ताजा खबर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 21 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एकलपीठ ने एसडीओ और कलेक्टर के फैसले को सही ठहराते हुए भतीजे की अपील खारिज कर दी। अदालत ने साफ कहा कि देखभाल की शर्त पर दी गई संपत्ति का दुरुपयोग कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
कोनी, बिलासपुर निवासी 83 वर्षीय सुरेशमणि तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी ने वर्ष 2016 में अपनी 1250 वर्गफुट की जमीन और उस पर बने मकान को अपने भतीजे रामकृष्ण पांडेय के नाम गिफ्ट डीड के जरिए दे दिया था। दंपती की कोई संतान नहीं थी और उन्हें उम्मीद थी कि भतीजा जीवन भर उनकी सेवा और देखभाल करेगा।
बुज़ुर्ग दंपती का आरोप है कि संपत्ति मिलते ही भतीजे और उसकी बेटी ने उन्हें जबरन मकान की पहली मंजिल पर सीमित कर दिया। सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी के बावजूद उन्हें नीचे आने नहीं दिया गया। भोजन, पानी और अन्य जरूरी सुविधाओं पर रोक लगाई गई। यहां तक कि बिजली-पानी के कनेक्शन भी काट दिए गए और एटीएम से करीब 30 लाख रुपये निकाल लिए गए।
पीड़ित दंपती ने वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण कानून के तहत आवेदन किया। एसडीओ और कलेक्टर ने मामले की सुनवाई के बाद गिफ्ट डीड निरस्त करते हुए संपत्ति बुज़ुर्ग दंपती को वापस देने का आदेश दिया। साथ ही भतीजे को मकान से बेदखल करने का निर्णय भी लिया गया।
इस आदेश को भतीजे ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ में हुई। अदालत ने कहा कि गिफ्ट डीड प्रेम और स्नेह के साथ इस शर्त पर दी गई थी कि भविष्य में बुज़ुर्गों की देखभाल की जाएगी। जब यह शर्त पूरी नहीं हुई और उन्हें प्रताड़ित किया गया, तो गिफ्ट डीड रद्द करना पूरी तरह उचित है।
अदालत ने उल्लेख किया कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 बुज़ुर्गों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत प्रावधान है। यदि देखभाल की शर्त तोड़ी जाती है, तो संपत्ति का हस्तांतरण धोखाधड़ी माना जाएगा।


