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भारतीय अंडर-19 वर्ल्ड कप में शानदार बल्लेबाजी से रिकॉर्ड बनाने वाले नए खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी को अब दसवीं का इम्तिहान देना है। जिन लोगों ने उसके मैच देखे हैं, उन्हें कुछ हैरानी होगी कि क्या इतनी कामयाबी के बाद दसवीं का इम्तिहान देना और उसे पास करना जरूरी होना चाहिए, या कि खेल में ऐसी उत्कृष्टता को ही पढ़ाई भी मान लेना चाहिए? वैभव सूर्यवंशी के बारे में मामूली सी सर्च बताती है कि बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर/मोतीपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार के इस बेटे के पिता खुद भी एक क्रिकेटर बनना चाहते थे लेकिन साधन-सुविधा न होने से नहीं बन पाए। अपने बेटे के सपने पूरे करने के लिए उन्होंने अपने खेत बेच दिए, मां सुबह चार बजे उठकर खाना बनाती थीं, ताकि वे क्रिकेट-प्रैक्टिस के लिए समय पर निकल सकें। अभी की खबर है कि वैभव की क्रिकेट-व्यस्तताओं के चलते उसने तय किया है कि वह इस साल परीक्षा नहीं देगा, और अगले बरस इसमें शामिल होगा।
चीन के बारे में कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि वहां खेल संघों के चयन अधिकारी शहर-कस्बों की गलियों में खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चों में से ही प्रतिभाओं को पहचानते हैं, और उन्हें परिवार की इजाजत से ले जाकर खेल छात्रावासों में रखकर बरसों तक सिर्फ खेल की तैयारी करवाई जाती है, नतीजा यह निकलता है कि वे किशोरावस्था में ही गोल्ड मैडल लाने लगते हैं। देश के लिए मैडल तो ठीक है, लेकिन ऐसी तैयारी इन बच्चों के विकास के लिए कितनी अच्छी या कितनी बुरी होती है, अभी हम उस पर नहीं जा रहे हैं। अभी हम वैभव सूर्यवंशी जैसे होनहार खिलाडिय़ों पर पढ़ाई और परीक्षा के दबाव को लेकर चर्चा करना चाहते हैं, और दुनिया के कई विकसित देशों में ऐसी खेल प्रतिभाओं के लिए क्या रियायतें रहती हैं, उसे देख रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, और अमरीका जैसे विकसित देशों में ऐसे खिलाडिय़ों की ट्रेनिंग की जरूरतें पूरी हो जाने के बाद उनके बचे हुए समय के लिए फ्लैक्सिबल स्कूलिंग का इंतजाम रहता है, जो बाकी समय में पढ़ाई और परीक्षा करवाते हैं। अमरीका जैसे देशों में ऐसे खिलाडिय़ों के लिए ऑनलाइ स्कूलें हैं, जहां की पढ़ाई वे दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए, खेल की तैयारी करते हुए, या मुकाबलों में शामिल होते हुए कर सकते हैं, इम्तिहान दे सकते हैं। इन देशों में बड़े खेल-क्लब, खेल अकादमियां, और खेल-संघ अपने युवा खिलाडिय़ों के लिए खेल प्रशिक्षकों के अलावा व्यक्तिगत ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों का इंतजाम भी करते हैं, ताकि दोनों में से कोई न पिछड़े। कुछ देश गैप-ईयर, और क्रेडिट-सिस्टम रखते हैं जिसमें ऐसे छात्र-छात्राओं को पढ़ाई कुछ समय के लिए रोक देने, टुकड़ों में पूरा करने जैसी छूट रहती हैं, जिससे वे मानसिक तनाव से मुक्त रहते हैं। बड़े स्कूलों में यह नियम रहता है कि जब खिलाडिय़ों की टीम कहीं बाहर सफर करती है, तो उनके साथ पढ़ाने वाले कोई शिक्षक भी जाते हैं ताकि खाली समय में वे पढ़ा सकें। कहीं-कहीं पर बच्चों को स्कूल न आने की छूट मिलती है, और स्कूल उनके लिए अलग से होमवर्क देता है। जर्मनी में खेल से थके हुए बच्चों को क्लासरूम से छुट्टी मिल जाती है, और बाद में एक्स्ट्रा क्लास लगाकर उसकी भरपाई करवाई जाती है।
