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आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लडक़ी या महिला से उसके प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड ने ब्लैकमेल करते हुए साथियों सहित बलात्कार किया। मतलब यही है कि प्रेम या दोस्ती के चलते जो रिश्ता दो लोगों के बीच रहना था, उसको सामूहिक कर दिया गया। फिर ऐसे सामूहिक करने के लिए किसी पुराने वीडियो को हथियार बना लिया जाता है, या चाकू की नोंक पर धमकी देकर ऐसा किया जाता है। मेरे आसपास ही हर कुछ दिनों में ऐसी घटना होती है, इनमें बलात्कारियों की कमीनगी पर गुस्सा आता है, उससे नफरत होती है, लेकिन साथ-साथ इस बात से हैरानी भी होती है कि आज खबरों के सैलाब के बीच भी कोई लडक़ी या महिला सावधानी बरतने का सबक नहीं लेतीं कि ब्लैकमेलिंग की बुनियाद पर बलात्कार और सामूहिक बलात्कार कैसे होते हैं। या तो लोग यह मानकर चलते हैं कि धोखेबाज लोग कोई और होते होंगे, और उनके वाले तो भले हैं, या फिर वे निजी मजे के अंतरंग वीडियो में ऐसे उलझ जाती हैं कि सामूहिक ज्यादती के जाल में फंस जाती हैं।
आज जब चारों तरफ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो लड़कियों और महिलाओं को कुछ बुनियादी समझ और सावधानी विकसित करने की जरूरत है। यह जरूरत उन्हें अधिक इसलिए है कि शिकायतें उन्हीं की तरफ से दर्ज होती हैं, किसी लडक़े या मर्द की तरफ से यह शिकायत दर्ज नहीं होती कि लडक़ी या महिला ने उनसे बलात्कार किया। इसलिए सावधानी भी उसी तबके को अधिक बरतनी होगी जिसके साथ ज्यादती का खतरा अधिक रहता है, या रहता है।
बहुत तरह की शिकायतों से यह बात समझ पड़ती है कि बालिग या नाबालिग लड़कियों की तरफ से यह शिकायत आती है कि शादी का वायदा करके उनके साथ देहसंबंध बनाए, और फिर शादी से मुकर जाना धोखा देने का काम हुआ। इससे परे कुछ मामले सीधे-सीधे ज्यादती के होते हैं जिनमें किसी वायदे और धोखे की बात भी शिकायत में नहीं आती, और प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की अगुवाई में उसके साथी गैंगरेप करते हैं। इन दोनों ही मामलों की शुरूआत एक विश्वास से होती है। और यह विश्वास अधिकतर मामलों में रेत पर खड़ी इमारत सरीखा होता है जो कि पहली तेज आंधी में गिर सकती है, गिर जाती है।
विश्वास की इमारत के लिए प्रेमी या ब्वॉयफ्रेंड की जरूरत जरूरी नहीं रहती, कई मामलों में परिवार के लोग, भाई, पिता, या चाचा-जीजा कोई भी विश्वास की इमारत को गिराने की ताकत रखते हैं। पुलिस में बीच-बीच में ऐसे मामले भी पहुंचते हैं जिनमें घर के लोगों ने ही बलात्कार किया, और किसी एक हादसे की तरह अनायास एक बार घट गई घटना जैसा नहीं, महीनों और बरसों तक इसे जारी रखा। फिर यह भी लगता है कि ऐसी रिपोर्ट सौ घटनाओं में से दो-चार की ही होती होगी, बाकी मामलों में लोग घर की बात घर में रखने के लिए दबाव डालकर शिकायतें दबवा देते होंगे।
