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एकाएक नहीं मिली राज्यसभा टिकट, पर्दे के पीछे सालों का संघर्ष रहा- डॉ. संदीप पाठक
28-Mar-2022 9:06 AM
 एकाएक नहीं मिली राज्यसभा टिकट, पर्दे के पीछे सालों का संघर्ष रहा- डॉ. संदीप पाठक

-राजेश अग्रवाल

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

आम आदमी पार्टी ने पंजाब से जिन पांच सदस्यों को राज्यसभा भेजा है उनमें एक डॉ. संदीप पाठक भी हैं, जो छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। वे दिल्ली आईआईटी में प्रोफेसर थे। नौकरी छोड़कर सन् 2016 से अरविंद केजरीवाल से जुड़ गए हैं। छत्तीसगढ़ से हुई लंबी चर्चा में उन्होंने हर एक मुद्दे पर खुलकर बात की। वे बताते हैं कि विदेशों में साइंस की पढ़ाई के दौरान उन्होंने कड़ी मेहनत की, पर उसी समय राजनीति में आने का मन बना लिया था। वजह यह थी कि वे देश के लिये अच्छी नीतियां बनाने में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। डॉ. पाठक का मानना है कि आने वाले दिनों में उसी की पॉलिटिक्स चलेगी, जिसकी नीयत अच्छी हो। चुनाव प्रचार अभियान अब आक्रामक और साइंटिफिक हो चुका है। एक-एक मतदाता तक पहुंचना जरूरी हो गया है। भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा, तब योजनाएं जमीन पर दिखेंगीं। कांग्रेस या किसी अन्य दल को खत्म करने की बात लोकतंत्र के खिलाफ है। भाजपा के कोई डील होती तो वे गुजरात में विधानसभा चुनाव की इतनी तैयारी क्यों कर रहे होते? छत्तीसगढ़ में गरीबों को अनाज, किसानों को उपज का सही मूल्य देना, बोनस देना उनका अधिकार मानते हैं पर यहां पंजाब-हरियाणा की तरह खेती का विकास देखना चाहते हैं। डॉ. पाठक कहते हैं कि भाजपा-कांग्रेस दोनों दलों से आदिवासियों का विश्वास उठ चुका है, क्योंकि विकास और उत्खनन की योजनाओं पर निर्णय लेने में उन्हें भागीदार नहीं बनाया जाता।

बातचीत के प्रमुख अंश इस प्रकार हैः-

0 छत्तीसगढ़ में आपकी राज्यसभा के लिये नाम तय होने पर प्रसन्नता देखी जा रही है, क्योंकि आप यहीं के एक छोटे से गांव से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचे। बहुत से लोगों में जिज्ञासा है कि देश-विदेश में इतनी कठिन पढ़ाई कर, अच्छी खासी प्रोफेसर की नौकरी छोड़ आपने राजनीति के उतार-चढ़ाव भरे रास्ते को क्यों चुना?

00 जब मैं किशोर अवस्था में था, तब से दिमाग में यह बात बैठी थी कि मुझे देश के लिये किसी ऐसे रास्ते से काम करना है, जिसमें मेरी प्रत्यक्ष भूमिका हो। शुरू में साफ पता नहीं था कि यह कैसे करूंगा। पर धीरे-धीरे समझ में बात आ गई कि राजनीति एक ऐसा माध्यम है, जिसमें जाकर आप देश के लिये पॉलिसी बना सकते हैं। पॉलिसी यानि नीतियों के माध्यम से ही देश चलता है। जब मैं विज्ञान की पढ़ाई में व्यस्त था, तो पता नहीं था कि कब और किस रास्ते से राजनीति में आऊंगा। उस वक्त पढ़ाई में ही ध्यान लगाया। बहुत मेहनत की और आगे बढ़ता गया। देश वापस लौटकर दिल्ली में नौकरी ज्वाइन कर ली। यहां आने के बाद लगा कि मेरी आधी उम्र तो निकल चुकी, आज मैं 42 वर्ष का हूं। तो आज यदि मैं राजनीति में आकर कुछ योगदान दे सकूं तो यह सबसे अच्छा समय है। वैसे भी मैं राजनीति में कैरियर बनाने के लिये नहीं आया हूं। थोड़ा बहुत जो कर सकेंगे, करेंगे। बाकी तो परमात्मा तय करेगा कि क्या होना है।

