गरियाबंद
सीता हरण, शबरी प्रसंग व सुग्रीव मित्रता की कथा ने श्रोताओं को किया भावविभोर
छत्तीसगढ़' संवाददाता
नवापारा-राजिम, 29 दिसंबर। सालासर सुंदरकांड हनुमान चालीसा जनकल्याण समिति द्वारा आयोजित श्रीराम कथा के अष्टम दिवस में अयोध्या से पधारे पूज्य प्रशांत जी महाराज ने भरत चरित्र का ऐसा भावपूर्ण वर्णन किया कि वे स्वयं भावुक होकर रो पड़े। भरत का भगवान श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम सुनकर पंडाल में उपस्थित श्रोता भी अश्रुपूरित हो गए।
महाराज श्री ने कथा का आरंभ करते हुए कहा 'एक बार चुनि कुसुम सुहाए, निज कर भूषण राम बनाए। Ó उन्होंने बताया कि भगवान श्रीराम विभिन्न पुष्पों से आभूषण बनाकर स्फटिक शिला पर बैठकर माता जानकी को अपने हाथों से पहनाते हैं। उसी समय इंद्रपुत्र जयंत वहां से गुजरता है और भगवान को माया में लिप्त समझकर संशय करता है। वह कौए का रूप धारण कर माता जानकी के चरणों में चोंच मार देता है, जिससे चरणों से रक्त बहने लगता है। यह देख प्रभु श्रीराम सींक का बाण छोड़ते हैं, जो जयंत के पीछे-पीछे तीनों लोकों में उसका पीछा करता है।
महाराज ने कहा 'राखि को सकहि राम कर द्रोही। Ó नारद जी के मार्गदर्शन पर जयंत भगवान की शरण में आता है। प्रभु दंड स्वरूप उसकी एक आंख नष्ट कर क्षमा प्रदान करते हैं। इसके पश्चात भगवान यह सोचकर कि अब यहां सभी उन्हें पहचान चुके हैं, ऋषि-मुनियों से विदा लेकर वन की ओर प्रस्थान करते हैं।
भगवान श्रीराम माता जानकी व लक्ष्मण जी के साथ महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचते हैं, जहां अत्रि मुनि और माता अनुसूया उनका आदर-सत्कार करते हैं। माता अनुसूया माता जानकी को पतिधर्म का उपदेश देती हैं, जिसे सुनकर माता जानकी आनंद से भर जाती हैं। आगे मार्ग में विराध राक्षस का उद्धार कर भगवान पंचवटी पहुंचते हैं और वहां निवास करते हैं।
कुछ समय बाद शूर्पणखा का आगमन होता है। विवाह प्रस्ताव अस्वीकार होने पर वह विकराल रूप धारण कर माता जानकी पर झपटती है। तब लक्ष्मण जी शूर्पणखा की नाक-कान काट देते हैं। रोती-बिलखती शूर्पणखा रावण के पास पहुंचती है, जिसके बाद रावण मारीच से स्वर्ण मृग बनने का आग्रह करता है। महाराज श्री ने बताया कि स्वर्ण मृग ही माया का प्रतीक है, क्योंकि सोने में ही कलियुग का वास है। मारीच के स्वर्ण मृग बनने से सीता हरण का प्रसंग घटित होता है। कुटिया लौटने पर माता जानकी को न पाकर भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जी वन-वन भटकते हुए उन्हें पुकारते हैं। मार्ग में जटायु जी मिलते हैं, जो रावण द्वारा सीता हरण की पूरी कथा बताते हैं।
आगे ऋष्यमूक पर्वत पर भगवान की सुग्रीव से मित्रता होती है। सुग्रीव और श्रीराम एक-दूसरे को अपना-अपना दुख बताते हैं। प्रभु श्रीराम बाली का वध कर अंगद को शरण देते हैं। महाराज श्री ने कहा कि जीवन में अपनी संतान को भगवान की शरण में अर्पित कर जाना ही सबसे बड़ा धर्म है। इस भावपूर्ण कथा को सुनकर समस्त श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।



