अंतरराष्ट्रीय
-जर्मी बोवेन
वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने पहले से कहीं ज़्यादा ताक़त के साथ यह दर्शाया है कि वह अपनी इच्छाशक्ति पर कितना भरोसा करते हैं.
ज़ाहिर है कि इसके पीछे है अमेरिकी सैन्य बल की अथाह ताक़त है.
उनके आदेश पर अमेरिका ने मादुरो को क़ैद कर दिया है. अमेरिका अब ख़ुद वेनेज़ुएला को 'चलाएगा'.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह घोषणा फ़्लोरिडा में अपने क्लब और निवास मार-ए-लागो में एक असाधारण प्रेस कॉन्फ़्रेंस में की, जिसका असर दुनियाभर में अमेरिकी विदेश नीति पर पड़ सकता है.
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वेनेज़ुएला की ज़िम्मेदारी तब तक संभालेगा "जब तक ऐसा समय न जाए कि हम सत्ता हस्तांतरण सुरक्षित, उचित और न्यायसम्मत ढंग से कर पाएं."
ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ से बात की थी.
रोड्रिगेज़ ने उन्हें कहा, "जो आपको चाहिए हम वह करने के लिए तैयार हैं. मुझे लगता है कि उन्होंने काफ़ी शालीनता से बात की. दरअसल उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है."
ट्रंप ने ज़्यादा जानकारी नहीं दी. उन्होंने बस इतना कहा, "अगर ज़रूरत पड़ी तो हमें सैनिक भेजने में कोई झिझक नहीं है."
लेकिन क्या वह सचमुच मानते हैं कि वेनेज़ुएला को रिमोट कंट्रोल से चलाया जा सकता है?
ऐसा लगता है कि ट्रंप को पूरा यक़ीन है. तथ्य बताते हैं कि यह काम आसान नहीं होगा.
प्रतिष्ठित थिंक टैंक, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने, अक्तूबर में चेतावनी दी थी कि मादुरो का हटना वेनेज़ुएला में हिंसा और अस्थिरता ला सकता है.
उसी महीने न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया था कि ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दौर में रक्षा और कूटनीतिक अधिकारियों ने उस उस स्थिति को समझने की कोशिश की थी कि अगर मादुरो हटते हैं तो क्या होगा. उनका निष्कर्ष था कि हथियारबंद गुट सत्ता के लिए भिड़ेंगे और हिंसक अराजकता फैल सकती है.
निकोलस मादुरो को हटाना और जेल में डालना अमेरिकी सैन्य शक्ति का असाधारण प्रदर्शन है.
अमेरिका ने युद्धपोतों का एक विशाल बेड़ा तैयार किया और बिना एक भी अमेरिकी जान गंवाए अपना लक्ष्य हासिल कर लिया.
मादुरो ने वेनेज़ुएला की जनता की इच्छा को नज़रअंदाज़ किया था, उन्होंने अपनी चुनावी हार को दरकिनार कर दिया था. इसमें कोई शक नहीं कि उनको हटाए जाने का देश के बहुत से नागरिक स्वागत करेंगे.
लेकिन अमेरिकी कार्रवाई के असर वेनेज़ुएला की सीमाओं से कहीं आगे तक गूंजेंगे. मार-ए-लागो में हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस का माहौल विजय उत्सव से भरा था, जहाँ पेशेवर अमेरिकी बलों के अंजाम दिए गए अभियान का जश्न मनाया गया.
सैन्य अभियान तो बस पहला चरण है. पिछले 30 सालों में बल प्रयोग से सत्ता परिवर्तन कराने का अमेरिकी रिकॉर्ड बेहद ख़राब रहा है. असल मायने में राजनीतिक फ़ॉलो-अप ही तय करता है कि प्रक्रिया सफल होगी या विफल.
2003 में अमेरिकी हमले के बाद इराक़ में रक्तरंजित तबाही आई. अफ़ग़ानिस्तान में दो दशक और अरबों डॉलर की राष्ट्र-निर्माण की कोशिशें 2021 में अमेरिका के लौटने के चंद दिनों में ही ढह गईं. इनमें से कोई भी देश अमेरिका के निकट क्षेत्र में नहीं था.
लेकिन लैटिन अमेरिका में पहले किए गए हस्तक्षेपों के नतीजे और आगे आने वाले संभावित ख़तरे भी ज़्यादा उम्मीद नहीं जगाते.