0 आजादी से लेकर देश में बहुत सी अच्छी पॉलिसीज़ बन चुकी हैं। अनेक क्षेत्रों में विकास से लेकर गरीबों के कल्याण तक, लेकिन असल समस्या तो उन्हें अमल पर लाने और असर दिखाई देने की भी है?

00 आपका आकलन बिल्कुल सही है। पॉलिसीज़ तो बहुत अच्छी-अच्छी बनी हैं। शायद हमारे देश में जितनी अच्छी नीतियां बनी होंगी, उतनी कई विकसित देशों ने भी नहीं बनाई होगी। पर दो स्तर की दिक्कतें हैं। एक तो लागू करने की जरूरत को कोई भी सरकार गंभीरता से समझती नहीं। उन्हें लगता है कि बिना काम किये भी तो दूसरे मुद्दों से चुनाव जीता जा सकता है। दो, कुछ नीतियां बनती है और सरकार उसे लागू करना भी चाहती हैं, पर वहां पर लीडरशिप के सामने ब्यूरोक्रेसी भी है। पूरे तंत्र में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा है कि पॉलिसी शहीद हो जाती है। यह समस्या तब हल होगी जब जनता अपने प्रतिनिधियों से हिसाब मांगने लग जाए कि आपने कहा था ये करेंगे, पर किया नहीं। इस बार आपको वोट नहीं देंगे। तब फिर जन-प्रतिनिधि जो घोषणा करते हैं, नीतियां बनाते हैं, उन पर अमल करने के लिये जूझेंगे।

इसीलिये अरविंद केजरीवाल हमेशा कहते हैं कि देश को बदलने के लिये किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। कोई भी कर सकता है। इसके लिये एक ही चीज जरूरी है- नीयत। यदि आपकी नीयत है तो आप पॉलिसी केवल बनायेंगे नहीं, निष्पादित भी करेंगे और धरातल पर वह लागू होते हुए दिखेगा भी।

0 आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि आरएसएस की रही, भाजपा से लोग जुड़े रहे। फिर जब आपने राजनीति में आने का सोचा तो आपके सामने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा थी, कांग्रेस भी थी। फिर आपने एक छोटे से दल, जिसकी सिर्फ एक राज्य दिल्ली में उस वक्त सरकार थी, के साथ जाने के बारे में क्यों सोचा?

00 राजनीति से तो हमारे घर-परिवार के लोग पहले से ही जुड़े हुए हैं। घर से ही राजनीतिक माहौल देखा हुआ है। फिर बाहर जब पढ़ाई के लिये निकला, तब भी आम इंसान की तरह विभिन्न दलों की राजनीति को ऑब्जर्व करता रहा। जब मैंने अरविंद केजरीवाल को देखा तो समझा कि ये नये किस्म का काम कर रहे हैं। मेरा विचार उनसे करीब था कि राजनीति को बहुत जटिल बनाना जरूरी नहीं है। इसे गवर्नेंस का ही एक माध्यम रखना है। अच्छे स्कूल, अस्पताल बनें, बिजली, साफ पानी सबको मिले, किसानी को ठीक करना है, बेरोजगारी ठीक करना है। सारी दुनिया देखी है मैंने। बार-बार मैं जब दूसरे देशों में घूमता था तो मुझे लगता था कि काश यह मेरे देश में भी होता। यह काम हो सकता है। केजरीवाल जी का काम देखा तो मुझे लगा कि मेरी सोच की राजनीति यहीं हो रही है। यही वे आदमी हैं, जिनके साथ मुझे चलना चाहिये।

