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मध्यप्रदेश के खरगोन की एक खबर है कि 45 साल पहले सौ रूपए का गेहूं चुराने वाले एक फरार वारंटी को अभी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। 1980 में 20 साल की उम्र में साथियों के साथ किसी के खेत से सौ रूपए की गेहूं चोरी करने का आरोपी सलीम अब 65 साल की उम्र में गिरफ्तार हुआ है। समाचार की भाषा बड़ी दिलचस्प है, और कहा गया है कि यह उस जगह से 90 किलोमीटर दूर छिपा हुआ था। खैर, यह पुलिस या अदालत की भाषा हो सकती है जो किसी को 45 साल छिपा होना बताए, लेकिन समाचार लिखने वाले को यह समझदारी दिखानी थी कि इतने बरस तक भला कोई छिप सकते हैं? हिटलर की फौज के जलसंहार करने वाले कोई फौजी अफसर जरूर ऐसे छिपे होंगे, लेकिन एक छोटी सी चोरी में जिसका नाम आया है, वह क्या 45 साल छिपकर रहेगा? लेकिन हम समाचार लेखन पर बात नहीं कर रहे हैं, हमारी फिक्र भारत की अदालतों पर अंधाधुंध लदे हुए मुकदमों का बोझ है, जो कम होने का नाम ही नहीं लेता है। अभी दो ही दिन पहले हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर गुजरात का एक मामला गिनाया था जिसमें 20 रूपए रिश्वत लेने वाले आरोपी एक सिपाही को 28 साल बाद जाकर अदालत से बरी किया गया, और अगले ही दिन वह, शायद खुशी में मर गया। फैसला आने के बाद उसने बेकसूर साबित होने को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर भी की थी। आज जब हम ऐसे कुछ पुराने मामले ढूंढ रहे हैं, तो पता चल रहा है कि बंगाल की अदालतों में 50-50 साल पुराने मामले चल रहे हैं।
भारत के अपराध कानूनों में फेरबदल करके 2023 में जो बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) लागू की गई है, उसमें कहा गया है कि जिन मामलों में अधिकतम तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता है, वैसे सारे मामलों में समरी ट्रॉयल कहे जाने वाले तेज और सरल तरीके से आपराधिक मुकदमे अदालत में चलने चाहिए, और इनमें तेजी से फैसला आना चाहिए। ऐसे मामलों में सुबूत दर्ज करना सरल और आसान होता है, बहस लंबी नहीं होती है, मजिस्ट्रेट सारे सुबूत सुनकर तुरंत फैसला सुना सकते हैं, सजा भी सीमित होती है, और अपील की गुंजाइश भी सीमित रहती है। इसका नतीजा यह होता है कि छोटे मामले जल्द निपटते हैं, अदालतों का बोझ कम होता है, इंसाफ जल्दी होता है, और आरोपी को भी सजा से अधिक वक्त पेशियों में नहीं गुजारना पड़ता। अभी हालत यह है कि अधिकतम जितने दिन की कैद होती है, उससे कई गुना अधिक दिन आरोपी अदालती पेशियों पर आ चुके रहते हैं। यह पूरा सिलसिला नाम से तो न्यायपालिका कहलाता है, लेकिन हकीकत में यह अन्याय पालिका होकर रह गया है। अदालतों की सीमित क्षमता ऐसे मामलों में उलझ जाती है, और उन्हीं अदालतों में चलने वाले कुछ अधिक गंभीर मामलों में फैसले बरसों देर से हो पाते हैं।
नया कानून जो कि 2023 से लागू हो चुका है, उसकी जरूरत आजादी के बाद जल्द पूरी हो जानी थी, लेकिन वह किसी सरकार की प्राथमिकता में शायद इसलिए नहीं आ पाया कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोग अपने मामलों की सुनवाई अपनी जरूरत के हिसाब से तेज या धीमी करवा लेते हैं, और बाकी जनता को जो तकलीफ होती है, उससे वे सीधे-सीधे प्रभावित नहीं होते। ऐसे में मोदी सरकार ने अदालती प्रक्रिया को सरल करने का जो काम किया है, नए कानूनों में कम से कम उतना हिस्सा तो गरीबों के हक का दिखता है। इन कानूनों के कुछ दूसरे हिस्से विवादास्पद भी हैं जिनमें आरोपियों को अधिक लंबे समय तक बिना जमानत जेल में रखने के प्रावधान और कठोर किए गए हैं। फिलहाल इस बात को भी समझने की जरूरत है कि इन नए कानूनों में जिस अदालती प्रक्रिया को तेज रफ्तार किया गया है, वह प्रक्रिया 2023 के इस नए कानून के लागू होने के बाद इनके तहत दर्ज मामलों