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चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर 27 अप्रैल। छत्तीसगढ़ में तेंदुओं के साथ हो रहे अत्याचार को रोकने को लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद निर्धारित की है।
इसमें याचिकाकर्ता नितिन सिंघवी की तरफ से कहा गया है कि वन विभाग के अधिकारी ही मानव-तेंदुआ द्वन्द बढ़ा रहे हैं। बिना पता लगे कि कोई तेंदुआ मनुष्य के लिए खतरनाक है या नहीं, देखते ही पिंजरा लगा देते हैं। उसे वे पकड़ने के बाद दूसरे स्थान पर छोड़ देते हैं। यह समस्या को बढ़ाने वाला है। कई किलोमीटर दूर नए जंगल में तेंदुआ अपने को अनजान जगह पर पाकर परेशान हो जाता है। अत्यधिक तनाव, भूख, सदमे और अवसाद में उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। ऐसे में नए स्थान पर वह पालतू पशुओं पर हमला करके खा सकता है,और इससे मानव तेंदुआ द्वन्द बढ़ सकता है। तेंदुए को अगर 100 किलोमीटर दूर भी छोड़ा जाएगा तो वह अपने मूल वन में लौटने का प्रयत्न करता है और अगर कोई बाधा न हो तो वापस अपने मूल वन में पहुच जाता है। कई बार वापस लौटते के दौरान वह उन गावों में भी पहुंचता है, जहां कभी तेंदुआ नहीं देखा गया। वहां भी मानव तेंदुआ द्वन्द पैदा हो जाता है। मुंबई के संजय गांधी नेशनल पार्क से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर जुन्नारदेव में चिप लगाकर छोड़ा गया तेंदुआ वापस संजय गांधी नेशनल पार्क पहुंच गया था।
याचिका में कहा गया है कि इसे लेकर भारत सरकार ने अपनी गाइडलाइंस में कहा है कि तेंदुए को अपने घर से बहुत ही ज्यादा लगाव रहता है इसलिए जिस जगह से वह पकड़ा गया है उस से 10 किलो मीटर के दायरे में उसे छोड़ा जाना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर मानव के साथ उसका द्वंद्व बढ़ सकता है। भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार रेडियो कॉलर लगाकर तेंदुए की लगातार मोनिटरिंग करना अनिवार्य है। परंतु छत्तीसगढ़ में बिना रेडियो कॉलर लगाए और दूसरे वन क्षेत्र का अध्ययन किए बिना कई किलो मीटर दूर छोड़ दिया जाता है। छत्तीसगढ़ वन विभाग की मानक प्रचालन प्रक्रिया में भी रेडिओ कालर लगा कर 24 घंटे में छोड़े जाने का प्रावधान है।
याचिका में बताया गया है कि तेंदुआ वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूची 1 के तहत संरक्षित जीव है। बिना मुख्य वन्यजीव संरक्षक अर्थात प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) के आदेश के उसे पकड़ना अपराध की श्रेणी में आता है, जिसके तहत 3 से 7 साल की सजा का प्रावधान है। कानूनी जानकारी होने के बावजूद वनमंडल अधिकारी मुख्य वन्यजीव संरक्षक की बिना अनुमति के पिंजरा लगाते हैं और तेंदुए को पकड़ लेते हैं और मनमाने स्थान पर छोड़ देते हैं। सब कुछ मुख्य वन्यजीव संरक्षक की जानकारी में ही होता है।
मुख्य वन्यजीव संरक्षक से वनमंडल अधिकारी तेंदुए को पकड़ने के लिए तो कोई अनुमति नहीं लेते परंतु तेंदुए को पकड़ने के बाद छोड़ने की अनुमति मांगते हैं। दूसरे स्थान पर तेंदुए को छोड़े जाने के 15 दिन बाद तक मुख्य वन्यजीव संरक्षक तेंदुए को छोड़ने की अनुमति जारी करते रहते है। तेन्दुओं को कानून के विरुद्ध वनमंडल आधिकारियों द्वारा पकडे जाने की पूर्ण जानकारी होने के बावजूद दोषियों के विरुद्ध मुख्य वन्यजीव संरक्षक कोई कार्रवाई नहीं करते।
याचिका में हाल के दिनों में मुख्य वन्यजीव संरक्षक के आदेश के बिना पकड़े गए तेन्दुओं का विवरण भी दिया गया है। इसके अनुसार 12 सितंबर 2021 को एक नर तेंदुआ और एक मादा तेंदुआ कांकेर से पकड़ा गया था। दोनों ही प्रॉब्लम एनिमल नहीं पाए गए। पग मार्ग भी मैच नहीं हुए। कांकेर में दोनों का मेडिकल चेकअप कराया गया, दोनों पूरी तरह स्वस्थ पाए गए। कांकेर के डॉक्टरों ने लिखा कि यह जंगल में छोड़े जा सकते हैं परंतु उसके बावजूद दोनों को जंगल सफारी रायपुर लाया गया । जंगल सफारी मैं भी मेडिकल जांच में दोनों को स्वस्थ बताया गया तथा वहां के डॉक्टर ने दोनों को जंगल में छोड़ने लायक बताया। मादा को वापस कांकेर भिजवा दिया गया, जहां उसे बिना रेडियो कालर लगाए सरोना रेंज के कंपार्टमेंट नंबर 124 में छोड़ा गया। नर को बिना किसी आदेश के रायपुर में रख लिया गया, जहां 17 सितंबर को सेप्टीसीमिया से वह मर गया।