0 यह कौन से साल की बात है, शुरूआत कैसे हुई बताते चलें।

00 जैसा कि मैंने पहले बताया कि बचपन से ही राजनीति में मेरा विश्वास था। जब मैं इंग्लैंड में था तब राजनीति में प्रवेश करने के लिये मेरा मन मजबूत होता गया। जब भी बाहर देशों की समृद्धि को देखता था और सोचकर दुखी होता था कि हमारे पास भी तो इतना पैसा है, फिर हम यह सब क्यों नहीं कर पा रहे हैं। जितनी उनकी बुद्धि है, उतनी हमारी भी है। आखिर किस बात की कमी है। एक किसान का बेटा होने के नाते मैं सोचता था- मेरे गांव बटहा के, पास के गांव छतौना के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ रहे हैं, वे वहां से निकलकर आखिर कर ही क्या पायेंगे? उनके लिये अच्छा अवसर क्यों नहीं हो।

2016 में देश वापस लौटा तो मैंने नौकरी ज्वाइन कर ली। यहां दिल्ली में मुझे कुछ वालिंटियर्स मिले, जो मेरी जान-पहचान के थे। वे आम आदमी पार्टी के लिये काम करते थे। वे सोलर पॉलिसी, एजुकेशन पॉलिसी, आंगनबाड़ी आदि से संबंधित पॉलिसी पर काम कर रहे थे। उन्होंने कई पॉलिसीज़ बनाने में मुझसे मदद ली, मैं करता गया। इनसे जुड़कर मैंने पाया कि केजरीवाल जो कहते हैं, वह वे कर भी रहे हैं। दूसरे राजनीतिक दलों में यह मैंने नहीं देखा। सन् 2016 के आखिरी में इस नतीजे पर पहुंच गया कि मुझे आम आदमी पार्टी से ही जुड़कर काम करना है, जुड़ गया। फिर 2017 की शुरूआत में ही ऐसा एक समय आया, जब मैं केजरीवाल के सीधे संपर्क में आ गया।

आप कहीं भी जाओ तो शुरू में आपको बड़ा काम नहीं मिलता। छोटे-छोटे काम से ही शुरूआत होती है। मेरे साथ भी ऐसा ही रहा। मैं वालिंटियर के रूप में उनके सौंपे गये काम करता रहा। फिर इस बीच बवाना का उप-चुनाव आया। इस चुनाव में अरविंद जी ने मेरी मदद ली और वहां मुझे बड़ी जिम्मेदारी दी। वह चुनाव हम जीत गए। उनका मुझ पर विश्वास बढ़ा। फिर उसके बाद दिल्ली का विधानसभा चुनाव आया। बहुत सी रणनीति, योजनाएं मैंने बनाई। कैंपेन की प्लानिंग की। उस चुनाव में काफी अच्छी जीत मिली। मेरे प्रति उनका विश्वास और बढ़ा ही होगा। इसके बाद उन्होंने मुझे पंजाब के लिये प्लानिंग, कैंपेनिंग और डिजाइनिंग का काम सौंप दिया। ऐसा करते-करते हुए मैंने पार्टी के भीतर एक दर्जा पाया। सब एकाएक नहीं है। पर्दे के पीछे सालों का स्ट्रगल रहा है। बहुत से छोटे-छोटे काम करते रहे और यहां तक पहुंच गये।      

0 पंजाब में ऐसा तो नहीं है कि कांग्रेस नेतृत्व की आपसी लड़ाई और अकाली दल भाजपा में टूट का फायदा आप को मिला।

