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बस्तर से दुर्दांतों के खात्मे से समुंदर पार पोर्ट ब्लेयर में तैनात श्रीधर भी गदगद
09-Feb-2026 6:42 PM
बस्तर से दुर्दांतों के खात्मे से  समुंदर पार पोर्ट ब्लेयर में तैनात श्रीधर भी गदगद

18-22 तक सुकमा चिंतलनार में लोहा ले चुके थे 

पी श्रीनिवास राव 

पोर्ट ब्लेयर, 9 फरवरी । 2018-22 तक नक्सलियों से मोर्चा लेने के बाद  पोर्टब्लेयर में एनडीआरएफ की कमान संभाले हुए सहायक सेनानी आर  श्रीधर भी बस्तर से दुर्दांतों के खात्मे से बड़े गदगद हैं ‌। सुकमा , चिंतलनार में तैनात रहे आर श्रीधर 4 साल बाद अपनी बदली भूमिका पर कहते हैं कि वहां हमारे हाथ हथियार देख लोग दूर भागते थे यहां कम्युनिटी पुलिसिंग करनी पड़ती है। 

रायपुर से ग‌ए अध्ययन दल के पत्रकारों से चर्चा करते हुए श्रीधर ने बताया कि तीन साल पहले सर्विस स्विच ओवर करते समय एनडीआरएफ की इंटरव्यू टीम ने भी यही सवाल किया था। 
 श्रीधर इस समय पोर्ट ब्लेयर और आसपास के टापू में लोगों को सुनामी से राहत बचाव कार्य की ट्रेनिंग दे रहे हैं।

सुनामी ने जीवन जीने का आधार दिया अंडमान निकोबार द्वीप को 

 उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 की विनाशकारी सुनामी के बाद अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में सुरक्षित आवास की दिशा में महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार किए गए हैं। अंडमान प्रशासन ने केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के सहयोग से ऐसे आवासीय ढांचे विकसित किए हैं, जिनमें निचले तल पर रहने की व्यवस्था नहीं रखी गई है, ताकि भविष्य में सुनामी जैसी आपदाओं के दौरान जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।

राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) के सहायक कमांडेंट श्री श्रीधर आर. ने बताया कि अंडमान-निकोबार सहित दक्षिण भारत के विस्तृत क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी एनडीआरएफ की चौथी बटालियन के पास है। इस बटालियन का मुख्यालय तमिलनाडु के अरक्कोणम में स्थित है, जो चेन्नई से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। बटालियन का कार्यक्षेत्र केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, लक्षद्वीप तथा अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह तक फैला हुआ है।
उन्होंने बताया कि इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में किसी भी आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए एनडीआरएफ ने चार क्षेत्रीय प्रतिक्रिया टीमें तैनात की हैं। ये टीमें केरल के त्रिशूर, तमिलनाडु के चेन्नई (एग्मोर) और तिरुनेलवेली तथा अंडमान-निकोबार के पोर्ट ब्लेयर में स्थापित की गई हैं, जिससे राहत एवं बचाव कार्यों में समय की बचत हो सके।
अंडमान-निकोबार क्षेत्र को “कम आवृत्ति लेकिन उच्च तीव्रता वाला आपदा क्षेत्र” बताते हुए सहायक कमांडेंट ने कहा कि वर्ष 2004 की सुनामी के बाद यहां कोई बड़ी आपदा नहीं आई है, लेकिन संभावित जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सतत तैयारी आवश्यक है। उन्होंने बताया कि द्वीपों की भौगोलिक संरचना ऊँचाई-निचाई वाली होने के कारण व्यापक बाढ़ की संभावना कम रहती है, हालांकि उच्च ज्वार के समय कुछ क्षेत्रों में अस्थायी जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

उन्होंने यह भी बताया कि अंडमान-निकोबार में लगभग 836 द्वीप हैं, जिससे किसी भी आपदा की स्थिति में सभी स्थानों तक तत्काल पहुंच एक बड़ी चुनौती बन जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए एनडीआरएफ द्वारा समुदाय आधारित जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय नागरिकों को चक्रवात, भूकंप और सुनामी जैसी आपदाओं के दौरान अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों की जानकारी दी जाती है।

एनडीआरएफ अप्रैल माह से ग्राम पंचायत स्तर पर पुनः प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत टीम स्वयं गांवों में जाकर प्रशिक्षण प्रदान करेगी। इसके अतिरिक्त, राज्य आपदा मोचन बल के अभाव में भारतीय रिजर्व बटालियन, अग्निशमन सेवाओं तथा अन्य विभागों को भी आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। स्कूल सुरक्षा कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण गतिविधियों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

सुनामी के बाद विकसित अन्य व्यवस्थाओं की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में सुनामी निकासी मार्ग, सुरक्षित एकत्रीकरण स्थल तथा लगभग 35 स्थानों पर सायरन चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैरन द्वीप पर स्थित ज्वालामुखी वर्तमान में सुप्त अवस्था में है और वहां कोई आबादी नहीं होने के कारण इससे किसी प्रकार का तात्कालिक खतरा नहीं है।
एनडीआरएफ ने दोहराया कि आपदा प्रबंधन केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व तैयारी, संरचनात्मक सुरक्षा, प्रशिक्षण और जन-जागरूकता इसके महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन्हीं प्रयासों के माध्यम से अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह को भविष्य की आपदाओं के प्रति अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है।
 


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