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‘छत्तीसगढ़’ न्यूज डेस्क
रायपुर, 26 अप्रैल। हसदेव अरण्य में परसा कोयला ब्लॉक के लिए वनों की कटाई शुरू हो चुकी है। सोमवार से शुरू किए गए अभियान में रातों-रात सैकड़ों पेड़ काट डाले गए। शुरूआत साल्ही गांव की उसी जगह से हुई है जहां आदिवासियों का महादेव स्थल है। एक दिन पहले ही यहां पर पेड़ों से चिपककर महिलाओं ने अपना विरोध दर्ज कराया था और पेड़ों को बचाने का संकल्प लिया था।
धरनास्थल पर ही उन्होंने देवगुड़ी में मनाने वाला कठोरी त्यौहार मनाया। यह इलाका सूरजपुर जिले के जनार्दनपुर का जंगल है। ग्रामीण, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है, वे जंगल को बचाने के लिए हरिहरपुर में 2 मार्च से लगातार धरना दे रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह खनन परियोजना फर्जी ग्रामसभा प्रस्ताव के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। 6 अप्रैल को राज्य सरकार ने इस खनन परियोजना के लिए वन स्वीकृति जारी की थी परंतु प्रभावित गांव साल्ही, हरिहरपुर और फतेहपुर गांव की ग्रामसभाओं के फर्जी प्रस्ताव बनाए गए। वे इनकी जांच की मांग करते आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन गांव की ग्रामसभाओं ने कभी भी खनन परियोजना को सहमति नही दी। अक्टूबर माह में 300 किलोमीटर पदयात्रा के बाद भी हसदेव के आदिवासियों की कोई सुनवाई नहीं हुई।
उल्लेखनीय है कि यह खदान राजस्थान राज्य विद्युत निगम को आबंटित है लेकिन इसमें उसकी सीमित भूमिका है। राजस्थान सरकार ने अदानी के साथ जो अनुबंध किया है उसके अनुसार कोल ब्लॉक से उत्खनन संबंधी सभी तरह की स्वीकृति अदानी की कंपनी को ही लेना है। कोयले का खनन और परिवहन का काम भी अदानी की कंपनी को ही देखना है। उत्पादित कोयले का एक निश्चित हिस्सा भी अदानी को मिलेगा। इसके बावजूद राज्य में बिजली संकट का हवाला देते हुए राजस्थान सरकार ने खदान की मंजूरी के लिए केंद्र, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से लगातार संपर्क कर दबाव बनाया। बीते माह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रायपुर आकर सीएम बघेल से मुलाकात की थी। इसके बाद परसा कोल ब्लॉक में उत्खनन की स्वीकृति दे दी गई।

परसा कोल ब्लॉक के लिए लगभग 841.5 हेक्टेयर भूमि दी गई है। यहां से 700 लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। 2009 की गणना के अनुसार लगभग 95,000 पेड़ों के काटे जाने की आशंका थी, लेकिन अब 2022 में कटने वाले पेड़ों की संख्या लगभग 2 लाख होगी।

हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खदानों की मंजूरी देने के खिलाफ पहले से ही अनेक अध्ययन किए गए हैं। इनमें केंद्र सरकार की एजेंसियां भी शामिल हैं। इन रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यहां कोयला उत्खनन की मंजूरी देने से पर्यावरण, जल और जंगल की जो क्षति होगी, उसकी कभी भरपाई नहीं हो पाएगी।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में इस मंजूरी के खिलाफ याचिकाएं लगा रखी हैं, जिन पर सुनवाई चल रही है।
(तस्वीरें अखबारनवीस रितेश मिश्रा ने ट्विटर पर पोस्ट की हैं।)