00 देखिए, समझना होगा कि किसी भी चुनाव को जीतने के लिए एक मुद्दा काफी नहीं होता है। कई मुद्दे मिलकर परिणाम देते हैं। पहली बात तो यही थी कि पंजाब की जनता अब तक की दोनों ही सरकारों, कांग्रेस और भाजपा-अकाली गठबंधन से बुरी तरह त्रस्त हो गई थी। इन दोनों पार्टियों ने पंजाब  को किस तरह निचोड़ा, मैं आपको बता नहीं सकता। करप्शन बहुत ज्यादा है यहां पर। रेत माफिया पूरे पंजाब की धरती खोद चुके हैं। ड्रग माफिया गांव-गांव पहुंच गए हैं। बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि बच्चे ड्रग के पीछे भागे जा रहे हैं। जनता त्रस्त थी और विकल्प ढूंढ रही थी, सोचने लगी थी कि अब बहुत हो गया, इन दोनों सरकारों का। इस बीच केजरीवाल सरकार फिर दिल्ली में आई। लोगों ने मॉडल ऑफ गवर्नेंस देखा। पंजाब दिल्ली से जुड़ा राज्य है। पंजाब के लोगों ने महसूस किया कि केजरीवाल ने दिल्ली में कैसा काम किया है। पंजाब के लोगों की रिश्तेदारी है दिल्ली में। वे आते-जाते रहते हैं। उनका अनुभव साथ था। इसीलिये जब केजरीवाल की पार्टी पंजाब में चुनाव लड़ने आई तो उस पर लोगों को भरोसा करने में बहुत दिक्कत हुई नहीं। इसके लिये हमने एक-एक गांव, बूथ में बहुत मजबूत टीम बनाई। इन टीमों के तीन लाख युवाओं को वैज्ञानिक पद्धति से एक दूसरे के साथ संवाद से जोड़ा। एक अभूतपूर्व विशाल तंत्र बना। हमने चुनाव अभियान में वही मुद्दे लिये, जो जनता चाहती थी। पब्लिक को पानी चाहिये था, हम वही देने की बात कर रहे थे। दूसरी पार्टियां पीने के लिये कोका-कोला देने की बात कर रही थीं। बाकी कसर कांग्रेस में सिद्धू और चन्नी के बीच हो रही लड़ाई ने पूरी कर दी। इधर अकाली दल तो भाजपा से अलग हो ही चुका था। कांग्रेस में रहते हुए कैप्टन ने जो झूठे वादे किये थे, उसने भी हमारी काफी मदद की।

0 दिल्ली, फिर गोवा और पंजाब। आपकी पार्टी ज्यादातर उन्हीं राज्यों में जा रही हैं, जहां या तो बीजेपी सरकार बनने की संभावना क्षीण हो, या फिर गोवा जहां भाजपा विरोधी वोट बिखर सकें। कई लोग आपको भाजपा की बी टीम कहने लगे हैं। वह भी कांग्रेस को खत्म करना चाहती है, आप भी। छत्तीसगढ़ में भी इसीलिये आपकी सक्रियता बढ़ रही है। ऐसा कहा जा रहा है।

00 देखिये, किसी भी राजनैतिक दल को खत्म करने की बात कहना प्रजातंत्र के लिये ठीक नहीं है। कांग्रेस या इसको-उसको खत्म करने के लिये हम नहीं आए हैं। सभी पार्टियां अच्छा काम करें और जनता को बतायें। जिनका काम ज्यादा अच्छा होगा, उसे जनता चुनेगी। किसी को खत्म करने की जरूरत नहीं है। दूसरी ये बात जो आप कह रहे हैं कि जहां भाजपा की सरकार बनने की संभावना नहीं है वहां हम जा रहे हैं। या भाजपा के विरोधियों की ताकत में बिखराब के लिये कहीं पर लड़ रहे हैं, तो सबसे पहले दिल्ली का ही उदाहरण लीजिये। वहां तो बीजेपी बहुत मजबूत थी, कांग्रेस भी थी। अब भी तीनों महानगरपालिका में भाजपा बैठी है। हमारी सरकार तो सबसे पहले वहीं बनी। इधर पंजाब हम गये तो इसलिये कि लोकसभा में हमारे चार सांसद वहां से चुनकर आये। वहां बीजेपी अकाली दल के साथ मजबूत खड़ी थी। वह तो किसान आंदोलन में झूठा दिखावा करते हुए अकाली दल अलग हो गया, जिसे पंजाब की जनता समझ गई। अब हमारा अगला लक्ष्य गुजरात है, जहां मुझे प्रभारी बनाया गया है। यहां तो भाजपा की ही सरकार है और उसी के साथ हमारी सीधी टक्कर है। हमारा उद्देश्य किसी एक पार्टी को टारगेट करना बिल्कुल नहीं है। हमारा उद्देश्य बिल्कुल सरल है। जिस राज्य की जनता हमसे प्यार कर रही है, कह रही है कि चुनाव लड़ो, हम वहीं जा रहे हैं। कौन सा दल किस पोजिशन में है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता।