ट्रंप का 'मोनरो डॉक्ट्रिन'
ट्रंप ने एक नया नाम पेश किया, 'मोनरो डॉक्ट्रिन'. यह 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मोनरो की उस चेतावनी का नया रूप था, जिसमें अन्य शक्तियों को अमेरिका के पश्चिमी दुनिया के प्रभाव क्षेत्र में दख़ल न देने को कहा गया था.
मार-ए-लागो में ट्रंप ने कहा, "मोनरो डॉक्ट्रिन बड़ी बात है, लेकिन हमने उसे बहुत पीछे छोड़ दिया है. हमारी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत पश्चिमी दुनिया में अमेरिकी प्रभुत्व पर अब कभी सवाल नहीं उठेगा."
उन्होंने यह भी कहा कि कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो को 'अपना ध्यान रखना होगा.' बाद में उन्होंने फ़ॉक्स न्यूज़ से कहा कि "मेक्सिको के साथ कुछ करना ही पड़ेगा."
क्यूबा भी निस्संदेह अमेरिका के एजेंडे में है. उसे मार्को रुबियो आगे बढ़ा रहे हैं, जिनके माता-पिता क्यूबाई-अमेरिकी हैं. अमेरिका का लैटिन अमेरिका में सशस्त्र हस्तक्षेप का लंबा इतिहास रहा है.
1994 में मैं हैती में था, जब राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने वहां सत्ता परिवर्तन करने के लिए 25,000 सैनिक और दो एयरक्राफ़्ट कैरियर भेजे थे.
तब हैती की सरकार बिना एक भी गोली चले ढह गई थी. लेकिन बेहतर भविष्य लाने के बजाय, उसके बाद के 30 साल हैती की जनता बदहाल ही रही. आज हैती एक नाकाम देश है, जिस पर हथियारबंद गिरोहों का क़ब्ज़ा है.
डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला को 'महान' बनाने की बात की, लेकिन लोकतंत्र की नहीं. उन्होंने 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो के देश का नेतृत्व करने के विचार को ख़ारिज कर दिया.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि उनके लिए नेता बनना बहुत कठिन होगा, उनके पास समर्थन नहीं है. उनके पास सम्मान नहीं है."
ट्रंप ने एडमुंडो गोंज़ालेज़ का ज़िक्र नहीं किया, जिन्हें बहुत से वेनेज़ुएलावासी 2024 के चुनावों का असली विजेता मानते हैं. इसके बजाय, अमेरिका फ़िलहाल मादुरो की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ का समर्थन कर रहा है.
हालांकि कोई आंतरिक मिलीभगत ज़रूर रही होगी जिसने अमेरिकी सेना को वह अंदरूनी जानकारी दी, जिसकी मदद से मादुरो को हटाया जा सका. लेकिन उनके पूर्ववर्ती ह्यूगो शावेज़ द्वारा बनाया गया शासन तंत्र अब भी जस का तस दिखाई देता है.
ट्रंप की नज़र प्राकृतिक संसाधनों पर
अमेरिकी हमले का विरोध न कर पाने से जनरलों को चाहे अपमान महसूस हो, फिर भी वेनेज़ुएला की सशस्त्र सेनाओं के अमेरिका की योजनाओं को मान लेने की संभावना कम है.
सैन्य नेतृत्व और हुक़ूमत के नागरिक समर्थक भ्रष्टाचार के नेटवर्कों से मालामाल हुए हैं, जिन्हें वे खोना नहीं चाहेंगे.
इस सरकार ने नागरिक मिलिशियाओं को हथियार दिए हैं और वेनेज़ुएला में अन्य सशस्त्र समूह भी मौजूद हैं.
इनमें अपराधी नेटवर्क शामिल हैं और कोलंबियाई गुरिल्ले भी, जो शरण देने के बदले मादुरो हुक़ूमत का समर्थन करते थे.
वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप ट्रंप की विश्वदृष्टि को साफ़ तौर पर सामने लाता है.
वह यह छिपाते नहीं कि उनकी नज़र अन्य देशों की खनिज संपदा पर है.
वह पहले ही सैन्य सहायता के बदले यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों से लाभ लेने की कोशिश कर चुके हैं.
ट्रंप वेनेज़ुएला के विशाल खनिज भंडार पर नियंत्रण करने की अपनी इच्छा छुपाते नहीं हैं. उनका मानना है कि जब तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ था तो अमेरिकी तेल कंपनियों को 'लूटा' गया था.
