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जल से है कल
विश्व जल दिवस पर विशेष...
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 22 मार्च। आज विश्व जल दिवस है। किसान जल को बचाने के लिए अब नए तकनिक का सहारा ले रहे है। बर्फ की चादर जैसा दिखने वाला यह खेत पॉलीथिन से चमक रहा है। दरअसल, प्रदेश के अधिकांश जिले जल अभावग्रस्त है। ज्यादा पानी की सोखने वाली फसल न लगाने की अपील की जा रही है। ऐसे में किसानों ने पानी की बर्बादी नहीं करने का संदेश दिया है। पानी की एक-एक का सदुपयोग करने किसानों ने इजराइल की मल्चिंग पद्धति से खेती शुरू कर दी है। महासमुंद जिले में 30 हजार हेक्टेयर में सब्जी की खेती हो रही है, जिसमें 10 हजार हेक्टेयर में किसान इस पद्धति को अपनाए हैं। इस तरह के प्रयोगों ने 25 फीसदी रकबे में सब्जी की खेती शुरू कराई है।
यह है मल्चिंग सिंचाई पद्धति
कृषि वैज्ञानिक ओपी चंद्राकर ने बताया कि मल्चिंग सिंचाई सिस्टम में 30 माइक्रॉन मोटाई का प्लॉस्टिक कवर प्रत्येक पौधों पर चढ़ाया जाता है। यह कवर ऊपर से चांदी सा सुनहरे एवं नीचे से काले रंग का रहता है। कवर के नीचे ड्रिप से पानी पहुंचाया जाता है।
टमाटर और करेला में बचाया 5 लीटर पानी
तुसदा के किसान राजेश साहू ने बताया कि करेला और टमाटर की फसल की सिंचाई के लिए गर्मी में प्रति पौधा करेले में 10 लीटर और टमाटर में 15 लीटर पानी लगता था। मल्चिंग सिंचाई पद्धति से करेले में 4 और टमाटर में 10 लीटर पानी से भी काम चल जाता है। फसल भी अच्छी रहने के साथ उत्पादन भी ज्यादा होता है। इसमें पांच लीटर पानी प्रति पौधों में बचत होती है।
एक फसल में लागत से दोगुना लाभ
किसान रमेश निर्मलकर, धमेंद्र प्रधान ने बताया कि मल्चिंग पद्धति में पौधों में नमी बनी रहती है। पानी का वाष्पीकरण भी नहीं होता। पौधे को मिलने वाली नमी से उसका पोषण होता है। खरपतवार भी नहीं लगती। इसकी लागत 35 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर आती है। एक फसल में 70 हजार से ऊपर का लाभ मिल जाता है।


