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दो साल में चौथी बार हो रहे चुनाव में इस्राएल के 66 लाख मतदाता 24वीं कनेसेट यानि नई संसद के लिए वोट डाल रहे हैं. इसे कई सालों से सत्ता पर काबिज रहे बेन्यामिन नेतन्याहू पर जनता का रेफरेंडम माना जा रहा है.
डॉयचे वैले पर ऋतिका पाण्डेय की रिपोर्ट
मई 2020 में इस्राएल में नेतन्याहू के नेतृत्व में बनी नेशनल युनिटी की सरकार दिसंबर आते आते टूट गई. अपने विरोधी, फिर सहयोगी और फिर विरोधी बने बेनी गांत्स के साथ आंतरिक झगड़ों के चलते किसी तरह यह सरकार सात महीने चल पाई. इनके बीच सत्ता को आपस में बांटने का समझौता था, जिसके हिसाब से नवंबर 2021 में गांत्स के प्रधानमंत्री बनने का मौका आता. लेकिन जब एक तय समय सीमा के भीतर इनकी नई सरकार बजट पास करने में नाकामयाब रही, तो अपने आप ही संसद भंग हो गई. नतीजतन दो साल में चौथी बार 23 मार्च 2021 को एक बार फिर संसदीय चुनाव कराने पड़े.
2009 में इस्राएल के प्रधानमंत्री बने नेतन्याहू इस बार साफ जीत हासिल करना चाहते हैं ताकि एक पूरी तरह दक्षिणपंथी सरकार बना सकें. उन्हें देश के पारंपरिक अति-रुढ़िवादियों और कट्टर राष्ट्रवादियों का पूरा समर्थन भी हासिल है. लंबे समय से सत्ता पर काबिज रहे 'बीबी' नेतन्याहू ने देश में कोविड के खिलाफ टीकाकरण अभियान को सफलता से कराने का लगभग सारा श्रेय खुद को ही दिया है. खुद को "वैक्सीनेटर इन चीफ" के रूप में पेश करने वाले नेतन्याहू ने इस चुनाव में बड़ी जीत की उम्मीदें लगाई हैं.
उनके सामने खड़ा है विपक्षी पार्टियों का एक ढीला ढाला फ्रंट. इसमें संसद में विपक्षी खेमे के नेता से लेकर सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट तक कई नेता शामिल हैं. ये सब नेतन्याहू के खिलाफ एकजुट हुए हैं लेकिन इनके आपस में मिलकर सरकार बनाने और चला पाने की संभावना काफी कम है.
71 वर्षीय नेतन्याहू के खिलाफ धोखाधड़ी और घूसखोरी के कुछ आरोप तय हुए हैं लेकिन उन्होंने इसकी सुनवाई के दौरान भी पद नहीं छोड़ा. 2019 के अंत में उन पर आरोप लगे थे और युनिटी गवर्नमेंट की शपथ लेने के कुछ ही समय बाद उन आरोपों की जांच भी शुरु हो गई थी. नेतन्याहू ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया और खुद को पुलिस, अभियोजन पक्ष और मीडिया का शिकार बताया. पिछले नौ महीने से हर हफ्ते प्रदर्शनकारी येरुशलम में उनके आवास के बाहर उनसे पद छोड़ने की मांग को लेकर प्रदर्शन करते आए हैं.
भले ही कुछ मतदाताओं के लिए इन चुनावों में अर्थव्यवस्था, फलस्तीन के साथ विवाद, अमेरिका से संबंध या धर्म और राज्य का मुद्दा हो, लेकिन बीते एक साल में कोरोना महामारी को लेकर नेतन्याहू के शासन और प्रबंधन का मुद्दा इन सब पर भारी है. कुल 120 सीटों वाली कनेसेट के लिए 38 राजनीतिक दल चुनावी मैदान में हैं. चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि इनमें से कुछ मुट्ठी भर दल ही 3.25 प्रतिशत वोटों की सीमा पार कर संसद में न्यूनतम चार सीटें पाने की योग्यता हासिल कर पाएंगे.
दो साल के भीतर हुए पिछले तीन चुनावों में 70 फीसदी के आसपास मतदान हुआ है. लेकिन बार बार होने वाले चुनावों के चलते थक चुके मतदाताओं के कारण इस बार यह संख्या थोड़ी कम रहने की आशंका जताई जा रही है. इस्राएल में कभी भी किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला है. यही वजह है कि हर बार कुछ छोटी पार्टियां मिलकर सरकार का गठन करती हैं. इन चुनावों का नतीजा आने में एक हफ्ते का समय लग सकता है. फिलहाल नेतन्याहू-समर्थक और विरोधी खेमे बराबरी पर टक्कर देते नजर आ रहे हैं. अगर इन चुनावों में भी सरकार एक स्थाई गठबंधन बनाने में नाकामयाब रहती है, तो दो साल से खिंचा चला आ रहा राजनीतिक संकट पांचवे चुनाव की ओर भी बढ़ सकता है.
आरपी/आईबी (एपी, एएफपी)


