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मड़वा पावर प्लांट उपद्रव में एक से अधिक एफआईआर दर्ज करने को चुनौती
23-Mar-2022 6:15 PM
मड़वा पावर प्लांट उपद्रव में एक से अधिक एफआईआर दर्ज करने को चुनौती

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से तीन सप्ताह में मांगा जवाब

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 23 मार्च।
जांजगीर-चांपा जिले के मड़वा स्थित पॉवर प्लांट में हुए उपद्रव को लेकर पांच अलग-अलग एफआईआर दर्ज करने को हाईकोर्ट ने गलत माना है। राज्य शासन से तीन सप्ताह के भीतर इस बारे में जवाब दाखिल करने कहा है।

मड़वा स्थित पावर प्लांट के लिये स्थापित करीब 500 ग्रामीणों ने दिसंबर माह में कचहरी चौक से आंदोलन शुरू किया था। बाद में एक जनवरी को उन्होंने मड़वा प्लांट में प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों के साथ 2 जनवरी को विद्युत वितरण कंपनी के अधिकारियों के साथ पहले दौर की बातचीत हुई, जिसमें कोई सुलह नहीं हो सकी। इसके बाद दूसरे दौर की बात के लिये इसी दिन दोपहर में अधिकारियों का एक दल प्लांट के भीतर गया। इस दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ गई। आंदोलनकारियों के बीच शामिल उपद्रव करने वालों ने गाड़ियों में आगजनी और तोड़फोड़ की गई। पथराव भी हुआ। घटना में करीब दो दर्जन पुलिस जवानों को चोट आई। इसके अलावा करीब 10 ग्रामीण भी घायल हुए। स्थिति को काबू में करने के लिये रायगढ़, कोरबा और बिलासपुर जिले से पुलिस फोर्स भेजनी पड़ी।

पुलिस ने इस मामले में 500 लोगों के खिलाफ पांच अलग-अलग एफआईआर दर्ज की। 20 आरोपी घटना के दिन ही गिरफ्तार कर लिये गए थे। अब तक 80 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है, जिनमें से किसी को जमानत नहीं मिली है।

ग्रामीणों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अधिवक्ता सुमित सिंह ने एक ही मामले में पांच एफआईआर दर्ज करने को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यह याचिकाकर्ताओं को 5 बार थाने व कोर्ट में बुलाकर परेशान करने के लिये किया गया है। एक ही मामले में 5 एफआईआर दर्ज करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट में जस्टिस गौतम भादुड़ी की बेंच ने इस दलील को माना है कि इस मामले में 5 एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिये। राज्य शासन को कोर्ट ने नोटिस जारी कर 3 सप्ताह में जवाब दाखिल करने कहा कि 5 एफआईआर किस आधार पर दर्ज की गई।

ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ विद्युत उत्पादन कंपनी ने मड़वा, तेंदूभाठा ग्रामीणों से 2008 में जमीन अधिग्रहण शुरू किया था। इसके करीब 8 साल बाद यहां से एक हजार मेगावाट का बिजली उत्पादन शुरू किया गया। विस्थापित ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकांश प्रभावितों को वादे के मुताबिक नौकरी नहीं दी गई। कुछ संविदा कर्मचारी भर्ती किये गये, जिन्हें अन्य संयंत्रों में नियम विरुद्ध तबादला कर दिया गया।


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