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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 16 फरवरी। पत्नी को जलाकर हत्या करने के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पति को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि केवल एक संदिग्ध मृत्यु-पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) के आधार पर हत्या की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती।
महासमुंद जिले के सवित्रीपुर गांव की रहने वाली सुनीता बिसरा 31 मार्च 2020 को 80 प्रतिशत जली हुई हालत में मिली थीं। उन्हें पहले पिथौरा अस्पताल ले जाया गया, फिर रायपुर के डीकेएस अस्पताल रेफर किया गया। इलाज के दौरान 3 अप्रैल 2020 को उनकी मौत हो गई।
परिजनों ने आरोप लगाया था कि पति राहुल बिसरा ने मिट्टी तेल डालकर आग लगा दी। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया।
29 अप्रैल 2023 को महासमुंद के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश ने आरोपी को दोषी मानते हुए उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में अपील के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि पूरा मामला मृतका के डाइंग डिक्लेरेशन पर आधारित है, जिसे मजिस्ट्रेट के बजाय डॉक्टर ने दर्ज किया था।
यह भी तर्क दिया गया कि सिर्फ होश में होना और बयान देने की मानसिक स्थिति में होना, दोनों अलग बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि बयान की विश्वसनीयता साबित होना जरूरी है।
साथ ही यह भी कहा गया कि कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और तीन दिन तक इलाज के दौरान अन्य जटिलताओं से भी मौत हो सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में आरोप साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी होती है। जब साक्ष्यों में संदेह हो, तो आरोपी को उसका लाभ दिया जाना चाहिए।
अदालत ने माना कि केवल कथित डाइंग डिक्लेरेशन और बरामदगी के आधार पर हत्या सिद्ध नहीं होती। इसलिए आरोपी को बरी करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।
साथ ही यह निर्देश भी दिया गया कि आरोपी छह माह का निजी मुचलका पेश करेगा, ताकि राज्य सरकार यदि सुप्रीम कोर्ट में अपील करे तो उसकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।