0 छत्तीसगढ़ में भी आपकी पार्टी काफी जोर लगा रही है। पिछले चुनाव में तो आप 90 में 85 सीटों पर लड़ी, पर कुल जमा 1.25 लाख वोट ले पाई। अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। यह दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का इलाका है और जिस तरह का नेतृत्व आप पार्टी में है, एडवोकेट, इंजीनियर, आईआईटीयन, क्या उनके साथ ये मतदाता जुड़ाव महसूस कर पायेंगे?

00 छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की भरपूर संभावनाएं हैं। यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। दोनों पार्टियों से जनता का मोहभंग हो चुका है। पर कभी ये दल, तो कभी वह इसलिये जीत रहे हैं क्योंकि जनता के पास विकल्प नहीं है। अमीर धरती के लोगों को इन्होंने ही गरीब बनाकर रखा है। यहां हमारी पार्टी के संघर्ष के लिये बिल्कुल अनुकूल माहौल है।

ऐसा कहना कि हमारी पार्टी के पढ़े-लिखे लोगों का यहां के गरीबों, आदिवासियों, किसानों से तालमेल नहीं बैठ रहा है तो यह भी सही नहीं। सबसे बड़ा उदाहरण तो मैं ही हूं। किसान परिवार से हूं। आज भी मेरे घर में खेती ही आमदनी का जरिया है। किसान ही तो किसान को समझेगा। अभी हम वहां और मेहनत कर रहे हैं। आदिवासियों को जोड़ेंगे, शहरिंयों को जोड़ेंगे। पंजाब की तरह यहां भी अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग मुद्दे हैं। छत्तीसगढ़ में हम बहुत अच्छा करने जा रहे हैं।

0 जो काम आम आदमी पार्टी कर रही है, मुफ्त देने का। वह तो कांग्रेस, भाजपा की सरकारों ने यहां भी बहुत किया है। मुफ्त चावल, धान बोनस, उस पर समर्थन मूल्य, फिर कर्ज माफी, आप के पास नया कहने, करने के लिये क्या बचा है?

00 डॉ. रमन सिंह आए तो उन्होंने फ्री चावल देना शुरू किया। धान पर बोनस दिया, फिर भूपेश बघेल सरकार ने बोनस बढ़ाया। यह तो सब ठीक है। यह गरीबों और किसानों का हक है। उन पर कोई एहसान नहीं किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ धान के कटोरे के नाम पर जाना जाता है और यहां के किसानों को उपज का सही दाम ना मिले यह तो कोई मंजूर नहीं करेगा। पर 2500 रुपये देकर, बोनस देकर और थोड़ी-थोड़ी दूसरी राहत देकर सोचते हैं कि जनता इससे खुश है। आपने उनका वोट खरीद लिया और ऐसा कर आप पांच साल आराम करते रहेंगे, तो यह धारणा बदलनी होगी। आपने कितने किसानों को उन्नत खेती करते देखा है। उन्नत कृषक, जिसके पास ट्रैक्टर हों, आधुनिक कृषि उपकरण हों। मेरे अपने गांव बटहा में भी गिने-चुने ट्रैक्टर मिलेंगे। आप खेती को नवीनतम तकनीक से जोड़ने और व्यावसायिक बनाने के लिये क्या कर रहे हैं, जिससे किसान आमदनी बढ़ा सकें। पंजाब, हरियाणा की तकनीक के मुकाबले हमारे यहां खेती का तरीका कुछ भी नहीं है। दूसरी ओर मुंगेली, लोरमी यहां तक के बिलासपुर के सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की हालत क्या है, बताइये। सब निजी अस्पतालों की तरफ भागने को विवश हैं, क्यों? स्कूलों की हालत पर मैं पहले ही कह चुका हूं। किसान का बेटा कलेक्टर, कमिश्नर बन सके इसके लिये आपने शिक्षा में क्या सुधार किया है? आप पार्टी आयेगी तो खेती को बहुत ऊंचा उठायेगी। दुनिया भर में बदलाव आये हैं, हमारे छत्तीसगढ़ में भी दिखेगा।

