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शिक्षा कर्मियों की पेंशन पर सरकार को स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया हाई कोर्ट ने
24-Jan-2026 1:10 PM
शिक्षा कर्मियों की पेंशन पर  सरकार को स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया हाई कोर्ट ने

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 24 जनवरी। राज्य के एलबी संवर्ग के हजारों शिक्षकों की पेंशन और पूर्व सेवा गणना से जुड़े मामलों में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक दूरगामी फैसला सुनाया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ  ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह शिक्षा कर्मी के रूप में प्रारंभ हुई सेवा और बाद में स्कूल शिक्षा विभाग में समायोजन पाए शिक्षकों के लिए पेंशन तिथि निर्धारण को लेकर एक स्पष्ट, तार्किक और समान नीति बनाए।

हाईकोर्ट में परमेश्वर प्रसाद जायसवाल, श्यामलाल पटेल, कन्हैयालाल राठिया, वेदलाल भगत सहित विभिन्न जिलों के 300 से अधिक शिक्षकों ने याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे 1998-99 से लगातार शिक्षा कर्मी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं और वर्ष 2018 में उनका स्कूल शिक्षा विभाग में समायोजन हुआ।

याचिकाओं में कहा गया कि राज्य सरकार ने पुरानी पेंशन योजना तो बहाल कर दी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पेंशन की गणना प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से होगी, नियमितीकरण की तिथि से या फिर 2018 में समायोजन की तिथि से। इसी असमंजस को दूर करने के लिए न्यायालय से दिशा-निर्देश मांगे गए थे।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं में समायोजन से पहले की सेवा को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसके चलते अलग-अलग विभाग नियमों की अलग व्याख्या कर रहे हैं, जिससे समान स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ असमान व्यवहार हो रहा है।

राज्य सरकार ने दलील दी कि पंचायत संवर्ग और शिक्षा विभाग की सेवाएं अलग-अलग हैं, इसलिए पूर्व सेवा को पेंशन में नहीं जोड़ा जा सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि केवल संवर्ग परिवर्तन को सेवा समाप्ति नहीं माना जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि पेंशन कोई अनुकंपा नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा के बाद मिलने वाला स्थगित वेतन है। केवल बाद में हुए समायोजन के आधार पर वर्षों की सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पेंशन पात्रता के लिए नियुक्ति तिथि स्पष्ट की जाए। सेवा की निरंतरता, कार्य की प्रकृति और वेतन के स्रोत को ध्यान में रखा जाए। एक जुलाई 2018 से पूर्व की सेवा को पेंशन गणना में शामिल करने पर तार्किक निर्णय लिया जाए तथा 10 वर्ष की अर्हकारी सेवा की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने वर्तमान नियमों को निरस्त नहीं किया है, लेकिन भविष्य में अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचने के लिए राज्य सरकार को एक पारदर्शी और स्पष्ट नीति बनानी होगी।


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