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भारत में देश के स्तर पर, और प्रदेशों के स्तर पर सरकारी नौकरियां एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। हर राजनीतिक दल चुनाव के समय हजारों या दसियों हजार नौकरियों का वायदा करते हैं, और उम्मीद करते हैं कि इससे सत्ता पर उनकी वापिसी हो सकेगी। लेकिन धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि यह हथियार धार खोते जा रहा है, अब एक-एक करके अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग राजनीतिक दल गरीबों या जरूरतमंद लोगों के खातों में सीधे कैश ट्रांसफर के हथियार का इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि एक सरकारी नौकरी पाने के लिए जो हजारों बेरोजगार कतार में लगते हैं, उनमें से नौकरी न पाने वालों की नाराजगी चुनाव में नुकसान अधिक करती हैं, बजाय नौकरी पाने वाले लोगों के अहसानमंद होने के। इसलिए राजनीतिक दल हर महीने किस्तों में जाने वाले अहसान पर कुछ अधिक निर्भर होते दिख रहे हैं। फिर यह भी है कि 25-50 हजार रूपए महीने की नौकरी किसी को देने के बजाय उस रकम से 25-50 लोगों को हर महीने हजार रूपए देना चुनावी फायदे के हिसाब से अधिक कारगर होता है। इसलिए सरकारी नौकरियों की तरफ लोगों को अब उम्मीद की नजरों से नहीं देखना चाहिए। सच तो यह है कि अधिकतर सरकारों की खाली होने वाली अधिकतर कुर्सियों को दुबारा भरने के काम में इतनी लेट-लतीफी की जाती है कि लोग उन खाली कुर्सियों के साथ जीने के आदी हो जाएं। सरकारों के पास एक दूसरी तरकीब यह रहती है कि वे शिक्षक की जगह शिक्षाकर्मी, और सैनिक की जगह अग्निरक्षक बड़े सस्ते में रखकर काम चला लें। लेकिन इसके साथ-साथ इन दिनों दुनिया पर छा चुके एक और खतरे को देखने की जरूरत है।
एआई ने दुनिया में करोड़ों इंसानों के काम को बेकार का साबित कर दिया है। उसने यह दिखा दिया कि बिना किसी लागत के, बिना किसी खर्च के एआई किस तरह कई किस्म के काम इंसानों से बेहतर कर सकता है, और करने भी लगा है। यह संपादकीय खुद लिखने की हमारी जिद अगर न होती, तो हो सकता है कि काफी हद तक इसी दर्जे का, या शायद कुछ मायनों में इससे बेहतर संपादकीय एआई एक-दो मिनट के भीतर लिख देता, और फिर अगले दो-चार मिनटों में हम उसमें अपनी विचारधारा, तर्क, तथ्य जोडक़र एआई से दुबारा भी लिखवा लेते। जब कभी हम एआई से कोई जानकारी मांगते हैं, तथ्य पूछते हैं, तो उसका प्रस्ताव भी साथ-साथ आ जाता है कि क्या इस पर एक संपादकीय लिख दूं, या इसे यूट्यूब की स्क्रिप्ट की तरह ढाल दूं? अब कल्पना कीजिए ऐसे मीडिया संस्थान की जहां मैनेजमेंट संपादक की जगह एआई से काम चला ले, लोग टायपिस्ट की जगह बोलकर टाईप कर ले, एआई से ग्रामर और हिज्जे सुधरवा लें, उससे मुफ्त में फैक्ट चेक करवा लें, और ये सारे काम इंसानों से लगभग बेहतर, और बिल्कुल ही मुफ्त में होने लगें, तो कौन सा मीडिया-मैनेजमेंट तेवर वाले लोगों को रखना चाहेगा?