उन्होंने कहा, "हम ज़मीन से अपार संपदा निकालने जा रहे हैं और यह संपदा वेनेज़ुएला के लोगों को मिलेगी, उन लोगों को भी जो पहले वेनेज़ुएला में थे लेकिन अब बाहर हैं और यह संयुक्त राज्य अमेरिका को भी मिलेगी, भरपाई के रूप में."
इससे ग्रीनलैंड और डेनमार्क में यह डर और गहरा होगा कि ट्रंप की नज़र दक्षिण ही नहीं, उत्तर की ओर भी घूम सकती है.
अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने में शामिल करने की इच्छा छोड़ी नहीं है. आर्कटिक में उसकी सामरिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों के कारण ट्रंप की नज़र बनी हुई है. ग्लोबल वार्मिंग के चलते बर्फ़ पिघलने के साथ इन तक पहुंचना आसान हो रहा है.
दुनिया भर में बढ़ सकती है अराजकता
मादुरो के ख़िलाफ़ ऑपरेशन ने इस विचार को भी ज़ोरदार धक्का पहुंचाया है कि दुनिया को चलाने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि सहमति से बने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया जाए.
वैसे यह विचार ट्रंप के सत्ता में आने से पहले ही कमज़ोर हो चुका था. लेकिन उन्होंने अमेरिका में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, बार-बार दिखाया है कि वह उन क़ानूनों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं जो उन्हें पसंद नहीं.
प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर समेत यूरोपीय सहयोगी, जो उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहते, इस दुविधा में हैं कि कैसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून के समर्थन की बात कहें लेकिन यह भी न मानें कि मादुरो ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन है.
अमेरिका का यह तर्क कि उसकी सेना बस एक 'ड्रग लॉर्ड' को गिरफ़्तार करने के वॉरंट को लागू करने में मदद कर रही थी, बेहद कमजोर है. ख़ासकर जब ट्रंप ख़ुद कह चुके हैं कि अब अमेरिका वेनेज़ुएला और उसके तेल उद्योग को नियंत्रित करेगा.
मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ़्तारी से कुछ ही घंटे पहले, उन्होंने काराकस में अपने महल में चीनी राजनयिकों से मुलाक़ात की थी.
चीन ने अमेरिकी कार्रवाई की निंदा की. उसने कहा, "अमेरिका की आक्रमणकारी हरकतें अंतरराष्ट्रीय क़ानून और वेनेज़ुएला की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन हैं और लैटिन अमेरिका के साथ ही कैरेबियाई क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को ख़तरे में डालते हैं."
चीन ने यह भी कहा कि अमेरिका को "दूसरे देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का उल्लंघन बंद करना चाहिए."
फिर भी, चीन अमेरिकी कार्रवाई को एक मिसाल के रूप में देख सकता है. वह ताइवान को एक अलग हो रखा प्रांत मानता है और उसे बीजिंग के नियंत्रण में वापस लाना राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित कर चुका है.
वॉशिंगटन में यह चिंता साफ़ है. सीनेट इंटेलिजेंस कमिटी के डेमोक्रेटिक उपाध्यक्ष, सीनेटर मार्क वॉर्नर ने बयान जारी किया कि चीन के नेता और अन्य देश इसे ध्यान से देख रहे होंगे.
उन्होंने कहा, "अगर अमेरिका यह अधिकार जताता है कि वह सैन्य बल का इस्तेमाल करके उन विदेशी नेताओं को गिरफ़्तार कर सकता है, जिन्हें वह अपराधी मानता है, तो चीन किसलिए रुकेगा कि वह ताइवान के नेतृत्व को लेकर यही दावा न करे?"
''व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन के राष्ट्रपति को अगवा करने के लिए क्या यही तर्क पेश नहीं करेंगे? इससे वैश्विक अराजकता ही बढ़ेगी और इसका फ़ायदा सबसे पहले अधिनायकवादी शासन उठाएंगे."
डोनाल्ड ट्रंप को लगता है कि नियम वही बनाते हैं और उनके नेतृत्व में जो अमेरिका को हासिल होता है, दूसरे उम्मीद नहीं कर सकते कि वह विशेषाधिकार उन्हें भी मिलेंगे.
लेकिन ताक़त की दुनिया ऐसे नहीं चलती.
2026 की शुरुआत में उनके क़दम आने वाले 12 महीनों की वैश्विक उथल-पुथल की ओर इशारा करते हैं. (bbc.com/hindi)


