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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 30 जनवरी। वरिष्ठता के बावजूद पदोन्नति नहीं मिलने पर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने विभागीय पदोन्नति समिति के अधिकारों को स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा है कि वरिष्ठता-सह-उपयुक्तता के आधार पर होने वाली पदोन्नतियों में डीपीसी को यह अधिकार है कि वह गोपनीय चरित्रावली के आधार पर न्यूनतम मानक निर्धारित करे।
यह मामला तब खंडपीठ के समक्ष आया, जब उच्च न्यायालय की दो एकल पीठों के निर्णयों में विरोधाभास सामने आया। एक फैसले में वरिष्ठता को ही पदोन्नति का मुख्य आधार माना गया था, जबकि दूसरे में चयन समिति को मानक तय करने का अधिकार स्वीकार किया गया था। इसी टकराव को सुलझाने के लिए प्रकरण को खंडपीठ को सौंपा गया।
उद्यानिकी विभाग में पदस्थ रुकम सिंह तोमर ने पदोन्नति न मिलने को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि उनके विरुद्ध न तो कोई विभागीय जांच लंबित है और न ही कोई गंभीर शिकायत, ऐसे में वरिष्ठ होने के नाते उन्हें पदोन्नति मिलनी चाहिए थी। इसके विपरीत, राज्य सरकार ने दलील दी कि चयन समिति ने बीते पांच वर्षों की सेवा प्रविष्टियों के आधार पर ‘अच्छी’ श्रेणी को न्यूनतम मानक तय किया था, जिसे याचिकाकर्ता पूरा नहीं कर पाए। इसी कारण उनसे कनिष्ठ अधिकारी को पदोन्नत किया गया।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की खंडपीठ ने पदोन्नति नियमों का विस्तार से परीक्षण करते हुए कहा कि चयन समिति को अधिकारी के कार्य-प्रदर्शन और सेवा अभिलेख के आधार पर योग्यता का मूल्यांकन करना होता है। केवल वरिष्ठता अपने आप में पदोन्नति का अधिकार नहीं बनाती।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पिछले पांच वर्षों की गोपनीय प्रविष्टियों में ‘अच्छी’ श्रेणी को न्यूनतम मानक बनाना नियमों के अनुरूप है। डीपीसी द्वारा ऐसा मानदंड तय करना न तो मनमाना है और न ही अवैध।
कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के बाद खंडपीठ ने प्रकरण को अंतिम निर्णय हेतु पुनः एकल पीठ को भेज दिया है।