0 आदिवासियों और सरकार के बीच टकराव यहां होता रहता है। विस्थापन, जंगलों का दोहन, खदानों के संचालन को लेकर आंदोलन। आम आदमी पार्टी का इस मामले में क्या दृष्टिकोण है।

00 यह समस्या इसलिये है क्योंकि सरकारें अपने फैसलों में उन्हें भागीदार नहीं बनाती। आदिवासी बाहुल्य राज्य में आदिवासियों से जुड़ी समस्याएं हैं, तो निर्णयों में उन्हें शामिल करिये, सहमत करिये। अभी खबरों में मैंने देखा कि रिच फॉरेस्ट हसदेव अरण्य में कोयला खदान खोलने की मंजूरी छत्तीसगढ़ सरकार ने दे दी है, जबकि इसका विरोध हो रहा है। आदिवासियों की तरक्की के बगैर छत्तीसगढ़ की तरक्की को आप कैसे नापेंगे? फैसलों में भागीदार नहीं बनाये जाने के कारण आदिवासियों का किसी सरकार पर यहां भरोसा नहीं रहा। इनका विश्वास हासिल किये बगैर आप कोई  प्रोजेक्ट, कोई खनन कोई दोहन कैसे कर पायेंगे? भले ही ऐसे किसी फैसले में दो चार साल की देरी हो जाये पर सहमति के बिना कुछ नहीं होना चाहिये। नक्सल इलाकों को छोड़ भी दें तो बाकी जो जंगल हैं, वहां भी आदिवासी मान रहे हैं कि हमारे नेता हमें लूट रहे हैं।

0 राज्यसभा में पंजाब की खाली सीटों के लिये आम आदमी पार्टी ने जिन्हें उम्मीदवार बनाया, वे सब के सब अभिजात्य वर्ग के हैं, एक भी महिला नहीं। सभी संपन्न लोग हैं और कहें तो सवर्ण वर्ग के लोग हैं। क्या समाज के पिछड़े वर्गों को आम आदमी पार्टी में जगह नहीं है?

00 इस बार की सूची में ऐसा दिख रहा है लेकिन अभी तो बहुत संभावनाएं हैं। आगे अवसर ही अवसर हैं। सामाजिक संतुलन के साथ प्रतिनिधित्व के प्रति आप पार्टी प्रतिबद्ध है। बहुत सी चीजें जो अभी होती नहीं दिख रही, आगे दिखाई देगी।

0 देखा गया है कि चुनाव प्रचार का तौर तरीका अब हाईटेक ही नहीं हुआ, बल्कि योजनाकारों का महत्व बढ़ गया। ऐसे योजनाकार जो साइंस और इंजीनियरिंग के क्षेत्र से हैं, टेक्नोलॉजी और स्टेटिक्स पर काम कर रहे हैं। भाजपा ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में और केजरीवाल ने खुद की टीम बनाकर यह किया। तृणमूल के लिये प्रशांत किशोर ने किया। आपने खुद बताया है कि किस तरह से पंजाब में आपने तीन लाख वालेंटियर्स को एक दूसरे के संपर्क में रखा था। इस नये तरीके के प्रचार में क्या विचारधारा और नेतृत्व को कृत्रिम रूप से बड़ा बनाकर जबरन मतदाताओं पर थोपा नहीं जा रहा है? साधन विहीन पार्टियां तो हाशिये पर चली जायेंगीं?

