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छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 25 नवंबर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के एक पुराने फैसले को पलटते हुए पति की अपील मंजूर कर ली। अदालत ने माना कि पत्नी का व्यवहार मानसिक और शारीरिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी को एकमुश्त 25 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है।
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि दंपती साल 2014 से अलग रह रहे हैं और रिश्ते को बचाने के सभी प्रयास असफल हो चुके हैं।
दुर्ग निवासी इस दंपती की शादी 4 मार्च 2009 को भिलाई के साई मंगलम भवन में हुई थी। एक बेटा भी है, लेकिन शादी के कुछ समय बाद से ही दोनों के बीच तनाव बढ़ता चला गया।
पत्नी का आरोप था कि ससुराल पक्ष मामूली बातों पर तंग करता था, हनीमून के बाद परीक्षा का बहाना बनाकर मायके भेज दिया, गर्भावस्था में इलाज नहीं मिलने से दो बार गर्भपात हुआ, बच्चे के जन्म का खर्च नहीं उठाया और 2014 में पुलिस की मदद से ससुराल से निकाल दिया गया।
पति ने कहा कि पत्नी खुद बार-बार गर्भपात की गोलियां खाती थीं, बच्चे को मारती-पीटती और बाथरूम में बंद कर देती थी, पुलिस में झूठी शिकायतें दर्ज कराती थीं और ससुराल में चाकू और लोहे की रॉड से हमला करने की कोशिश की।
पत्नी ने 9 सितंबर 2014 को दुर्ग फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकार की बहाली की मांग की थी। दिसंबर 2022 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला दिया और दांपत्य संबंध फिर से जोड़ने का आदेश दिया था।
मगर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि इनका अब साथ रहना संभव नहीं है। बेंच ने गवाहों के बयान,दस्तावेज और सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष केस के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि लगातार 10 साल से अलग रहना, मध्यस्थता का विफल होना और महत्वपूर्ण अवसरों जैसे अंतिम संस्कार व सर्जरी में पत्नी का शामिल न होना यह दर्शाता है कि रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है।
कोर्ट ने माना कि पत्नी का लगातार झगड़े करना, झूठे आरोप लगाना, गर्भपात को लेकर विवाद और बच्चे के साथ दुर्व्यवहार जैसी बातें पति पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता हैं। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोप सही पाए और पति को राहत देते हुए पत्नी को 25 लाख एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।


