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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 22 मार्च। हाईकोर्ट ने खैरागढ़ की एक महिला के विरुद्ध परिवार न्यायालय में पारित विवाह विच्छेद की डिक्री को यथावत रखा है और कहा है कि पति-पत्नी के बीच अब संबंधों में सुधार की संभावना नहीं है।
सन 2003 में खैरागढ़ के बीएस मेश्राम का विवाह याचिकाकर्ता महिला से हुआ था। शादी के बाद उसने सास-ससुर के साथ रहने से मना किया। तब पति ने किराए का एक अलग मकान ले लिया। अपनी पत्नी के साथ अलग रहने लगा। इस बीच उनके 2 बच्चे भी हुए। पर बच्चों का ध्यान देने में घरेलू काम और खाना बनाने में सहयोग करने में वह मना करने लगी। इस बीच पति ने अपना एक अलग मकान खुद का बना लिया। उसने अपनी पत्नी को नए मकान में साथ चलकर रहने के लिए कहा। पत्नी इसके लिए तैयार नहीं हुई। नये मकान में दोनों बच्चे पिता के पास रहने लगे। पर पत्नी ने किराये का मकान नहीं छोड़ा। इस बीच पति ने कहा कि यदि साथ नहीं रहना है तो हम तलाक ले लेते हैं। तब, पत्नी ने उसे शारीरिक, मानसिक प्रताडऩा और चरित्र के मामले में फंसाने की धमकी दी। पति ने राजनांदगांव की फैमिली कोर्ट में आवेदन लगाकर विवाह विच्छेद की मांग की। फैमिली कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर दोनों के बीच तलाक की डिक्री को मंजूरी दे दी।
इस आदेश के विरुद्ध महिला ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस दीपक कुमार तिवारी की डबल बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई।
कोर्ट ने माना कि दोनों के बीच लंबे समय से अलगाव है और महिला अपने पति और बच्चों के साथ नहीं रहना चाहती है। इसलिए परिवार न्यायालय द्वारा पारित आदेश सही है।


