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माता-पिता ईंट भट्ठे में काम करने गए, दृष्टिबाधित ईश्वरी देश के लिए जीत लाई रजत
28-Mar-2022 12:34 PM
माता-पिता ईंट भट्ठे में काम करने गए, दृष्टिबाधित ईश्वरी देश के लिए जीत लाई रजत

  दुबई से रविवार को लौटी,  अब राष्ट्रीय स्पर्धा ओडिशा में दौडऩे गई  

 ईश्वरी ओडिशा में आयोजित नेशनल स्पर्धा में भाग लेने गई हुई है। ‘छत्तीसगढ़’ से फोन पर हुई बातचीत प्रस्तुुत है। संभर स्थित उनके निवास में ताला लगा मिला। गांववालों ने कहा कि ईश्वरी के माता-पिता ईंट भट्ठे में काम करने दूसरे राज्य गए हैं। गांव के लोगों को नहीं मालूूम कि वल्र्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप होता क्या है? गांव के अधिकांश घरों में ताला लटका था। शायद रोजी रोटी के लिए बाहर निकले होंगे।

उत्तरा विदानी
महासमुंद, 28 मार्च (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)।
दुबई में 17 से 25 मार्च तक आयोजित 2022 वल्र्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर दौड़ में विश्व में दूसरा स्थान पर रहकर भारत के लिए रजत पदक लाने वाली दृष्टिबाधित बालिका ईश्वरी निषाद महासमुंद के एक छोटे से गांव संभर में बेहद गरीबी में जीवन गुजारती है। पिता और मां इस वक्त ईंट भट्ठे में काम करने गांव से बाहर गए हैं। इनके पास बातचीत केे लिए कोई साधन नहीं हैं, इसलिए वे न तो अपनी बेटी के इस खुशी में शामिल हो पाए हैं और न ही बेटी को बधाईयां दे सके हैं। ईश्वरी ओडिशा में आयोजित नेशनल स्पर्धा में भाग लेने गई हुई है। वह महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड स्थित ग्राम करमापटपर में संचालित दृष्टिबाधित स्कूल फाच्र्यून में बारहवीं की छात्रा है। रविवार को ही दुुबई से ओडिशा वापस लौटी हैं।

‘छत्तीसगढ़’ से फोन पर खास बातचीत में पता चला कि ईश्वरी को अपनी गरीबी सरेआम करने से काफी गुरेज है। वह कहती है-आंख से न देख पाने का मतलब अपंगता नहीं है। इसके बदले में भगवान जी कई और खूबियां देते हैं, जिसके उपयोग से संसार को जीता जा सकता है। इन्होंने इस जीत का पूरा श्रेय अपने शिक्षकों दी है।  

ईश्वरी ने जैसा ‘छत्तीसगढ़’ से कहा-सब कुछ छाप लीजिए, पर मेरी गरीबी किसी को मत बताइएगा। कोई बात नहीं जो मेरा घर मिट्टी का है, कल पक्का भी बना लेंगे। छोटे भाई-बहन को भी पढ़ा लेंगेे। मलाल सिर्फ इतना है कि मैं मां-पिताजी और भाई बहनों को देख नहीं पाती। मुझे लगता है कि दुनिया में सबसे सुंदर मेरी मां होगी। मेरे पिता कोई राजा होंगे। ईश्वरी कहती हैं-शरीर का एक अंग यदि काम करना बंद कर दे तो इंसान को चाहिए कि बाकी अंगों के सहारे स्वावलंबी रहे। दूसरे पर हरगिज निर्भर न रहें और जब भी मौका मिले जननी और जन्मभूमि को अपनी हैसियत सौंप दें।

ईश्वरी कहती हैं-यह मेरी मां और शिक्षकों का आशीर्वाद है। मेरे घर में साधन के नाम पर एक साइकिल भी नहीं है फिर भी मैंने दुपहिए, चार पहिए, रेल के अलावा हवाई जहाज तक का सफर किया। जब मैं जहाज में बैठी तो लगा कि मेरी मां मेरे नजदीक वाली सीट पर बैठी है.. और जब मेडल ली, तो लगा कि गुरुदेव निरंजन साहू ने मुझे देश में अव्वल बना दिया।  

