक प्रोफाइल) पर निर्भर करता है।’ यहां यह उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु देश में दलित राजनीति का एक बड़ा केंद्र है, और वहां पर हिंदू धर्म से जुड़े हुए मुद्दों को दलितों के नजरिए से भी देखा जाता है। ऐसे में जस्टिस स्वामीनाथन का वाचाल होना और खुलकर एक धर्म की मान्यताओं का साथ देना विवाद खड़ा करते ही रहता है।

लेकिन भारत के हाईकोर्ट और यहां के सुप्रीम कोर्ट के जजों के पहले के भी कुछ बयान, फैसले, और व्यक्तिगत जीवन की उनकी मान्यताएं विवाद खड़े करती रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रहे आरएम लोढ़ा ने 2014 में राजस्थान के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से सतीप्रथा को महिलाओं के त्याग और पवित्रता का प्रतीक बताया था। इस प्रथा के आलोचक सतीप्रथा को विधवा-दहन की तरह देखते हैं, जिसके खिलाफ कड़े कानून हैं। ऐसे आलोचकों ने जस्टिस लोढ़ा की जमकर आलोचना की थी। महिला अधिकार समूहों ने इस बयान की कड़ी आलोचना की थी और जजों से उनके बयानों पर काबू करने की मांग की थी। यह बयान जस्टिस लोढ़ा ने रिटायरमेंट के बाद अदालत के बाहर दिया था। एक दूसरे मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गाय से जुड़े एक फैसले में अदालत में कहा था कि मोर जीवन भर ब्रह्मचारी रहता है और यौन संबंध से बच्चे पैदा नहीं करता। इसके साथ ही उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सिफारिश की थी और कहा था कि गाय दिव्य रहती है।

ऐसे बहुत से मामले और भी हैं लेकिन उन सबका जिक्र करने पर यह पूरा पेज ही उनसे भर जाएगा। हम इतने नमूने पेश करने के बाद अब अपनी राय रखना चाहते हैं कि जिन ऊंची अदालतों के जजों से हर धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, पेशे, और लिंग के लोगों को इंसाफ की उम्मीद रहती है, उन्हें अदालत के भीतर, या अदालत के बाहर बकवासी नहीं होना चाहिए। जिस दिन इस देश में संविधान लागू हो गया उस दिन कोई भी दूसरी आस्था, धार्मिक परंपरा, या धार्मिक ग्रंथ संविधान के शब्दों और उसकी भावनाओं के ऊपर नहीं रह गए। किसी भी लोकतंत्र में आस्था और संविधान के बीच कुश्ती नहीं चल सकती। भारत में अक्सर ही बहुसंख्यक तबकों से आए हुए जजों के ऐसे बयान आए हैं जिन्होंने अपने धर्म, या बहुसंख्यकवाद का हवाला देते हुए, उसका जिक्र करते हुए इस बात का खुलकर प्रदर्शन किया है कि उनका धार्मिक रूझान क्या है। लोकतंत्र में जिन बड़े जजों को संविधान की भी व्याख्या करने, जरूरत पडऩे पर उस पर भी सवाल उठाकर संसद को गौर करने की सिफारिश करने के हक हासिल हैं, उन्हें अपनी निजी आस्था से उपजे बेइंसाफ इरादों को किसी भी मंच से उजागर नहीं करना चाहिए। इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि धर्म, आध्यात्म, या इससे संबंधित मुद्दों को लेकर अगर उनका एक मजबूत पूर्वाग्रह है, तो उन्हें ऐसे मामलों की सुनवाई से भी अपने को अलग कर देना चाहिए। हम तो इसे एक बुनियादी जरूरत मानते हैं कि एक जज निष्पक्ष, न सिर्फ रहे, बल्कि दिखे भी। अदालत में उन्हें इस ऊंची कुर्सी पर किसी धर्मग्रंथ ने नहीं बैठाया है, उन्हें संविधान ने यह इज्जत दी है, हर नौकर को मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिए जो कि इस मामले में संविधान है।

भारत के लोकतंत्र में एक-एक कर सभी स्तंभों के प्रति लोगों की आस्था कमजोर होती जा रही है। सरकार, संसद, अदालत, और स्वघोषित चौथा स्तंभ, प्रेस को भी आस्था के इस स्खलन को घटाने की कोशिश करनी चाहिए।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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