संपादकीय
तस्वीर / ‘छत्तीसगढ़’
आज वॉट्सऐप पर एक जानकारी मिली कि इस साल बाजार में जितने जामुन देखने मिल रहे हैं, उतने पिछले तीन दशक में कभी देखने नहीं मिले थे। इस बात के साथ किसी ने यह लिखा है कि उनकी दादी कहती थीं कि जिस गर्मी में जामुनों का ऐसा ढेर लगता है, उस साल सूखा पड़ता है। इसके साथ-साथ इस संदेश में कई वैज्ञानिक शब्द इस्तेमाल करके यह बताया गया कि किस तरह वनस्पति विज्ञान पौधों की, पेड़ों की इस बहुत अधिक उपज को अधिक से अधिक फल देने की आखिरी कोशिश मानता है, और जब पेड़ों को जमीन के नीचे पानी की एकदम कमी लगती है, या मौसम में बड़े बदलाव के संकेत मिलते हैं, तो पेड़ प्रतिरक्षात्मक अंदाज में चले जाता है, और उसे लगता है कि आगे वो शायद न जी पाए, इसलिए वह अपनी प्रजाति को धरती पर बनाए रखने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा अधिक से अधिक फल, यानी अधिक से अधिक बीज बनाने में लगा देता है। इस संदेश में लिखा गया है कि जामुन का पेड़ इस बरस आत्महत्या नहीं कर रहा है, बल्कि अपना बलिदान देकर अपनी अगली पीढ़ी, यानी बीजों को अधिक से अधिक बढ़ा रहा है। इसलिए जामुन के इस बर्ताव को जलवायु परिवर्तन, और पानी की कमी से जोडक़र देखें। इस बारे में जब वैज्ञानिक तथ्य ढूंढने की कोशिश की गई, तो कुछ हैरतअंगेज बातें पता लगीं।
जामुन को लेकर भेजे जा रहे संदेशों में इसे स्ट्रेस फ्रूटिंग कहा गया है। इसके बारे में विज्ञान का कहना है कि जब भी कोई पेड़ अत्यधिक सूखे, पानी की कमी, या पर्यावरण के खतरे से गुजरता है, तो उसके भीतर अस्तित्व जिंदा रखने का हौसला जाग जाता है। पेड़ को लगता है कि वह मर सकता है, तब वह अपनी बची-खुची पूरी ऊर्जा नई पत्तियां उगाने के बजाय, फूल और फल (बीज) बनाने में झोंक देता है, ताकि उसकी नस्ल बची रहे। इसे विज्ञान ने स्टे्रस इंड्यूज्ड फ्लॉवरिंग भी कहते हैं। जामुन की जड़ें बहुत गहरी होती हैं, इसलिए जब भूजल स्तर गिरता है, तो जामुन का पेड़ इसे इंसानों से बहुत पहले भांप लेता है, और अपनी प्रतिक्रिया देता है। प्रकृति का इतिहास बताता है कि कुछ पौधों में अत्यधिक फल आने के बाद वे सचमुच मर जाते हैं, और इसलिए उनके फलने-फूलने को सुसाइड फ्रूटिंग भी कहते हैं। लेकिन जामुन का पेड़ बांस या ताड़ की कुछ प्रजातियों सरीखा नहीं रहता, इसलिए उसे सुसाइड फ्रूटिंग के बजाय इमरजेंसी फ्रूटिंग कहना बेहतर होगा।
हम विज्ञान को पूरी तरह जाने बिना सिर्फ सतही जानकारी को क्रॉसचेक करके इन बातों को लिख रहे हैं, क्योंकि हम कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने के बजाय उसे जलवायु परिवर्तन के व्यापक खतरे के साथ जोडक़र देखना चाहते हैं, देख रहे हैं। बदलते पर्यावरण को समझने के लिए प्रकृति की सामान्य समझबूझ की बातों पर एक नजर डाल रहे हैं। भारत में यह प्रचलित धारणा है कि जिस साल जामुन और आम में बम्पर क्रॉप आती है, उस साल कड़ी गर्मी और कम बारिश के आसार होते हैं। मौसम विभाग भी इस बार औसत से कम बारिश की भविष्यवाणी कर चुका है। जामुन के बारे में यह ‘वॉट्सऐप-वैज्ञानिक’ जानकारी तो बाद में आई है। विज्ञान की सामान्य जानकारी बताती है कि अत्यधिक गर्मी और पानी की प्रारंभिक कमी ही पेड़ों में स्ट्रेस हार्मोंस को सक्रिय करती है, जिससे फूलों की, यानी फलों, और बीजों की संख्या बढ़ जाती है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस साल जामुन का आकार कम है, लेकिन वह मीठा अधिक है। इस बारे में जांचने-परखने पर विज्ञान