कोण्डागांव

700 बरस पुरानी परंपरा के साथ फागुन मड़ई शुरू
24-Feb-2026 11:25 PM
700 बरस पुरानी परंपरा के साथ फागुन मड़ई शुरू

22 पाली के देवी-देवताओं की देव परिक्रमा से भक्ति और उत्सव का संगम

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

कोण्डागांव, 24 फरवरी। जिला मुख्यालय में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला ऐतिहासिक फागुन मड़ई 24 फरवरी से देव परिक्रमा के साथ विधिवत प्रारंभ हो गया है। यह भव्य पारंपरिक मेला पूरे एक सप्ताह तक संचालित होगा, जिसमें आदिवासी संस्कृति, आस्था और आधुनिक उत्सव का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

मेले की शुरुआत सोमवार और मंगलवार की मध्य रात्रि में दंतेश्वरी मावली माता मंदिर तथा भंगाराम बाबा मंदिर में आयोजित निशा जत्रा से हुई। पारंपरिक पूजा-अर्चना और स्थानीय धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मेले का आध्यात्मिक वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा।

मंगलवार सुबह मावली माता दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में 22 पाली के देवी-देवताओं की भव्य देव परिक्रमा के साथ मेले का औपचारिक शुभारंभ हुआ। परंपरा के अनुसार कोण्डागांव नगर क्षेत्र के 10 पाली तथा पलारी क्षेत्र के 12 पाली के देवी-देवता अपने-अपने वाहन, सवार और भक्तों की टोली के साथ मेला स्थल पहुंचे।

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार यह मेला लगभग 700 वर्ष पुरानी परंपरा से जुड़ा हुआ है। हर वर्ष सभी 22 पाली के देवी-देवता मावली माता दंतेश्वरी प्रांगण, बाजारपारा में एकत्र होकर जत्रा और परिक्रमा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भंगाराम देव, कुंवर बाबा देव, रेवा गुडिऩ माता, काली कंकालीन माता और हिंगलाजिन माता इस आयोजन के प्रमुख देव रूपों में शामिल माने जाते हैं।

निशा जत्रा के दौरान भंगाराम बाबा मंदिर का मुख्य द्वार वर्ष में एक बार विशेष रूप से खोला जाता है, जहां पारंपरिक पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके बाद सुबह होते-होते क्षेत्र की 22 पाली से देवी-देवता लाठ, अंग और डोली में सवार होकर मेला परिसर पहुंचते हैं। छोटा परिक्रमा और बड़ा परिक्रमा पूर्ण होने के पश्चात मेले का विधिवत शुभारंभ घोषित किया जाता है।

मेले की भव्यता और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने मेला प्रारंभ दिवस पर जिले में अवकाश घोषित किया है। साथ ही जिला मुख्यालय में यातायात दबाव को नियंत्रित करने के लिए सभी बड़े वाहनों के प्रवेश पर आगामी आदेश तक प्रतिबंध लगा दिया गया है।

फागुन मड़ई के साथ कोण्डागांव एक बार फिर परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक उत्सव के रंग में सराबोर हो उठा है, जहां देव परिक्रमा से लेकर सामुदायिक मेल-मिलाप तक सदियों पुरानी लोक परंपराएं जीवंत रूप में दिखाई दे रही हैं।


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