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विकास चौधरी
2 फ़रवरी 2026
छत्तीसगढ़ अब खेती के एक ऐसे रास्ते की ओर बढ़ रहा है, जो अब तक राज्य की पहचान का हिस्सा नहीं था। धान और वनोपज के लिए पहचाने जाने वाले इस राज्य में अब काली मिर्च (ब्लैक पेपर) को किसानों की आमदनी बढ़ाने के एक नए साधन के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में काली मिर्च छत्तीसगढ़ के लिए ‘ब्लैक गोल्ड’ साबित हो सकती है।
साल 2000 में बने इस मध्य भारतीय राज्य में खेती की संभावनाएं लगातार तलाशी जा रही हैं। इसी कड़ी में अब बस्तर से अलग होकर बने कोंडागांव ज़िले में काली मिर्च की खेती तेज़ी से उभर रही है। यह ज़िला धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ में काली मिर्च उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
केले और पपीते के साथ उगाई जा रही काली मिर्च
कोंडागांव और आसपास के इलाकों में काली मिर्च को केला और पपीता जैसी फसलों के साथ उगाया जा रहा है। इससे न सिर्फ ज़मीन का बेहतर इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि एग्रो-फॉरेस्ट्री यानी मिश्रित खेती को भी बढ़ावा मिल रहा है।
काली मिर्च एक लता वाली फसल है, जिसे सहारे की ज़रूरत होती है। केले और पपीते के पौधे इस सहारे का काम कर रहे हैं। इससे किसानों को अलग से खंभे या संरचना लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती और लागत भी कम रहती है।
एक पौधे से 1500 रुपये तक की कमाई
कृषि अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ ज़मीन में लगभग 1,000 काली मिर्च की बेलें लगाई जा सकती हैं। सही देखभाल और अनुकूल परिस्थितियों में एक बेल से किसान को लगभग 1,500 रुपये तक की आमदनी हो सकती है।
इस हिसाब से देखें तो काली मिर्च की खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी उच्च आय वाली फसल बन सकती है। पारंपरिक फसलों की तुलना में यह कम ज़मीन में ज़्यादा आमदनी देने वाली खेती मानी जा रही है।
पलायन रोकने की उम्मीद
छत्तीसगढ़ के कई ग्रामीण इलाकों से रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन एक बड़ी सामाजिक समस्या रही है। खासकर बस्तर और उसके आसपास के ज़िलों में खेती से पर्याप्त आमदनी न होने के कारण लोग शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की ओर जाते हैं।
काली मिर्च की खेती से यह उम्मीद की जा रही है कि स्थानीय स्तर पर ही बेहतर आमदनी के मौके मिलेंगे, जिससे ग्रामीण परिवारों को बाहर जाने की मजबूरी कम होगी। इससे न सिर्फ परिवार साथ रह सकेंगे, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक स्थिरता पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
जलवायु और ज़मीन अनुकूल
विशेषज्ञों का कहना है कि कोंडागांव और बस्तर अंचल की जलवायु, नमी और मिट्टी काली मिर्च के लिए अनुकूल है। अब तक यह फसल मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में उगाई जाती रही है, लेकिन छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में इसके अच्छे नतीजे सामने आने लगे हैं।
अगर तकनीकी मार्गदर्शन, बाज़ार से जुड़ाव और मूल्य समर्थन सही ढंग से मिला, तो यह फसल राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ सकती है।
भविष्य की खेती की दिशा
काली मिर्च की खेती सिर्फ़ एक नई फसल नहीं, बल्कि खेती के सोचने के तरीके में बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि छत्तीसगढ़ अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली, टिकाऊ और मिश्रित खेती की ओर कदम बढ़ा रहा है।
अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में काली मिर्च छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए वही भूमिका निभा सकती है, जो कभी कोयला और लोहा राज्य की अर्थव्यवस्था में निभाते रहे हैं — फर्क सिर्फ इतना होगा कि यह खेतों से पैदा होने वाली ‘काली कमाई’ होगी। डाउन टू अर्थ (सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट)


