संपादकीय
उत्तराखंड की एक खबर है कि घर में माँ के पकाए हुए खाने के टिफिन लोगों के घरों तक पहुंचाने वाली एक लडक़ी, मीनाक्षी ने उत्तराखंड पीएससी का इम्तिहान न सिर्फ पास किया है, बल्कि राज्य में ये पांचवें नंबर पर आई हैं, और डिप्टी कलेक्टर बनने जा रही हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा का यह पद राज्य की पीएससी में किसी भी प्रदेश में सबसे ऊपर माना जाता है। बहुत अभाव चाहे न सही, लेकिन संघर्ष की जिंदगी से गुजरते हुए मीनाक्षी जहां तक पहुंची है, वहां तक पहुंचने के लिए तमाम राज्यों में संपन्न परिवारों के बच्चे भी साल-दो साल लाखों रूपए की कोचिंग लेते हैं, और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य हो, तो पीएससी के चेयरमैन को आधा-एक करोड़ रूपए रिश्वत देकर परिवार के एक-दो लोगों को डिप्टी कलेक्टर बनवा लेते हैं। यह एक अलग बात है कि रिश्वत देने, लेने, और रिश्वत से चुने गए ये सारे लोग अब जेल में हैं। लेकिन हम आज की बात पीएससी के भ्रष्टाचार पर नहीं करना चाहते, बल्कि इस सकारात्मक पहलू की चर्चा करना चाहते हैं कि संघर्ष की आग से तपकर भी किस तरह खरा सोना सामने आता है। मीनाक्षी की बड़ी बहन अभी एक साल पहले ही इसी पीएससी इम्तिहान से सांख्यिकी अधिकारी बनी, और उसे देखकर मीनाक्षी ने भी तैयारी की, यूपीएससी का इम्तिहान भी दिया, जिसमें वह 5 नंबरों से चूक गई।
देश में हर बरस यूपीएससी इम्तिहान, या अलग-अलग प्रदेशों के सरकारी नौकरियों के बड़े इम्तिहानों के नतीजे आने पर यह पता चलता ही है कि कहीं किसी ऑटोरिक्शा ड्राइवर की बेटी ने कामयाबी पाई, तो कभी किसी मजदूर के बेटे ने। जो सामने तैरते हुए नाम हैं उनके मुताबिक महाराष्ट्र के जालना के अंसार शेख के पिता ऑटो चलाते थे, और माँ खेतों में काम करती थी। अपने कुनबे के पहले ग्रेजुएट अंसार ने रोज 12-13 घंटे पढ़ाई की, और पहली ही कोशिश में वे आईएएस बने। एक दूसरे गरीब छात्र हिमांशु गुप्ता स्कूल जाने के लिए रोज 70 किलोमीटर का सफर करते थे, पिता का हाथ बंटाने के लिए चाय की दुकान पर भी काम किया था, और यूपीएससी में तीसरी कोशिश में वे आईएएस बने। यूपी के पीलीभीत जिले के नुरूल हसन की पढ़ाई और कोचिंग के लिए उनके पिता ने अपनी जमीन तक बेच दी, और गरीबी से उठकर वे आईपीएस बने। इन इम्तिहानों से परे कई दूसरे किस्म की सफलता की कहानियां भी हैं। क्रिकेट सितारे एम.एस.धोनी के पिता एक पंप ऑपरेटर थे, लेकिन मेहनत और प्रतिभा ने साधारण परिवार के धोनी को भी आसमान तक पहुंचा दिया। कुछ ऐसा ही उत्तर-पूर्व की मीराबाई चानू का है, वे भी बिल्कुल साधारण परिवार से उठकर टोकियो ओलंपिक में रजत पदक तक पहुंचीं। एम.टी.आर. नाम का एक बड़ा फूड ब्रांड खड़ा करने वाले दक्षिण भारतीय भाईयों ने होटलों में वेटर का काम भी किया था, और वहां से आगे बढक़र उन्होंने यह कारोबारी सफलता पाई। क्रिकेट पर लौटें, तो भारतीय टीम में पहुंचे उमेश यादव के पिता कोयला खदान में काम करते थे, मुनाफ पटेल का परिवार भी बहुत गरीब था, भुवनेश्वर कुमार यूपी के मेरठ के एक गरीब परिवार थे, इरफान पठान और युसूफ पठान सूरत की एक मस्जिद में पले-बढ़े, और उनके पिता वहीं मस्जिद में नौकरी करते थे, रविन्द्र जडेजा के पिता एक निजी सुरक्षा कार्यालय में चौकीदार थे, यशस्वी जायसवाल ने मुम्बई के आजाद मैदान में टेंट में रहकर गुजारा किया, और पेट पालने के लिए गुपचुप भी बेचा, टी.नटराजन एक बिहारी पिता के बेटे थे, और माँ सडक़ किनारे खाना बेचती थी, सिमरन शेख मुम्बई के धारावी स्लम में रहने वाले एक वायरमैन की बेटी हैं जिन्हें महिला प्रीमियर लीग में भारी कीमत पर खरीदा गया है, नामी हो चुकी मुक्केबाज मैरीकॉम मणिपुर के एक गरीब किसान परिवार की हैं, और उनके पास ट्रेनिंग के लिए जूते तक नहीं थे, फिर भी वे छह बार विश्व मुक्केबाजी चैंपियन बनीं।