ईश्वरी निषाद वर्ष 1999 में बागबाहरा विकासखंड के ग्राम संभर निवासी छबिलाल और मोंगराबाई के घर पैदा हुईं। उसके जन्म पर घर में खुशियां नहीं मनी। घर में ईश्वरी से बड़े एक भाई और बहन थीं, तीसरे नंबर पर होने के नाते गांववाले कुछ लोगों ने उसकी अपंगता पर दु:ख जाहिर किया, लेकिन मां मोंगराबाई परिवार और गांववालों की बातों को दरकिनार कर ईश्वरी को बेहद जतन से पालती रहीं। ईश्वरी के बाद घर में एक और भाई पैैदा हुआ। ईश्वरी को छोड़ सभी सामान्य हैं। इनमें से दो बड़ों की शादी हो चुकी है। घर में इस वक्त छोटा भाई है। मां ने ईश्वरी को पांच साल की उम्र में गांव के स्कूल में दाखिला की कोशिश की और सफल हुई, लेकिन ईश्वरी सामान्य बच्चों की तरह कहां पढ़ सकती थीं भला? फिर भी किसी तरह पांचवीं की परीक्षा पास कर लीं, लेकिन मिडिल स्कूल में किसी ने दाखिला नहीं दिया।
इसी बीच उसकी मां को करमापटपर स्थित फाच्र्यून विद्यालय की जानकारी मिली। यहां स्कूल में ही रखकर नेत्रहीन बच्चों को शिक्षा दी जाती है। वह बच्ची को लेकर शिक्षक निरंजन साहू से मिली। निरंजन साहू और शिक्षिकाओं ने ईश्वरी के हुनर को तराशना शुरू किया। ईश्वरी ब्रेल लिपि से पढऩे लगी। उसे स्कूल में खेलना, गीत गाना, वाद्य यंत्र बजाना, खुद काकाम करना सिखाया गया।

शिक्षकों ने देखा कि ईश्वरी काफी तेज दौड़ती है, उसे हर सुबह एक घंटे दौडऩे का प्रशिक्षण देते रहे। इस तरह स्कूूल से निकलकर उसने जिला और प्रदेश स्तर में दौड़ लगाते हुए विदेश में छलांग लगाई और देश के लिए मेडल ला दिया।
शिक्षक निरंजन साहू कहते हैं-स्कूल के 7-8 बच्चे खेल में काफी पारंगत हैं। उन्हें रोज ट्रेनिंग दी जाती है। बच्चों को गुुरुकल की परंपरा अनुसार शिक्षा दी जाती है। शासकीय स्कूल नहीं है फिर भी ऐसे बच्चों के लिए काम जारी है। हमारे बच्चे हमें हौसला देते हैं। नेत्रहीनता की भी तीन श्रेणी होती है। जिन बच्चों को कुछ भी नहीं दिखता उन्हें एक नंबर केटेगरी में रखते हैं। जिन्हें दिखने का थोड़ा बहुत आभास होता है, उन्हें दो नंबर केटेगरी में और जिन्हें हल्का सा दिखाई दे, उन्हें तीन नंबर केटेगरी में रखकर उनकी देखभाल करते हैं। ईश्वरी प्रथम केटेगरी की है, उन्हें कुछ भी नहीं दिखता।     

महासमुंद की दृष्टिबाधित धाविका ईश्वरी निषाद ने दुबई में आयोजित 13वें फैजा इंटरनेशनल एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया और रजत पदक हासिल किया है। छत्तीसगढ़ की यह पहली दृष्टिबाधित धाविका हंै, जिन्होंने वल्र्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रैण्ड प्रिक्स 2022 में दौड़ लगाकर भारत के लिए रजत पदक जीता है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विधायक एवं संसदीय सचिव विनोद सेवन लाल चंद्राकर, जिले के कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर, एसपी विवेक शुक्ला ने इस उपलब्धि के लिए ईश्वरी निषाद को अपनी ढेर सारी बधाईयां, शुभकामनाएं और आशीर्वाद प्रेषित किया है।


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