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राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट
बिलासपुर, 24 फरवरी (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। मेसर्स प्राइम इस्पात लिमिटेड के निदेशक रिटायर्ड आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के भाई पवन अग्रवाल और अशोक अग्रवाल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा है कि यह एक संगठित आर्थिक अपराध है जिसमें राहत देने का कोई कारण दिखाई नहीं देता है।
मालूम हो कि प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लांड्रिंग एक्ट 2002 के अंतर्गत इन दोनों के खिलाफ भी अपराध दर्ज किया है। यह कार्रवाई एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत एफआईआर दर्ज करने के बाद की गई।
अभियोजन के अनुसार यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से पंडरी और रामसागरपारा ब्रांच में 446 फर्जी बैंक खाते खोले गए जो खरोरा और ग्रामीणों के नाम पर थे। उन्हें खातों के बारे में पता नहीं था। इस खातों को खुलवाने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील अग्रवाल के खिलाफ 420 468 और 471 के तहत अपराध दर्ज किया गया। चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील अग्रवाल आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के अलावा मैसर्स प्राइम इस्पात लिमिटेड के भी सीए थे। प्राइम इस्पात लिमिटेड आवेदक आईएएस अग्रवाल के भाइयों पवन और अशोक अग्रवाल की है। फर्जी खातों में करीब 39 करोड़ 65 लाख रुपए जमा कराए गए। इस राशि को कोलकाता की शैल कंपनियों में जमा किया गया। इन कंपनियों की रकम बाद में मैसेज प्राइम इस्पात लिमिटेड को के खाते में ट्रांसफर कर दी गई।
पवन अग्रवाल और अशोक अग्रवाल ने प्रवर्तन निदेशालय के द्वारा धन शोधन अधिनियम की धारा 3 व 4 के अंतर्गत दर्ज मुकदमे में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए धारा 50 के अंतर्गत अग्रिम जमानत के लिए पहले विशेष न्यायालय में आवेदन लगाया था जो खारिज कर दी गई थी। इसके बाद हाईकोर्ट में अपील की गई।
आवेदकों की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि जब ईडी की विशेष अदालत में केस फाइल किया गया तब केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील अग्रवाल के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया था। उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करने के बाद आवेदकों पवन और अशोक अग्रवाल के खिलाफ को विशेष आरोप नहीं पाया गया था। इसके अलावा ईडी की जांच से स्पष्ट है कि किसी भी बैंक खाते को खोलने में और शैल कंपनियों को पैसा जमा कराने में इन दोनों का कोई हाथ नहीं है। जांच एजेंसियों ने जब भी इन दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया है, वे उपलब्ध हुए हैं और आगे भी उपस्थित होंगे। जो दस्तावेज मांगे गए वे दिए गए हैं। एजेंसी ने केस भी कोर्ट में पेश कर दिया है। आवेदकों के भागने की आशंका नहीं है। ऐसी स्थिति में दोनों को सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत मिलनी चाहिए। धन शोधन अधिनियम 2002 की धारा 4 के अंतर्गत इन दोनों आवेदकों को 7 वर्ष से अधिक सजा नहीं हो सकती। इसलिए भी आवेदक जमानत के हकदार हैं। पहले भी ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का लाभ दिया गया है।
प्रवर्तन निदेशालय की ओर से अधिवक्ता ने कहा कि जिन लोगों को पहले अग्रिम जमानत दी गई है, उनका मामला अलग स्तर का है। इस मामले में 446 बैंक खाते खोल कर 13 शैल कंपनियों में राशि ट्रांसफर की गई, फिर उस राशि का निवेश प्राइम इस्पात लिमिटेड में किया गया, जिसके आवेदक डायरेक्टर हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील अग्रवाल की मदद से किया गया बाबूलाल अग्रवाल के भाइयों का मनी लॉंड्रिंग केस बहुत व्यापक है। इसमें संपत्ति को छिपाना, कब्जा करना अधिग्रहण और उपयोग करना शामिल है। पूछताछ की कार्रवाई के दौरान ईडी पर्याप्त सामग्री एकत्रित की है। सुनील अग्रवाल का बयान भी दर्ज किया गया है जिसमें उन्होंने 446 बैंक खाता खोलने की बात स्वीकार की है।
आवेदकों की ओर से धन शोधन अधिनियम की धारा 45 के अंतर्गत राहत की मांग की थी, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय के अधिवक्ता ने कहा धारा 45 को सुप्रीम कोर्ट ने ताराचंद मामले में पूरी तरह समाप्त कर दिया है। हालांकि इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है लेकिन अब तक यह असंवैधानिक है। 4 जनवरी 2022 को तमिलनाडु हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक आवेदन को वापस किया था।
दोनों पक्षों के तर्को को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि प्राइम इस्पात लिमिटेड के निदेशक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के भाई हैं और जो खाताधारक बताए गए हैं वे ग्रामीण मजदूर, पान दुकान चलाने वाले, कृषक और कई बेरोजगार हैं। बड़ी रकम लगभग 40 करोड़ जमा करने के तुरंत बाद खाते की राशि मुखौटा कंपनियों में निवेश कर दी गई जिसके बदले में सुनील अग्रवाल को करीब 20 लाख रुपए कमीशन भी प्राप्त हुआ। प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि यह संगठित आर्थिक अपराध है। कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि धारा 45 को रद्द कर दिया है क्योंकि यह अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। वहीं धारा 45 (1) जमानत देने की अवसर देता है। पर यह ऐसे मामलों में जहां अभियुक्त की आयु 16 वर्ष से कम हो, महिला, बीमार या दुर्बल हो। ऐसा भी लाभ अभियुक्त को एक करोड़ रुपए से कम की धनराशि के मामले में मिल सकता है। प्रस्तुत मामले में अपराध की जड़ें बहुत गहरी हैं। जानबूझकर परिणामों का परवाह किए बगैर व्यक्तिगत लाभ को नजर में रखते हुए किया गया अपराध है।