इनमें से किसी भी किस्म के मामले हों, ऐसा लगता है कि इंसान की देह की जरूरत उसके बाकी तमाम मूल्यों पर इतनी हावी हो जाती है कि वे तमाम बदनामी झेलने, पूरी जिंदगी कैद काटने की कीमत पर भी देह की जरूरत को पूरा करना अधिक जरूरी समझते हैं। इसके लिए कई लोग चार-छह बरस के बच्चों की देह से भी अपनी भूख मिटाने लगते हैं, कई लोग वर्जित संबंधों की वर्जनाएं भुला देना बेहतर समझते हैं, और कई लोग कोई जुर्म करने के लिए गिरोह बनाने की तर्ज पर गैंगरेप की योजना बनाते हैं, उसे पूरा करते हैं, और उसके वीडियो भी बनाते हैं, धमकाकर रखने के लिए, और अपनी कामयाबी के मैडल की तरह दूसरे दोस्तों को दिखाने के लिए भी।
यह पूरा सिलसिला परले दर्जे की सावधानी सुझाता है। लड़कियों के लिए यह शारीरिक रूप से, और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी अधिक नुकसानदेह होता है, इसीलिए हमने सुझाव की शुरूआत उन्हें ही सावधान रखने के लिए की है, न सिर्फ बाहरी लोगों से सावधानी, बल्कि घर के लोगों से भी। दूसरी तरफ अपने परिवार के जिन लडक़ों, और मर्दों की गिरफ्तारी होने पर उन्हें छुड़ाने का जिम्मा जिन लोगों पर आएगा, जो सजा होने के पहले तक टिफिन जेल पहुंचाएंगे, उन्हें भी अपने परिवार के और आसपास के लोगों को सावधान करने की जरूरत है कि देह के कुछ देर के मजे के लिए उन्हें घर-परिवार और समाज के सारे सुख खतरे में नहीं डालने चाहिए।
अलग-अलग देश और समाजों को यह भी सोचना होगा कि क्या उसके सदस्यों में से हमेशा ही बहुत से ऐसे नहीं रहेंगे जिन्हें अलग-अलग वजहों से देहसुख नहीं मिल पाता है। आम लोगों से सफल संन्यासियों की तरह के त्याग और संयम की उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए अपनी देह पर काबू रखेंगे। और जब देह बेकाबू होती है, तो अगर उसे अपने को शांत करने का कोई रास्ता नहीं मिलता है, तो बाढ़ की नदी की राह में आने वाली चीजों के लिए खतरा होने लगता है। देह की भूख लोगों से कई तरह के जुर्म करवा सकती है, और समाज को यह सोचना होगा कि देह के कारोबार को गैरकानूनी करार देकर नजरों से दूर रखने के क्या कोई नुकसान भी होते हैं? जब किसी से देह की भूख बर्दाश्त न हो, तो फिर ऐसे लोग आसपास किसी को तो अपना शिकार बनाते ही हैं, और क्या ऐसे लोगों को ध्यान में रखते हुए समाज में औपचारिक चकलाघरों को इजाजत समाज को अधिक सुरक्षित नहीं बनाएगी?
आज की यह पूरी बातचीत कुछ बिखरी हुई है, लेकिन यह मुद्दा ही असल जिंदगी में खासा बिखरा हुआ है। निजी रिश्तों में बेवफाई, धोखा, और फिर उसे जुल्म की हद तक ले जाना, यह सब आम होते चल रहा है। ऐसे में अपने आपको धोखे का शिकार होने से बचाना, या अपने लोगों को धोखेबाज-मुजरिम होने से बचाना एक ही किस्म की दो चुनौतियां हैं। इन दोनों के लिए कोशिशें तो अलग-अलग होंगी, लेकिन कामयाबी इन दोनों से मिलकर भी होगी। लापरवाह प्रेमसंबंध, खतरनाक देहसंबंध, और ब्लैकमेलिंग से लेकर गैंगरेप तक का सिलसिला दोनों ही पक्षों की ऊंचे दर्जे की सावधानी और जिम्मेदारी से थम सकता है। और इन तमाम बातों के लिए घर-परिवार के भीतर भी काफी खतरे मौजूद रहते हैं, और पूरे परिवार को मिलकर ऐसे खतरों के खिलाफ सावधानी बरतनी चाहिए। परिवारों के भीतर अनैतिक कहे जाने वाले वर्जित संबंधों की हर किस्म की मिसालें समाज में सामने आती ही रहती हैं, और इनसे बचने की कोशिशें भी जारी रहनी चाहिए। सावधानी में ही बचाव है, लापरवाही की सुनामी में फंसने के बाद कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता।