लेकिन हम दो कदम और पीछे चलें, और एआई के पहले के बहुत ही साधारण कम्प्यूटरों के दौर में आ जाएं, तो आज भारत सरकार के बनाए हुए एक सॉफ्टवेयर के आधार पर एक-एक करके कई प्रदेशों में ई-फाइलिंग का काम चल रहा है। छत्तीसगढ़ में जब कुछ अफसरों के कम्प्यूटरों पर हमने इसे देखा, तो यह ऐसा सुखद आश्चर्य था कि किसी एक जिले से कलेक्टर की भेजी गई ई-फाईल कुछ सेकेंड में मंत्रालय में सचिव के पास भी चली गई, उस सचिव ने फाईल कुछ सेकेंड में अपने सीनियर को भेज दी, वहां से फाईल मंत्री या मुख्यमंत्री को चली गई, और इनमें से हर कोई अगर कम्प्यूटर पर बैठकर काम निपटा रहे हैं, तो हो सकता है कि पांच-दस मिनट में फाईल निपटकर जिले में वापिस पहुंच जाए। आज हालत यह है कि जिलों से फाईलें लेकर अलग-अलग विभागों के बाबू राजधानी आते हैं, और यहां एक-दो दिन रूककर उन फाईलों को देकर वापिस जाते हैं। बिना एआई के, सिर्फ पुराने कम्प्यूटरों पर एक नए प्रोग्राम के इस्तेमाल से सरकारी फाईलों की रफ्तार तकनीकी रूप से तो हजारों गुना अधिक हो गई है, अब अगर कम्प्यूटरों के सामने बैठने वाले इंसान काम न करने पर आमादा होंगे, तो अलग बात है। लेकिन जब हम एआई के इस्तेमाल को जोडक़र देखते हैं, तो लगता है कि सरकारी कामकाज में गड़बड़ी पकडऩा, टेंडरों की खामियां निकालना, सप्लाई में घटिया चीजों को पकडऩा, नकली बिल पकडऩा, एआई चुटकी बजाते कर सकता है। इन सबसे इंसानों की जरूरत तेजी से घटने जा रही है, और जिन लोगों को सरकारी नौकरियों की चाह है, उन्हें जिंदा रहना है, तो उन्हें गैरसरकारी राह देखनी चाहिए।
विश्व आर्थिक मंच (वल्र्ड इकॉनॉमिक फोरम) की रिपोर्ट कहती हैं कि 2030 तक दुनिया में 8-9 करोड़ नौकरियां एआई की वजह से खत्म हो सकती है। लेकिन करीब इतनी ही संख्या में नई नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन वे अलग हुनर की जरूरत वाली होंगी। आईएमएफ का अनुमान है कि विकसित देशों में 60 फीसदी तक नौकरियां किसी न किसी रूप में एआई से प्रभावित होंगी। भारत विकसित देश बनने से दूर है, और ऐसे विकासशील देश में कुछ दूसरे किस्म की नौकरियां प्रभावित होना शुरू हो चुका है, जिनमें कॉल सेंटर, डेटा एंट्री, अकाउंटिंग, अनुवाद, डिजिटल डिजाइनिंग, प्लानिंग जैसे बहुत से काम हैं। हमारा अंदाज यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का काम भी तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों की जगह कुछ या अधिक हद तक स्मार्ट क्लासरूम की बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीन पर किसी एक शहर में बैठे शिक्षक बेहतर तरीके से कर सकेंगे, और फिर बाद में हर स्कूल के स्थानीय शिक्षक-शिक्षिका बच्चों से उस बारे में सवाल-जवाब कर सकेंगे, उनके सवालों के जवाब दे सकेंगे। लेकिन एक जगह बैठे उत्कृष्ट शिक्षक-शिक्षिका पूरे प्रदेश में कोई पाठ्यक्रम पढ़ा सकेंगे, और यह काम भी मौजूदा कम्प्यूटरों की बड़ी मामूली तकनीक से होने जा रहा है, इसमें अभी तक एआई की कोई जरूरत नहीं पड़ी है।
लेकिन सरकारी नौकरियां चाहने वालों के लिए हमारे पास सिर्फ बुरी खबर है कि केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के बाद से हर विभाग में स्वीकृत पदों की गिनती घटी है, रेलवे, डाक, बीएसएनएल, और दूसरे सार्वजनिक उपक्रमों में खाली पद भरे नहीं गए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों के बहुत सारे काम निजी एजेंसियों को दे दिए गए हैं। खुद सरकारी स्कूल, अस्पताल, और पंचायत में कुर्सियां खाली रखी गई हैं, या भर्ती इतनी धीमी की जाती है कि कई बरस तक तनख्वाह बचती रहे। ऐसे में एआई का इस्तेमाल सरकारों का इंसानों पर आश्रित रहना बहुत बुरी तरह घटा देगा। कई लोगों को यह लग सकता है कि एआई न झाड़ू लगा सकता, न ही वह पानी पिला सकता। लेकिन एआई क्या-क्या कर सकता है, वैसे हुनर की फिक्र करने की जरूरत है, और यह बात तय मान लेना चाहिए कि सरकार एक नौकरी देने के बजाय उतने खर्च के एवज में 25-50 लोगों को किसी जनकल्याणकारी योजना का फायदा देना अधिक पसंद करेगी। लोगों को घटते हुए शासन को भी ध्यान में रखना चाहिए, और घटती हुई नौकरियों के बीच सरकार से परे ऐसे हुनर के बारे में सोचना चाहिए जिस पर एआई का हमला आसान नहीं होगा।