00 हम बचपन में चुनाव प्रचार देखा करते थे। नेताजी की झंडा लगी हुई जीप धूल उड़ाते हुए निकलती थी। उस पर गाना बजता एक लाउडस्पीकर लगा होता था। जीप से निकालकर पर्चे, बिल्ले बांटे जाते थे। दीवारों को चुनावी नारों से रंगा जाता था। कुछ पोस्टर होर्डिंग्स भी बाद में लगने लगे। बस इतना ही जरूरी था, मुकाबले के लिये। पर अब सब कुछ बदल गया है। आजकल चुनाव प्रचार बहुत आक्रामक हो गया है। सभी राजनीतिक दल इस बात को समझ रहे हैं। चुनाव लड़ने से लेकर जीतने तक स्ट्रेटजी में साइंस का महत्व बढ़ रहा है। कैंपेन अब बहुत आक्रामक हो गया है। ऐसा इसलिये करना पड़ रहा है क्योंकि एक-एक वोटर जागरूक हो गया है। एक-एक तक पहुंचने के लिये कम्युनिकेशन के जितने साधन हैं, सबका इस्तेमाल करना, पार्टी और नेता की छवि बनाना, उसे मतदाताओं के मन में बिठाना, सब हो रहा है। इसके लिये कंपनियों से कांटेक्ट भी हो रहे हैं। मंशा यह होती है कि आपने क्या कुछ किया है या करना चाहते हैं, एक-एक बात वोटर तक पहुंचे। इन सब के बावजूद फसल आप तभी काटेंगे जब सही तरीके से उगायेंगे। यदि किसी पार्टी की नीति या उसका नेतृत्व मतदाताओं को पसंद नहीं है तो उसे इन तमाम उपायों के बाद भी वोट नहीं मिलेंगे।

0 वैसे तो आपने अभी की बातचीत में कहा है कि हम यह नही देखते कि सामने कांग्रेस है या भाजपा। चुनाव मैदान में अपनी जीत के लिये उतरते हैं। फिर भी हमने देखा कि पांच राज्यों के चुनाव के दौरान भाजपा के प्रति केजरीवाल का रवैया नरम था। उन्होंने प्रधानमंत्री को अपने भाषणों में नहीं छुआ। पर जैसे ही चुनाव खत्म हुए, दिल्ली विधानसभा के सत्र में वे मोदी के खिलाफ फिर आक्रामक हुए। द कश्मीर फाइल्स फिल्म को यू टूयूब पर अपलोड करने की सलाह दे दी।

00 देखिये यह तो सलाह हल्के मूड में दी गई लेकिन चर्चा तो कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार के गंभीर मुद्दे पर थी। कश्मीरी पंडितों के साथ जो अत्याचार हुए उसे देखकर सुनकर किसी का भी खून खौल सकता है। पर इस घटना को कितने साल बीत चुके। आठ वर्षों से नरेंद्र मोदी ही तो सत्ता में हैं न? इस पर कोई सवाल भी नहीं है कि इस समय वे देश के सबसे मजबूत नेता है। आज जब वे कश्मीरी पंडितों को के लिये कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो कब करेंगे? आज नहीं हुआ तो भविष्य में भी नहीं हो पायेगा। वे कहते हैं फिल्म देखो, लाइक करो। पर आपके पास असीमित ताकत है। कश्मीरी पंडितों के दर्द पर मरहम तो तब लगेगा, जब वे अपनी खोई हुई जमीन पर वापस बस जायेंगे। आज आप (मोदी) नहीं कर पा रहे हैं तो कौन करेगा। मुद्दे से आप भटका रहे हैं, सवाल यह है।

जहां तक विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी के खिलाफ आक्रामक नहीं होने की बात है तो पंजाब में बीजेपी सत्ता की दौड़ में थी नहीं, उन पर बोलने का कोई मतलब नहीं था।

0 छत्तीसगढ़ आने का कोई कार्यक्रम बन रहा है?

00 जी, आठ दस दिन के भीतर कार्यक्रम तैयार हो जाएगा।


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