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गुजरात हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि, "पत्नी के मायके में बिना बताए रात बिताने पर पति एक बार थप्पड़ मारता है तो यह क्रूरता नहीं माना जाएगा. इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A के तहत वैवाहिक क्रूरता का अपराध नहीं माना जाएगा."
बार एंड बेंच के मुताबिक़, जस्टिस गीता गोपी ने यह टिप्पणी उस समय की जब उन्होंने एक व्यक्ति को बरी कर दिया. उस व्यक्ति को पहले सेशंस कोर्ट ने पत्नी के साथ क्रूरता करने और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया था.
जज ने अपनी टिप्पणी में कहा, "पत्नी के मायके में बिना बताए रात बिताने पर पति की ओर से एक बार थप्पड़ मारने की घटना को आपराधिक क्रूरता नहीं माना जा सकता."
जस्टिस गीता गोपी ने कहा कि भले ही लगातार मारपीट के आरोप लगाए गए थे, लेकिन कभी भी पुलिस या समाज के बुज़ुर्गों के सामने कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई. इसके अलावा, ऐसी मारपीट से चोट लगने का कोई मेडिकल सबूत या इलाज का काग़ज़ भी पेश नहीं किया गया.
कोर्ट ने अभियुक्त की आपराधिक अपील को मंज़ूरी दी. इस अपील में उसने 2003 में वलसाड की सेशंस कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराया गया था.
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.) (bbc.com/hindi)


