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'ग्रीन केव' में पर्यटन के खिलाफ याचिका, हाईकोर्ट ने विरासत की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता
03-Feb-2026 5:55 PM
'ग्रीन केव' में पर्यटन के खिलाफ याचिका, हाईकोर्ट ने विरासत की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता

अदालत ने पार्क निदेशक से मांगा हलफनामा

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 3 फरवरी। छत्तीसगढ़ के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान स्थित 'ग्रीन केव' (हरित गुफा) को पर्यटन के लिए खोलने और वहां निर्माण कार्य करने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर सोमवार को उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार उन आम नागरिकों से गुफा की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, जो इस ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। कोर्ट ने कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक से शपथ पत्र मांगा है और अगली सुनवाई के लिए 18 फरवरी, 2026 की तिथि निर्धारित की है।

सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि कुछ असामाजिक तत्व गुफा की दीवारों पर अपने नाम कुरेदकर उसे नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसके संरक्षण के लिए गुफा के बाहर गेट, सीढ़ियां और रास्तों का निर्माण किया जा रहा है। वहीं, याचिकाकर्ता नितिन सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि वन विभाग गुफा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की जल्दबाजी में है। उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत किए कि दिसंबर 2025 में हुई बैठक के बाद विभाग ने जनवरी अंत तक गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने और बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने के निर्देश जारी किए थे।

मालूम हो कि इस मामले में 'बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान' ( बीएसआईपी ), लखनऊ के निदेशक डॉ. महेश जी. ठक्कर की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गुफा के द्वार पर रेत, गिट्टी और लोहे की छड़ों का उपयोग प्राकृतिक जल निकासी और सूक्ष्म जलवायु ( माइक्रो-क्लाइमेट) को स्थायी रूप से बिगाड़ सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि निर्माण कार्य से होने वाली धूल और हवा के बहाव में बदलाव से गुफा के भीतर लाखों वर्षों में विकसित हुआ पारिस्थितिक तंत्र पर्यटन शुरू होने से पहले ही नष्ट हो सकता है। संस्थान ने किसी भी प्रकार की गतिविधि पर तत्काल रोक लगाने की सलाह दी है।

वहीं पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ए.के. पति ने भी इस पर अपनी राय व्यक्त की है। उन्होंने अदालत को सौंपे गए अपने परामर्श में कहा कि 'कुटुमसर' और 'ग्रीन केव' जैसी गुफाएं मानव हस्तक्षेप के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। यहां मौजूद दुर्लभ सूक्ष्मजीव और वातावरण हजारों वर्षों की स्थिरता का परिणाम हैं। डॉ. पति ने कहा कि इन गुफाओं को पर्यटन के बजाय केवल उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए ही आरक्षित रखा जाना चाहिए।


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