पर ही लागू होगी। मतलब यह कि 25-50 साल से 20 रूपए की रिश्वत, या सौ रूपए की गेहूं चोरी जैसे आरोपों पर चल रहे मुकदमे रातों-रात शायद खत्म नहीं होंगे। भारत में जनता को इंसाफ देने के लिए यह भी जरूरी है कि मुकदमों की संख्या तेजी से घटाई जाए। नए कानून में यह भी किया गया है कि बहुत छोटे-छोटे जुर्म के मामलों में शिकायतकर्ता और आरोपी मिलकर समझौते भी कर सकते हैं। दुनिया के अमरीका जैसे विकसित देश, और खाड़ी के देशों में सबसे कट्टर इस्लामी कानून वाले देश, बहुत सी जगहों पर कई तरह के जुर्म में अदालत से बाहर समझौते करने का प्रावधान है, और ऐसे कुछ प्रावधान तो बहुत संगीन जुर्म में भी समझौते की छूट देते हैं। कई मुस्लिम देशों में कत्ल के मामलों में भी मृतक के परिवार ब्लड-मनी लेकर कातिल की जानबक्शी कर सकते हैं। अमरीका जैसे आधुनिक कानूनों वाले देश में भी कई तरह के सेक्स-अपराधों को लेकर, बलात्कार के मामलों में भी अदालत के बाहर लेन-देन करके समझौता किया जा सकता है। इन दो बिल्कुल ही अलग-अलग किस्म की राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों को देखें, तो इनके बीच का कुछ रास्ता भारत में लोकतांत्रिक सीमाओं के भीतर भी निकाला जा सकता है। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है कि किसी अरबपति के हाथों मारे गए किसी गरीब के परिवार को कई करोड़ रूपए दिलवाकर उस अरबपति की सजा कुछ कम करवाई जा सके, लेकिन असल जिंदगी के नजरिए से देखें, तो यह विकल्प अच्छा लगता है। इससे कम से कम एक गरीब परिवार की जिंदगी बदल सकती है, और किसी अमीर-मुजरिम को सजा में एक सीमित रियायत मिल सकती है। जुर्म तय हो जाने पर किसी मुजरिम की आर्थिक ताकत को देखकर अगर उसकी हर दिन की कमाई का हिसाब लगाकर उस रेट से उसकी कैद में एक सीमा तक छूट दी जाए, और वह रकम जुर्म के शिकार परिवार को मिले, तो इसमें बुराई क्या है?
कानून के जानकार लोग इस बारे में सही और गलत का बेहतर विश्लेषण कर सकेंगे, हमें तो अपनी सीमित समझ के आधार पर यह एक अच्छा प्राकृतिक न्याय लगता है कि मुजरिम को सिर्फ कैद मिल जाने से, और बहुत ही मामूली जुर्माना हो जाने से पीडि़त परिवार को तो कुछ मिलता नहीं है, उसकी जिंदगी बदलने का काम हमारे फॉर्मूले से किया जा सकता है। दूसरी बात यह भी है कि अमरीका जैसे देशों में आरोपियों के वकील अदालत में सजा की लंबाई कम करने के लिए मोलभाव करते हैं, और प्ली-बार्गेन कही जाने वाली इस प्रक्रिया में वे यह कहते हैं कि अगर सजा सीमित करने का आश्वासन दिया जाए, तो उनका मुवक्किल जुर्म मान लेगा। भारत में आज कई किस्म के साम्प्रदायिक, और आतंक-संबंधित मुकदमों में जांच एजेंसियां अपराध की स्वीकारोक्ति से ही सजा दिला पा रही हैं। हम किसी पूर्वाग्रह, और दुर्भावना से परे, एक अदालती प्रक्रिया के रूप में प्ली-बार्गेन की संभावना भी देखना चाहते हैं।
भारत की अदालतों से भीड़ घटाना बहुत जरूरी है। आज हालत यह है कि जिला स्तर की अधिकतर अदालतों में दर्जनों बार तो सिर्फ तारीखें बढ़ती रहती हैं, कभी एक तरफ के वकील तारीख बढ़वा लेते हैं, कभी दूसरी तरफ के, कभी आरोपी नहीं पहुंचते, तो कभी शिकायतकर्ता ही गायब रहते हैं। कुल मिलाकर एक दर्जन पेशी में जो मामला निपट जाना चाहिए, उसके लिए सौ-सौ पेशियां बरसों तक खिंचती रहती हैं। मतलब यह होता है कि अधिकतर बार वादी, प्रतिवादी, गवाह, और उनके साथ के लोगों को अदालत में गैरजरूरी तरीके से पहुंचना पड़ता है, जिससे सडक़ों से लेकर अदालत के गलियारों तक, और जज-मजिस्ट्रेट से लेकर उनके बाबुओं तक सभी जगह भीड़ बढ़ती है। राज्य सरकारों और अदालतों को मिलकर इस अन्यायपालिका को न्यायपालिका बनाने का कोई रास्ता निकालना चाहिए, महज नए कानूनों की मदद से आधी सदी पुराने मामले रातों-रात सुलझने से रहे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


