संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट की इतनी तीखी आलोचना हाईकोर्ट शायद ही कभी करते होंगे, इसे पढ़ें...
सुनील कुमार ने लिखा है
06-Jun-2026 8:50 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट की इतनी तीखी आलोचना हाईकोर्ट शायद ही कभी करते होंगे, इसे पढ़ें...

हाईकोर्ट के कुछ जजों के निजी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, आदेशों, या फैसलों से उन जजों की असहमति का तो इतिहास रहा है, किसी-किसी जज ने कोई जवाबी टिप्पणी भी की हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तीखी आलोचना कोई हाईकोर्ट करे, ऐसा याद नहीं पड़ता है। और खासकर मद्रास हाईकोर्ट के जज ने अभी जो ताजा आलोचना की है वह तो कुछ ज्यादा ही गंभीर है। यह मामला एक विधानसभा चुनाव के बाद की चुनाव याचिका का था जिसमें कुल 49 वोटों से जीत हुई थी। हारने वाले ने जब चुनाव याचिका दायर की, तो 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने पुनर्गणना का आदेश दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नतीजा घोषित करने पर रोक लगा दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 6 साल से ज्यादा वक्त तक पड़े रहा। अभी 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील का निपटारा करते हुए कहा कि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इसलिए अब इस याचिका पर कोई फैसला करना निरर्थक होगा। सुप्रीम कोर्ट के दिए गए मतगणना पर स्थगन का फैसला खत्म हो जाने के बाद अब 3 जून 2026 को मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी.जयचंद्रन ने अंतिम फैसला सुनाया, और 2016 के चुनाव में जिस उम्मीदवार को मतगणना में 49 वोट से हारा घोषित किया गया था, उसे 103 वोटों से जीता हुआ घोषित किया। 2016 के चुनाव का नतीजा अब 10 बरस बाद 2026 में जाकर पलटा है, और 2016 से 2021 तक का कार्यकाल जिसने विधायक के रूप में पूरा कर लिया, अब उसकी हार की घोषणा से किसकी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है?

यह मामला बताता है कि देश में चुनाव याचिकाओं पर फैसले की जो रफ्तार है, उनके चलते हुए सबसे बड़ी हार तो उन मतदाताओं की होती है जिनके चुनाव क्षेत्र में गलत व्यक्ति की जीत घोषित हो जाती है, और कार्यकाल पूरा करने के बाद उसे अपात्र या हारा हुआ घोषित किया जाता है। यह कुछ उसी किस्म का मामला है कि किसी की मौत की 5वीं बरसी पर सरकारी अस्पताल से उसके इलाज के लिए दवाइयां जारी की जाएं। जस्टिस जी.जयचंद्रन ने इस मामले में लिखा कि जो कुछ हुआ उसे सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण कहना काफी नहीं है। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट को 6 साल बाद भी यह तय करना चाहिए था कि याचिका सही थी या नहीं, बजाय इसके कि चूंकि अब विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है, इस पर फैसला निरर्थक है कहने के। हाईकोर्ट जज ने याद दिलाया कि 2015 में उसने ही मोहम्मद अकबर और अशोक साहू के मामले में यह आदेश दिया था कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा तेजी से किया जाना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस अंदाज में इस मामले को बिना फैसला सुनाए खत्म कर दिया है, उसे हाईकोर्ट ने न्याय का गंभीर मजाक बताया है, और चेतावनी दी है कि अगर अदालतें अपने ही दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करती रहीं, तो देश तानाशाह देशों की राह पर जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि दस साल तक एक ऐसे व्यक्ति को विधायक के रूप में बिठाया गया जिसे बाद में अदालत ने गैर चुना हुआ पाया। मतदाताओं को दस साल एक प्रतिनिधि के साथ रहना पड़ा, जो वैध रूप से चुना ही नहीं गया था। हाईकोर्ट जज की टिप्पणी इस बात के लिए बड़ी गंभीर है कि उन्होंने यह आशंका जताई है कि यह देश उन कुछ देशों की तरह तानाशाही की तरफ जा सकता है जिन्होंने 75 साल पहले भारत के साथ आजादी पाई थी। हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून का भी जिक्र किया जिसमें याचिका का निपटारा 6 महीने के भीतर करने का प्रावधान है। जज ने लिखा कि इस प्रावधान को बहुत ही सहूलियत से अनदेखा (सुप्रीम कोर्ट द्वारा) किया गया। जज ने लिखा कि चुनाव विवादों में इतनी लंबी देरी लोकतंत्र को कमजोर करती है, और वयस्क मताधिकार की मूलभावना को नुकसान पहुंचाती है।

