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राजस्थान के सरकारी स्कूलों के आधे से ज़्यादा कमरे जर्जर, आधे से कम शौचालय काम लायक
31-Jan-2026 8:01 PM
राजस्थान के सरकारी स्कूलों के आधे से ज़्यादा  कमरे जर्जर, आधे से कम शौचालय काम लायक

जयपुर, 31 जनवरी। राजस्थान में सरकारी स्कूलों की हालत पर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य सरकार द्वारा कराए गए तकनीकी ऑडिट के अनुसार, सरकारी स्कूलों के कुल कमरों में से 56 प्रतिशत से अधिक या तो पूरी तरह जर्जर हैं, इस्तेमाल के लायक नहीं हैं, या फिर उन्हें बड़े स्तर की मरम्मत की ज़रूरत है। यह जानकारी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सामने आई है।

यह खुलासा उस पृष्ठभूमि में हुआ है, जब कुछ महीने पहले झालावाड़ ज़िले में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत हो गई थी और आठ छात्र घायल हुए थे। इस हादसे के बाद स्कूल भवनों की सुरक्षा पर सवाल उठे और सरकार को पूरे राज्य में सर्वे कराने का आदेश देना पड़ा।

65 हजार से ज़्यादा स्कूल, लाखों कमरे

शिक्षा विभाग ने राजस्थान विधानसभा में दी गई जानकारी में बताया कि राज्य के 65,308 सरकारी स्कूलों में कुल 5,40,126 कमरे हैं। इनमें से केवल 2,36,441 कमरे ही सुरक्षित पाए गए हैं।

ऑडिट के मुताबिक :

83,783 कमरे पूरी तरह जर्जर हैं और उन्हें असुरक्षित घोषित किया गया है
2,19,902 कमरों को बड़े पैमाने पर मरम्मत की ज़रूरत है

यानी आधे से ज़्यादा कमरे बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हैं।

शौचालयों की हालत भी चिंताजनक

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि स्कूलों में शौचालयों की स्थिति भी गंभीर है।

39,278 शौचालय ही इस्तेमाल योग्य हैं
16,765 शौचालय पूरी तरह जर्जर हैं
29,753 शौचालयों को मरम्मत की ज़रूरत है

यह स्थिति स्वच्छता और खासकर छात्राओं की शिक्षा पर सीधा असर डालने वाली मानी जा रही है।

झालावाड़ हादसे के बाद हुआ सर्वे

यह तकनीकी ऑडिट, एक प्रारंभिक सर्वे के बाद किया गया, जिसमें लगभग यही आंकड़े सामने आए थे। दोनों सर्वे झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद कराए गए।

25 जुलाई को झालावाड़ में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से सात छात्रों की मौत हो गई थी। इसके कुछ ही दिनों बाद जैसलमेर में एक स्कूल का मुख्य गेट गिरने से एक छात्र की मौत और दो के घायल होने की घटना भी हुई थी। इन घटनाओं ने सरकार और प्रशासन पर दबाव बढ़ा।

मंत्री का आदेश, लेकिन ज़मीनी काम धीमा

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने जिलाधिकारियों के ज़रिये स्कूल भवनों का सर्वे कराने और जर्जर इमारतों को तोड़ने के आदेश दिए थे। साथ ही वैकल्पिक व्यवस्था कर कक्षाएं चलाने के निर्देश भी दिए गए।

सरकार ने जर्जर और मरम्मत योग्य स्कूल भवनों को GIS आधारित ऐप से जोड़ने और निर्माण गुणवत्ता जांचने के लिए एक विशेष सेल बनाने की भी बात कही।

हाईकोर्ट की सख़्ती

राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार को आदेश दिया कि जर्जर स्कूल भवनों और कमरों का उपयोग अगले आदेश तक न किया जाए।

कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी

ऑडिट में जिन 3,768 स्कूलों को पूरी तरह जर्जर और अनुपयोगी बताया गया :

ज़िला समितियों ने 2,558 स्कूलों को औपचारिक रूप से जर्जर घोषित किया
लेकिन अब तक सिर्फ 1,129 स्कूलों को ही गिराया गया

नई इमारतों के लिए 2,248 प्रस्ताव मिले हैं, लेकिन मंज़ूरी सिर्फ 123 मामलों में दी गई है।

इसी तरह, जिन 45,365 स्कूलों में बड़े मरम्मत कार्य की ज़रूरत है, उनमें से केवल 4,187 स्कूलों को ही अब तक स्वीकृति मिली है। शिक्षा विभाग के अनुसार, मरम्मत के लिए करीब 174 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।

इसके अलावा, बाढ़ और भारी बारिश से क्षतिग्रस्त स्कूल भवनों के लिए राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) से 20,383 स्कूलों में मरम्मत कार्य की मंज़ूरी ज़िला कलेक्टरों ने दी है।

बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े सिर्फ इमारतों की जर्जर हालत नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करते हैं। जब तक स्कूल भवन सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक “शिक्षा का अधिकार” ज़मीनी स्तर पर अधूरा ही रहेगा।

(स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस, रिपोर्ट – हमज़ा ख़ान)


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