हमारी इस मामूली समझ को कुछ हद तक सही ठहराता है कि जब पेड़ों को पानी कम मिलता है, तो उनके फल अधिक मीठे होते हैं। हालांकि हमने यह पाया है कि कुओं के किनारे लगे हुए जाम या आम के पेड़ जो कि खूब सारा पानी पाते हैं, कम मीठे फल देते हैं। जो पेड़ सूखी जमीन के बीच में रहते हैं, उनके फल अधिक मीठे होते हैं। और इसकी सबसे बड़ी मिसाल रेगिस्तान में बिना एक बूंद पानी के तपने वाले खजूर के पेड़ होते हैं, जो कि दुनिया का सबसे मीठा फल देते हैं। खजूर उत्पादक देशों में एक समस्या बड़ी आम चर्चा में रहती है कि अगर फल पकने के समय बारिश हो जाए, या अत्यधिक सिंचाई हो जाए, तो फलों की मिठास घट सकती है, गुणवत्ता गिर सकती है, और फल फट भी सकते हैं। अब इस बरस भारत में अगर जामुन सचमुच ही अधिक मीठे हो गए हैं, और प्रकृति के इस संदेश को पढऩे वाले लोगों की वैज्ञानिक जानकारी सही है, तो यह गिरते हुए भूजल स्तर, और आने वाले सूखे मौसम के बीच का संदेश है। यह कैसी अजीब बात है कि पेड़ सूखकर खत्म हो जाने का खतरा भांपकर अपनी पूरी ताकत नए फूल और फल बनाने में लगा देते हैं, ताकि उनकी नस्ल चलती रहे। उन्हें नस्ल आगे बढ़ाने के लिए आईवीएफ सेंटरों की जरूरत नहीं पड़ती, न ही सरोगेसी की। वे इतने फल पैदा कर देते हैं कि जिन्हें जानवर और पशु-पक्षी खाकर पूरी तरह खत्म न कर सकें, और बचे हुए बीजों से पेड़ों की नस्ल आगे बढ़ जाए! आज दुनिया में कई देशों, और नस्लों के इंसानों की आबादी गिरती चल रही है। आबादी का संतुलन बनाए रखने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चों का औसत रहना चाहिए, और कई देश-प्रदेशों में यह औसत इससे बहुत नीचे गिर चुका है, अब देश और सरकारें फिक्रमंद हैं कि आबादी को लगातार गिरते चले जाने से कैसे रोकें? लेकिन पेड़-पौधे इंसानों के मुकाबले शायद अधिक समझदार रहते हैं, और इस बार जैसी कि जनचर्चा है, जामुन अपने पर आते खतरे की आशंका से अधिक फल-बीज उगाने में लग गया है!
हमें बार-बार लगता है कि इंसानों को नियमित रूप से कुछ वक्त प्रकृति के साथ गुजारना चाहिए, उससे बहुत कुछ सीखने मिलता है। एक वक्त था जब इंसान ने खेती सीखी, और उसमें अधिक मेहनत लगती थी, इसलिए उसे अधिक बच्चे पैदा करने की जरूरत भी लगती थी। कृषि अर्थव्यवस्था अधिक बच्चों पर टिकी हुई थी। अब जैसे-जैसे इसमें मशीनीकरण बढ़ते गया, पहले जानवरों का उपयोग हुआ, फिर ट्रैक्टरों का, और फिर हार्वेस्टर जैसी फसल कटाई की मशीन का, वैसे-वैसे इंसानों की जरूरत घटने लगी, और किसानों में बच्चों की संख्या भी कम होने लगी। एक वक्त अधिक बच्चों के अधिक हाथ अधिक उत्पादक थे, और फिर मशीनी-मजदूर मिल जाने से अब उन बच्चों के पेट अधिक खपत करने वाले हो गए! अब इंसानों ने प्रकृति से सीखा होगा, इंसानों के पास तो ऐसा कुछ है नहीं, जिससे कि जामुन, या दूसरे पेड़ कुछ सीख सकें।
फिलहाल तो लोगों को इस प्राकृतिक तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि कम पानी पर जिंदा रहने वाले, सूखा झेलने वाले पेड़ अमूमन अधिक मीठे फल देते हैं। इंसानों में भी जो अधिक अभाव में बड़े होते हैं, वे अधिक कामयाब भी होते हैं, और उनमें अपने ऐसे दौर की वजह से एक बुनियादी विनम्रता भी आ जाती है, जो कि व्यवहार की मिठास ही होती है। आज की यह बात प्रकृति, विज्ञान, और मानव स्वभाव के बीच भटकती हुई बात है, जो कि प्रकृति से मिलने वाले संकेतों से शुरू हुई है, और इंसानों की समझ पर जाकर खत्म होगी, या तो इंसान समझेंगे, या खत्म होंगे!