नर तेंदुए की मृत्यु के पश्चात याचिकाकर्ता ने देश के ख्याति प्राप्त वेटरनरी सर्जन पदमश्री केके शर्मा से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि तेंदुए को बेहोश करते वक्त दो दवाइयों का मिश्रित इंजेक्शन लगाया जाता है। जब बेहोशी से बाहर निकालने के लिए इंजेक्शन दिया जाता है तो वह एक ही दवाई के लिए कार्य करता है, दूसरी दवाई के असर से जब तेंदुआ बाहर निकलता है तब वह बहुत तेजी से पिंजड़े की जालियों से टकराता है, जिससे उसे अंदरूनी चोटें लग जाती है, जो कि सेप्टीसीमिया का कारण बन जाता है और उसकी मौत हो जाती है। कांकेर में पकड़े गए नर और मादा दोनों को बहुत कम अंतराल में दो बार बेहोशी का इंजेक्शन लगाया गया, जिसमे से नर की सेप्टीसीमिया के असर से असमय मृत्यु हो गई।
वनमंडल अधिकारी कांकेर ने बिना मुख्य वन्यजीव संरक्षक की अनुमति के और बिना यह पता लगाएं कि कौन सा तेंदुआ प्रॉब्लम एनिमल है, एक मादा को पकड़ा, बेहोश कर जांच कराई और दूसरे दिन उसे बिना रेडियो कालर लगाए उसी कंपार्टमेंट में छोड़ दिया गया, जहां पर 12 सितंबर को पकड़ी गई मादा तेंदुआ को छोड़ा गया था। इस प्रकार एक ही कंपार्टमेंट में दो तेन्दुओ को छोड दिया गया जो कि उनकी आपस की वर्चस्व की घातक लड़ाई का कारण बन सकता है। 26 नवंबर 2021 और 29 नवामंबर 2021 को वनमंडल अधिकारी गरियाबंद ने बिना यह पता लगाएं कि कौन सा तेंदुआ प्रॉब्लम एनिमल है, सिर्फ इस आधार पर कि उस इलाके में 3 माह में कुछ घटनाएं हुई है, तेंदुए के घूमने के इलाके में पिंजरा लगाया और दो अलग-अलग तेंदुओं को पकड़ा। वनमंडल अधिकारी ने तेंदुए को पकड़ने के लिए अनुमति मांगी गई थी, परंतु मुख्य वन्यजीव संरक्षक ने नहीं दी। इसके बावजूद पकड़ा। 26 नवंबर को पकड़े गए तेंदुए को तो कई किलोमीटर दूर उदंती सीतानदी अभ्यारण में छोड़ दिया गया, परंतु 29 नवंबर को पकड़े गए तेंदुए को, बिना मुख्य वन्यजीव संरक्षक के तेंदुए को बंधक बनाने के आदेश के कानन पेंडारी में आजीवन कैद कर दिया गया।
इसी तरह अगस्त 2019 में वनमंडल अधिकारी राजनांदगांव ने मुख्य वन्यजीव संरक्षक के आदेश के बिना तेंदुआ पकड़ा और यह कहते हुए उसे भोरमदेव अभ्यारण में छोड़ दिया कि मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रायपुर ने उसे पकड़ने के निर्देश दिए हैं जबकि याचिकाकर्ता को मुख्य वन्यजीव संरक्षक तथा मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रायपुर ने बताया कि तेंदुआ पकड़ने के कोई भी आदेश उनके द्वारा नहीं दिए गए हैं।
धमतरी डीएफओ ने मुख्य वन्यजीव संरक्षक को पत्र लिख कर के कहा था कि यह उचित नहीं है कि तेंदुए को बार बार पकड़ कर दूसरे स्थान पर छोड़ा जाए। उन्होंने बताया था कि पकड़ने से तेंदुए को सेप्टीसीमिया हो जाता है, जिससे उसकी मौत हो जाती है। धमतरी डीएफओ ने कहा था कि धमतरी के पहाड़ी वन क्षेत्रों में शाकाहारी जानवर की उपस्थिति नहीं है परंतु मांसाहारी वन्यप्राणी जैसे तेंदुआ की उपस्थिति दिख रही है, ऐसे में शाकाहारी जानवर को लाकर वन क्षेत्रों में छोड़ा जाना चाहिए। डीएफओ ने लिखा था कि वन क्षेत्र में तेंदुआ खत्म हो जाने से वन क्षेत्रों में अवैध कटाई की समस्या बढ़ सकती है, जो कि जंगल के लिए नुकसानदायक है।
याचिकाकर्ता ने बताया कि समय समय पर मानव तेंदुआ द्वन्द कम करने के लिए उन्होंने भी कई सुझाव सरकार को दिए। इसमें उन्होंने कहा था कि वन विभाग को आदेशित किया जाए कि भारत सरकार की गाइडलाइंस का शब्दतः पालन किया जाए, भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धरा 11 के प्रावधानों का पालन कराया जाए। तेंदुए को वापस छोड़े जाने पर अनिवार्य रूप से रेडियो कालर लगाया जाए, मानक प्रचालन प्रक्रिया का पालन कराया जाए।
याचिका में भारत सरकार, छत्तीसगढ़ शासन, प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यप्राणी, मुख्य वन संरक्षक कांकेर, वनमंडल अधिकारी कांकेर, गरियाबंद, राजनांदगांव को पक्षकार बनाया गया है।