भारत में अभी होनहार खिलाडिय़ों के लिए कोई लचीला इंतजाम नहीं किया गया है, और उन्हें खेल या पढ़ाई में से किसी एक को छांटना पड़ता है, या दोनों से समझौता करना पड़ता है। सीबीएसई जैसे कुछ बोर्ड कुछ विशेष अनुमति, अतिरिक्त समय, या वैकल्पिक मूल्यांकन जैसी रियायत की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाडिय़ों की पूरी प्रतिभा को प्रोत्साहन देने की अभी कोई ठोस योजना नहीं है।
अब अगर हम खिलाडिय़ों को पढ़ाई से पूरी छूट दे देने, और उसे पढ़ाई के बराबर मान लेने की सिफारिश करें, तो उसके साथ एक खतरा यह लगता है कि सरकार के पास ऐसे खिलाडिय़ों को आगे जाकर कोई रोजगार देने की ठोस योजना तो है नहीं। अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मैडल लेकर आने वाले खिलाडिय़ों को जरूर कुछ राज्यों में नौकरियां मिल जाती हैं, लेकिन अभी तो बात उन तमाम होनहार खिलाडिय़ों की हो रही है जो मैडल की राह पर हैं, मंजिल तक पहुंचे नहीं हैं। हो सकता है कि इनमें से अधिकतर मैडल की मंजिल तक न पहुंचे, और गिने-चुने ही वहां जा पाएं। लेकिन तैयारी के लिए अगर पढ़ाई छोडक़र ये खिलाड़ी केवल खेलते हैं, तो उससे तो उन्हें सरकारी या कोई और नौकरी नहीं मिलती। यह तो तभी हो सकता है, जब उनके लिए बहुत रियायती पढ़ाई वाले कोर्स लागू किए जाएं, उन्हें न्यूनतम योग्यता के आधार पर पास किया जाए, और खेल की उनकी सफलता, और संभावना को देखते हुए उसमें उन्हें नंबर दिए जाएं। इतना लचीलापन अभी भारत की सोच में दिखता नहीं है। अफसोस इसलिए भी होता है कि शिक्षा व्यवस्था का आज जो फौलादी ढांचा है, वह लोगों को न तो नौकरियां दिला पाता है, और न ही किसी निजी रोजगार के लायक तैयार कर पाता है।
वैभव सूर्यवंशी का खेल देखकर जो लोग फिदा हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि दसवीं के इम्तिहान में बैठते-बैठते वह इस साल नहीं बैठ रहा, क्योंकि खेलना बाकी है, और अपने चाहने वालों को और खुश करना भी बाकी है। लेकिन ऐसी खुशी पाने वाला देश अपने इस खिलाड़ी के लिए, ऐसे और बहुत से संभावित-होनहार लोगों के लिए कोई रियायत करने तैयार नहीं है।
सच तो यह है कि इस देश में आम खिलाडिय़ों को न मैदान मिलते, न खेल किट मिलती, और न ही प्रशिक्षक मिलते। आए दिन खबरें छपती हैं कि खिलाड़ी किसी टूर्नामेंट में जा रहे थे, और रिजर्वेशन न होने की वजह से वे ट्रेन के डिब्बे में शौचालय के पास फर्श पर बैठे हुए सफर कर रहे थे, जहां ठहरे थे वहां ठंडी फर्श पर दरी पर सो रहे थे। अभी हम खेल-संघों की राजनीति, खेल-प्रशिक्षकों के हाथों शोषण जैसे और जटिल मुद्दों को यहां पर नहीं जोड़ रहे हैं, क्योंकि रायता उतना फैलाने से आज के इस कॉलम के अंत तक इसे समेटना संभव नहीं होगा। फिर भी इतनी बात तो जरूरी है कि अगर अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के इस माहौल में भारत के प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों को आगे बढ़ाना है, तो उनके लिए क्या-क्या करना होगा, पढ़ाई में, नौकरी में, या किसी रोजगार में उन्हें कैसी रियायत देनी होगी?


