संपादकीय
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था, यूनिसेफ, दुनिया भर के बच्चों के भले के लिए बनी है। दुनिया के अविकसित और विकासशील देशों में बच्चों के लिए जरूरी बहुत सारे काम यूनिसेफ की मदद से होते हैं। भारत में भी बहुत से राज्यों में इस संगठन की मदद से राज्य सरकारें कई कार्यक्रम चलाती हैं। उसकी ताजा रिपोर्ट यह बतलाती है कि
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जलवायु खतरे से किस तरह दुनिया के 180 करोड़ बच्चे सूखे का खतरा झेल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन छोटे-बड़े, सभी इंसानों को प्रभावित कर रहा है, पशु-पक्षियों, पेड़ों, और कुदरत के बाकी तमाम पहलुओं को भी। लेकिन बाकी लोगों से परे बच्चे अधिक नाजुक होते हैं, उनकी बढऩे की उम्र में अगर उन पर बुरा असर पड़ता है, तो वे बाकी जिंदगी उससे नहीं उबर पाते। इसलिए उनके बारे में अधिक फिक्र की जरूरत रहती है।
यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि सूखे के खतरे से दुनिया के तीन चौथाई से अधिक बच्चे, 180 करोड़ प्रभावित हैं। दुनिया के आधे बच्चे एक साथ जलवायु के कम से कम तीन-तीन खतरे झेल रहे हैं, यह संख्या 110 करोड़ के करीब है। यह रिपोर्ट बताती है कि सूखा, भयानक गर्मी, और लू, इन तीनों से करीब 30 करोड़ बच्चे प्रभावित हैं। 40 लाख बच्चे ऐसे हैं जो जलवायु से संबंधित 6 अलग-अलग किस्म के खतरे झेल रहे हैं। और दुनिया के तकरीबन हर बच्चे पर जलवायु से जुड़ा हुआ कम से कम एक खतरा तो है ही। भारत के अलग-अलग राज्यों को हम देखते हैं तो बहुत फिक्र की हालत दिखती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, और यूपी के बड़े हिस्सों में बच्चे सूखे और पानी की गंभीर कमी से गंभीर रूप से प्रभावित हैं। उत्तर भारत (खासकर दिल्ली-एनसीआर, यूपी, बिहार) में गर्मी का खतरा बहुत तेजी से बढ़ रहा है, बच्चे स्कूल जाने, खेलने, और बाहर निकलने में असमर्थ हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई जिलों में, खासकर पूर्वी और मध्य भारत में बच्चे एक साथ सूखा, गर्मी, और बाढ़, तीनों का सामना कर रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी आबादी खेती पर टिकी हुई है, और बहुत बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे ही किसान परिवारों के हैं जहां खेती ही मुख्य कमाई है। सूखे का सीधा असर उनकी पढ़ाई-लिखाई, खान-पान, और सेहत पर पड़ रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में ग्रामीण और गरीब बच्चों पर यह असर सबसे अधिक है, जिनके पास साफ पानी, इलाज, पढ़ाई, और सामाजिक सुरक्षा की कमी है।
हम किसी लेख की तरह की यह जानकारी, या कल ही आए हुए ताजा समाचार की जानकारी को विचारों के इस कॉलम में लिखना जरूरी और जायज इसलिए समझ रहे हैं कि हिन्दुस्तान अपने बच्चों के लिए एक बिल्कुल ही बेरहम देश है। बच्चों के लिए इसकी सारी फिक्र हिन्दू समाज में कृष्ण की बाललीलाओं तक सीमित है, या कि रामभक्तों में रामलला तक। असल बच्चों को लेकर लोगों की फिक्र जिम्मेदार परिवारों में तो विरासत छोडऩे की शक्ल में कहीं-कहीं सामने आती है, लेकिन जिनके विरासत में छोडऩे को कुछ नहीं है, ऐसे परिवारों में बच्चों को सरकारी स्कूलों के दोपहर के भोजन पर छोड़ दिया जाता है, और गरीबों में अधिकतर परिवार ऐसे दिखते हैं जहां कमाऊ मुखिया अपने नशे को अधिक जरूरी समझते हैं, और बच्चों के खानपान, पढ़ाई, उनकी बुनियादी जरूरतों की भी उपेक्षा करते हुए अपने में मगन रहते हैं। सरकारों, और राजनीतिक दलों की नजरों में बच्चे वोटर नहीं रहते, इसलिए उनकी जरूरतों की अनदेखी होती ही रहती है। सरकारों के बच्चों से जुड़े हुए विभाग आम सरकारी भ्रष्टाचार के शिकार रहते हैं, और किसी को यह रहम नहीं आता कि इससे छोटे-छोटे बच्चों का हक छिनता है।