सफलता की इस तरह की कई कहानियां बताती हैं कि जो लोग संघर्ष करके आगे बढऩा चाहते हैं, उनकी राह के रोड़े उनके सफर को बहुत दूर तक नहीं रोक पाते। गरीबी, और अभाव के बीच से भी कम से कम कुछ लोग तो उबर पाते हैं, कामयाबी के आसमान तक पहुंच जाते हैं। हम सफलता की कहानियों की इस चकाचौंध में यह अनदेखा करना नहीं चाहते कि विपन्नता बहुत से लोगों को आगे बढऩे से रोकती है, बराबरी के मौके नहीं पाने देती है, और हमारे सामने सिर्फ कामयाबी की कहानियां अधिक आती हैं। लेकिन इतना तो तय है कि ऐसी कहानियों से उत्साह और हौसला लेकर संघर्षरत दूसरे बच्चे भी कुछ या अधिक हद तक तो आगे बढ़ ही सकते हैं। एक तरफ दुनिया में बहुत से बच्चे अपने हालात देखकर निराश हो जाते हैं, फिर हर इम्तिहान में भ्रष्टाचार की कहानियां पढक़र उन्हें लगता है कि मेहनत और तैयारी उन्हें किसी किनारे तक नहीं पहुंचा पाएंगी। लेकिन सफलता की राह ऐसी नौबतों के बीच से ही निकलती है। यह भी जरूरी नहीं है कि लोग आईएएस बन जाएं, डिप्टी कलेक्टर बन जाएं, या देश की तरफ से बनी किसी खेल-टीम में शामिल हो जाएं, तो ही वे कामयाब हैं। इनसे नीचे के भी बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जो गिने-चुने लोगों को ही हासिल होते हैं। पुलिस में सिपाही बनने के लिए, जंगल दफ्तर में वनरक्षक बनने के लिए, सरकारी स्कूल में शिक्षक बनने के लिए भी बड़ा संघर्ष होता है। और वहां पर कामयाबी के लिए बहुत सी तैयारी लगती है, और पक्का इरादा भी लगता है। अगर ये दो बातें लोगों के साथ हों, तो फिर वे अपनी ही तरह के दूसरे बहुत से अभावग्रस्त बच्चों के मुकाबले आगे बढ़ पाते हैं। दुनिया में मौके तो सीमित ही रहते हैं, उनके लिए असीमित दावेदारों में से बहुत से अनमने ढंग से तैयारी करते हैं, इस बात पर अधिक भरोसा करते हैं कि मुकाबला इम्तिहानों में कामयाबी तो माँ-बाप रिश्वत से ही खरीद पाते हैं। लेकिन सबसे भ्रष्ट इम्तिहानों में भी कुछ या कई सीटें जरूर बिकती होंगी, और कुछ या कई सीटें दूसरे बच्चों को ईमानदार मेहनत से भी मिलती होंगी। भ्रष्टाचार भी सौ फीसदी सीटों को नहीं बेच पाता होगा। खेल टीमों में चयन की बेईमानी भी कई बच्चों को बाहर रखती होगी, लेकिन जिनके पास चयन समिति के लिए न कोई सिफारिश रहती, न रिश्वत रहती, ऐसे लोग भी टीम में आ जाते हैं। भारत में क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर अपनी हजारों करोड़ की दौलत के साथ क्रिकेट चयन में कितना असर नहीं डाल सकते थे, लेकिन उनका बेटा कभी एकदम आगे नहीं पहुंच पाया। ऐसा ही हाल कुछ दूसरे बड़े-बड़े, ताकतवर और अतिसंपन्न खिलाडिय़ों के साथ भी हुआ कि वे अपने बच्चों को टीम में नहीं पहुंचा पाए।
इसलिए देश के अभावग्रस्त समाज के बच्चों को भी यह उम्मीद रखना चाहिए कि उनकी तरह के कमजोर हालात से भी कई बच्चे निकलकर जिंदगी के अलग-अलग दायरों में सुनहरी ऊंचाईयों तक पहुंचे रहते हैं। दूसरी तरफ अतिसंपन्न परिवारों के ऐसे बच्चे भी रहते हैं जिनके लिए खेल के निजी कोच रखे जाते हैं, जिनकी पढ़ाई की तैयारी के लिए सबसे महंगे यूपीएससी कोचिंग सेंटर को फीस दी जाती है, फिर भी वे मुकाबले में कई विपन्न बच्चों के मुकाबले पिछड़ जाते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार और बेईमानी की घटनाओं से हौसला छोडऩा नहीं चाहिए, यह देखना चाहिए कि ऐसे भ्रष्ट और बेईमान सिस्टम के भीतर से भी कुछ गरीब बच्चे अपनी प्रतिभा, और अपने दमखम से कामयाब होते ही रहते हैं। यह जरूर है कि भ्रष्ट व्यवस्था सबका हौसला पस्त कर देती है, लेकिन भारत जैसे लोकतंत्र में चयन और इम्तिहान को भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त कर पाना आसान नहीं है, और इसी लोकतंत्र में सांस लेते हुए बच्चे अपने फेंफड़ों में इतनी ऑक्सीजन भर सकते हैं कि वे नए रिकॉर्ड कायम कर सकें। जीवन में सफलता की सकारात्मक कहानियां सभी लोगों को अपने बच्चों को सुनानी चाहिए, और आगे भी बढ़ानी चाहिए।


