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एक माह के भीतर जा चुकी तीन की जान, अब शेष 8 भालुओं की हिफाजत का सवाल
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 26 मार्च। कानन-पेंडारी चिड़ियाघर में 15 दिनों से हैपेटाइटिस संक्रमण से संघर्ष कर रही मादा भालू कविता की जान आखिर नहीं बचाई जा सकी। एक माह के भीतर भालू की यहां भालू की यह तीसरी मौत है। लगातार मौतों ने जू प्रबंधन और वन विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
कानन पेंडारी में 26 मार्च को एक भालू की मौत हुई तो यहां के अफसरों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। 10 मार्च को एक और भालू की मौत हो गई। पहली बार भालू कन्हैया की मौत को निमोनिया बता दिया गया। दूसरे भालू की 10 मार्च को मौत हुई तब सांस लेने में तकलीफ की बीमारी को कारण बताया गया। पर, इसके बाद जब मादा भालू कविता की तबियत बिगड़ने लगी तो अधिकारियों के कान खड़े हुए और उन्होंने देश के दूसरे चिड़ियाघरों में काम करने वाले विशेषज्ञों से संपर्क साधा। आगरा में एक साथ नौ भालुओं की मौत हो गई थी। वहां के विशेषज्ञों ने बताया कि यह इंफेक्सेस केनान हैपेटाईटिस (आईसीएच) हो सकता है। तब भालुओं को निकालकर अलग-अलग केज में रखा गया। पर्यटकों को भी उनके पास जाने से रोक दिया गया। पर अब तक देर हो चुकी थी और कविता का स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। शुक्रवार की सुबह उसकी मौत होने की खबर को कानन पेंडारी के अधिकारी शाम तक छिपाते रहे। जब कुछ कर्मचारियों के माध्यम से जानकारी बाहर आई तब उन्होंने स्वीकार किया कि हैपेटाइटिस इंफेक्शन से भालुओं की मौत हुई है। वह मौत के तीन दिन पहले से ही खाना बंद कर चुकी थी और उसे सांस लेने में दिक्कत जा रही थी। बीते 45 दिनों के भीतर इन तीन भालुओं के अलावा एक गर्भवती हिप्पोपोटामस सजनी और अचानकमार से रेस्क्यू कर लाई गई घायल बाघिन रजनी की भी मौत हो चुकी है।
कानन पेंडारी के प्रबंधकों का दावा है कि इस तरह का हैपेटाइटिस इंफेक्शन केवल भालुओं में फैलता है। दूसरे जानवरों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। जू में बचे 8 भालुओं के स्वास्थ्य व हलचल की नियमित निगरानी की जा रही है। ज्ञात हो कि जू में 640 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीव हैं।