देश-प्रदेश की सरकारें बच्चों की अतिरिक्त फिक्र करने की जहमत तो उठाती नहीं, वे पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर भी पांच-पांच साल के कार्यकाल से परे की दीर्घकालीन सोच नहीं रखतीं। फिर अधिकतर प्रदेशों में इन पांच बरसों में भी विधानसभा, लोकसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं वोटर रहते हैं, वोटरों के बच्चे भी नहीं रहते। महिलाओं को भत्ता, बालिग-बेरोजगारों को भत्ता, इसी तरह की बातें चुनावी घोषणापत्र पर हावी रहती हैं। जलवायु और पर्यावरण की बर्बादी धीमी रहती है, देश की जनता चुनावों के दौरान पर्यावरण और प्रदूषण पर कोई सवाल भी नहीं करती, इसलिए भी राजनीतिक दलों को इस बेजुबान विषय की परवाह नहीं रहती। नतीजा यह है कि बीते दशकों में धीरे-धीरे पर्यावरण की बर्बादी से आए जलवायु परिवर्तन ने पूरी दुनिया को इतनी बड़ी, और जानलेवा तबाही की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है, कि यहां से वापिसी भी मुमकिन नहीं लगती है। दुनिया के संपन्न देश इस तबाही के अधिक जिम्मेदार हैं, और तबाही की सबसे बड़ी मार सबसे विपन्न देशों पर हो गई है। रईस देशों के मजे की सजा गरीब देश भुगत रहे हैं। और आज दुनिया के सबसे गैरजिम्मेदार तानाशाह, अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह जलवायु परिवर्तन की रफ्तार घटाने की जिम्मेदारी से हाथ धो लिया है, और उसे एक हरित-झांसा करार दिया है, उससे रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गई है।
दुनिया के लोग इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि अपनी अगली पीढ़ी के लिए जायज और नाजायज तरीकों से दौलत छोडक़र जाने को वे अगली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। वे एक समाज या समुदाय के रूप में सामूहिक जिम्मेदारी पर सोचने की जहमत नहीं उठाते, और उन्हें यह समझ नहीं पड़ता कि उनके वारिस इस धरती से परे किसी दूसरे ग्रह पर तो जाकर रह नहीं सकेंगे, उन्हें रहना तो इसी धरती पर है, यहां के बाशिंदों के पास कोई प्लान-बी नहीं है। इसलिए दौलत चाहे कुछ कम छोड़ें, धरती और समाज बेहतर छोड़ें, यह किसी को समझ पड़ते दिखता नहीं है। और यह आम गैरजिम्मेदारी सिर्फ पर्यावरण को लेकर नहीं है, इंसानियत को लेकर भी है, धार्मिक सद्भाव को लेकर भी है, गरीबी-अमीरी की असमानता को लेकर भी है, और औरत-मर्द के बीच के लैंगिक फासले को लेकर भी है। इंसान किसी तरह समाज, और धरती को बेहतर बनाने के लिए फिक्रमंद नहीं हैं। एक सबसे विकसित देश, स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थुनबर्ग ने जिस तरह जलवायु को एक मुद्दा बनाया था, फिलीस्तीनियों के हक को एक मुद्दा बनाया था, क्या दुनिया के बाकी देशों के नौजवानों के बीच ऐसी किसी और जागरूकता की गुंजाइश है? ऐसे कई सवाल सिर्फ निराशा खड़ी करते हैं, इनमें से किसी का कोई उम्मीदभरा जवाब नहीं आता। यूनिसेफ की जिस रिपोर्ट से विचलित हुए मन से हम यह चर्चा छेड़ रहे हैं, यह आवाज भी अधिकतर लोगों तक नहीं पहुंचेगी। जो लोग आज किसी भी तरह की सत्ता पर काबिज हैं, उन्हें लगता है कि वे और उनके परिवार अपने निजी सुरक्षाचक्र में हमेशा के लिए सुख और सुरक्षा के साथ रहेंगे। ऐसा कोई टापू इस धरती पर है नहीं, लोगों को पूरी धरती को ही बेहतर बनाने की कोशिश करनी होगी, अपने लिए न सही, अपने बच्चों का चेहरा देखकर इस तरफ कुछ करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


