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दस साल की लड़ाई के बाद जीत! सीयू के दैनिक वेतनभोगी हुए नियमित
19-Feb-2026 11:39 AM
दस साल की लड़ाई के बाद जीत! सीयू के दैनिक वेतनभोगी हुए नियमित

हाईकोर्ट ने परिणामी लाभ देने की समय सीमा तय की  

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 19 फरवरी। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों की लंबी कानूनी लड़ाई आखिर रंग लाई। नियमितीकरण को लेकर दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट में आदेश पेश कर बताया कि कर्मचारियों को पहले ही नियमित किया जा चुका है। अब कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी लंबित लाभ 24 अप्रैल तक दे दिए जाएं।

इन कर्मचारियों को राज्य शासन के उच्च शिक्षा विभाग ने 22 अगस्त 2008 को आदेश जारी किया था। इसके बाद तत्कालीन कुलपति प्रो. एल.एम. मालवीय ने 26 अगस्त 2008 को दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण का आदेश जारी किया। इससे पहले 22 जुलाई 2008 को विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक में भी यह प्रस्ताव पारित हो चुका था। वहीं 5 मार्च 2008 को राज्य सरकार ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर परिपत्र जारी किया था। इस बीच 15 जनवरी 2009 को विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय बना और केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 लागू हुआ। नियम था कि कर्मचारियों की सेवा शर्तें राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना नहीं बदली जाएंगी। इधर, मार्च 2009 में विश्वविद्यालय ने पहले जारी नियमितीकरण आदेश को वापस ले लिया और कर्मचारियों को फिर से दैनिक वेतन के आधार पर भुगतान शुरू कर दिया।

इस फैसले को मो. हारून, मेलाराम और अन्य कर्मचारियों ने अधिवक्ता दीपाली पांडे के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हालिया सुनवाई में विश्वविद्यालय ने 16 फरवरी का आदेश पेश कर बताया कि कर्मचारियों को 26 अगस्त 2008 से नियमित माना गया है। साथ ही, अन्य लाभों को लेकर यूजीसी और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से परामर्श की बात कही गई।

न्यायमूर्ति पार्थ प्रतिम साहू ने सवाल किया  कि जब नियमित कर दिया है, तो बाकी बकाया और लाभ कब देंगे? इस पर विश्वविद्यालय ने समय मांगा। कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करने का निर्णय लिया और 24 अप्रैल तक सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।

मालूम हो कि एकल पीठ ने पहले ही कर्मचारियों को सभी लाभों के साथ नियमित करने का आदेश दिया था। विश्वविद्यालय ने इसे खंडपीठ में चुनौती दी, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली थी। इसके बाद विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की, जो खारिज हो गई। बाद में  पुनर्विचार याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। इसके बाद धन्नू पांडे और अन्य कर्मचारियों ने विश्वविद्यालय प्रबंधन के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की। उनकी ओर से अधिवक्ता प्रकाश तिवारी ने पैरवी की।


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