यह बड़ा ही दिलचस्प मामला है, जो कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की असहमति की वजह से देश में एक बार फिर चुनाव याचिकाओं में देरी के मुद्दे को चर्चा में ला सकता है। जमीन-जायदाद, या दूसरे कई किस्मों के मामलों से चुनाव याचिकाएं इस मायने में अलग रहती हैं कि जब ये चलती रहती हैं, तब विधानसभा, संसद, या किसी और सदन में उस सदस्य का कार्यकाल भी चलते रहता है। किसी सदस्य के कार्यकाल को चुनाव याचिका के चलते हुए रोका नहीं जा सकता। और सदन का ही कार्यकाल जब पूरा हो जाता है, तब उस मामले में जीते हुए सदस्य के खिलाफ अगर फैसला आता है, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? कार्यकाल तो निकल ही चुका रहता है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के विधायक मोहम्मद अकबर के मामले में यह आदेश दिया था कि चुुनाव याचिकाओं को तेजी से सुना जाए। और वही सुप्रीम कोर्ट, देश की सबसे बड़ी अदालत, खुद ही अपने दिए हुए एक स्थगन आदेश पर 6 बरस बैठी रही, और विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने का तर्क देते हुए उसने केस को बिना फैसला सुनाए खत्म कर दिया।

हाईकोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट की तरह संवैधानिक कोर्ट होता है। वह भी संविधान के प्रावधानों की व्याख्या कर सकता है। हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के ऊपर किसी तरह का अधिकार नहीं रखता, बल्कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपील का कोर्ट रहता है, और सुप्रीम कोर्ट के कुछ किस्म के आदेश हाईकोर्ट के लिए बंधनकारी भी रहते हैं। लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट के जज ने जिस अंदाज में सुप्रीम कोर्ट को आईना दिखाया है, वह बड़ा दिलचस्प है। और चूंकि यह एक संवैधानिक मुद्दा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट यह तर्क भी नहीं ले सकता कि हाईकोर्ट ने उसकी आलोचना की है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल देर लगाकर मामले को हाईकोर्ट को वापिस भेजा है, तब तक मतदाताओं के फैसले की मौत हो चुकी थी, तो श्रद्धांजलि सभा में हाईकोर्ट जज की कही हुई बातें सुप्रीम कोर्ट की आलोचना के बिना पूरी नहीं हो सकती थीं।

सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे ऐसे मामले रहते हैं जिनमें जज आपस में एक-दूसरे के गलत फैसलों पर टिप्पणी नहीं करते हैं। लोगों को याद होगा कि जब चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ उनकी एक मातहत कर्मचारी ने शोषण का आरोप लगाया था, तो देश की कानूनी व्यवस्था, और बिल्कुल मामूली समझ वाली नैतिकता, इन दोनों को पूरी तरह कुचलते हुए रंजन गोगोई ने इस मामले की सुनवाई में खुद बेंच में बैठना तय किया था, और उनके साथ दूसरे जज भी बैठ गए थे। हमारा मानना है कि उन दूसरे जजों को रंजन गोगोई के फैसले का विरोध करना था जिसमें आरोपी खुद ही अपना वकील बन बैठा है, और खुद ही जज बन बैठा है। ऐसी बेंच में बैठने से किसी भी दूसरे जज को साफ-साफ मना कर देना था, लेकिन हिन्दुस्तानी न्याय व्यवस्था की इस सबसे अश्लील बेशर्मी का न्यायपालिका में किसी ने विरोध नहीं किया था। हमने अपने इस कॉलम में, और अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर बार-बार रंजन गोगोई के गलत काम को गिनाया था, और दो बरस बाद जाकर जब गोगोई की अपनी आत्मकथा छपी, तो उसमें उन्होंने अपने बेंच में बैठने के फैसले को गलत माना था। तब तक, और उसके बाद भी उनके साथ बैठने वाले दूसरे जज, या जजों ने इस पर मुंह नहीं खोला था। इतने बड़े मामले पर जजों के चुप रह जाने से बेहतर यह है कि हाईकोर्ट का एक जज सुप्रीम कोर्ट के इस असाधारण, और बहुत ही गैरजिम्मेदार विलंब के लिए उसकी ऐसी खुली आलोचना करे। सुप्रीम कोर्ट ने 6 बरस इस मामले को लटकाकर न सिर्फ जीत के असली हकदार के हक कुचले, बल्कि उसने उस विधानसभा सीट के वोटरों से उनका जायज हक भी छीना। सैद्धांतिक मुद्दों पर असहमति इसी तरह सामने आनी चाहिए। जहां पर जायज असहमति पर रोक लगती है, वहां नाजायज फैसले, और नाजायज काम बढ़ते चलते हैं। हम देश के राजनीतिक दलों, और सरकारों में इस बात को रोज ही देखते हैं। कम से कम देश की न्यायपालिका को इससे बचना चाहिए, और मद्रास हाईकोर्ट के जज की ये टिप्पणियां बड़े हौसले की हैं, और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


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