संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ट्रम्प पर नकेल लगाने के प्रस्ताव पर संसद में उसकी पार्टी के कुछ, विपक्ष के साथ
सुनील कुमार ने लिखा है
21-May-2026 6:20 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : ट्रम्प पर नकेल लगाने के प्रस्ताव पर संसद में उसकी पार्टी के कुछ, विपक्ष के साथ

अमरीकी संसद के उच्च सदन ने एक स्पष्ट बहुमत से उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है जिसका मकसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित करना है, और ईरान में अमरीकी फौजी कार्रवाई को बिना संसदीय मंजूरी के रोकना है। ट्रम्प ने जब इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, तो अमरीका की संसदीय-संवैधानिक भाषा के बीच से एक चोर दरवाजा ढूंढ निकाला था कि वह जंग नहीं थी, वह सिर्फ फौजी कार्रवाई थी। राष्ट्रपति अपने देश की हिफाजत के लिए, देश को बचाने के लिए फौजी कार्रवाई करने का अधिकार रखता है, लेकिन अगर उसे जंग में तब्दील करना हो, तो उसकी इजाजत, और उसके लिए बजट, दोनों ही संसद पास कर सकती है। ट्रम्प ने संसदीय अग्निपरीक्षा से गुजरे बिना यह जंग शुरू कर दी थी, और किसी पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत में जिरह के दौरान बच निकलने की भाषा का इस्तेमाल कर रहा था कि यह जंग नहीं है, सिर्फ फौजी कार्रवाई है। लेकिन अभी अमरीकी उच्च सदन, सीनेट ने 50-47 के बहुमत के मतदान से युद्ध-अधिकार प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है, जो कि ट्रम्प के इरादों के खिलाफ है, उस पर रोक लगाने की तरफ एक बड़ा कदम है। अमरीकी संसद के इस सदन में ट्रम्प की पार्टी का बहुमत है, लेकिन उसकी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने बगावत करके विपक्षी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। सदन के बाहर भी ट्रम्प की पार्टी के कई सांसद इस जंग, और अमरीका पर इसके असर को लेकर फिक्र जाहिर कर चुके थे, इसकी आलोचना कर चुके थे। लेकिन सदन के भीतर एक औपचारिक मतदान में ट्रम्प के इरादों को इस तरह खारिज करने के लिए अगर उसकी पार्टी के सांसदों ने बगावत की है, कुछ सांसद गैरमौजूद रहे, तो यह ट्रम्प के लिए एक बड़ा झटका है।

हमने अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था को पढक़र इस नौबत को समझने की कोशिश की। वॉर पावर्स एक्ट ऑफ 1973 को वियतनाम युद्ध के दौरान अमरीकी राष्ट्रपतियों की मनमानी को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके तहत बिना संसदीय मंजूरी या जंग की घोषणा के अमरीकी सेना 60 दिनों से अधिक समय तक किसी विदेशी शत्रुता में शामिल नहीं हो सकती। ऐसी समय सीमा पूरी हो जाने पर सेना को वापिस बुलाने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय राष्ट्रपति को मिलता है। अब ईरान युद्ध को 80 दिन से अधिक हो चुके हैं, इसलिए संसद का तर्क है कि ट्रम्प की यह जंग अब अमरीकी कानून और संविधान के तहत पूरी तरह गैरकानूनी हो चुकी है। अभी भी ट्रम्प के पास कुछ तानाशाह अधिकार बचे हुए हैं, और वह इस मौजूदा प्रस्ताव के पास हो जाने के बाद भी राष्ट्रपति का वीटो का इस्तेमाल कर सकता है, और इस वीटो को पलटने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। ट्रम्प के खिलाफ इतना बड़ा बहुमत चाहे न जुट सके, उसकी रिपब्लिकन पार्टी के किले की दीवारों में दरारें तो आ ही गई हैं। अमरीकी विश्लेषक कहते हैं कि जिस तानाशाही के साथ ट्रम्प अपनी पार्टी पर काबिज चले आ रहा है, और देश को हांक रहा है, उसके प्रति वह अंधी वफादारी अब धसक रही है। जंग की वजह से अमरीकी जनता जिस महंगाई से त्रस्त है, हर अमरीकी नागरिक पर जिस तरह इस जंग का बोझ पड़ रहा है, उसे देखते हुए रिपब्लिकन सांसदों और पार्टी को यह डर है कि अगर यह जंग लंबी खिंची, तो नवंबर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में पार्टी को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

जैसे पेशेवर मुजरिम अदालत में बचाव के तर्क ढूंढते हैं, ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि चूंकि ईरान के साथ एक युद्धविराम चल रहा है, इसलिए संसदीय अनुमति देना युद्ध की सीमा अब लागू नहीं हो रही, क्योंकि अभी युद्ध चल ही नहीं रहा है। लेकिन संसद में इस तर्क को खारिज कर दिया है, और उसका कहना है कि युद्धविराम के साए में जो फौजी तैयारियां चल रही हैं, जो फौजी प्रतिबंध लगे हुए हैं, वे युद्ध का ही हिस्सा हैं। आज अमरीका के भीतर के लोकतंत्रवादी लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि आंतरिक लोकतंत्र पर इतना अधिक जोर देने वाला यह देश किस तरह एक तानाशाह राष्ट्रपति की अकेले की सनक का शिकार हो गया है, और वह जहां चाहे वहां जंग छेड़ रहा है, हमले कर रहा है, हमलों की धमकी दे रहा है। ट्रम्प की ही पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने यह कहा है कि यह लड़ाई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच की नहीं है, यह लड़ाई संसद की सर्वोच्चता-सम्प्रभुता, और राष्ट्रपति की तानाशाही के बीच की लड़ाई है। अमरीकी लोकतंत्र में आज की नौबत चेक एंड बैलेंस की मानी जा रही है कि जब राष्ट्रपति बेलगाम होने लगे, तो संसद को अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ती है।

 

अमरीका में निर्वाचित राष्ट्रपति की इस तानाशाह-मनमानी को लेकर अब संसद में जो चल रहा है, वह बहुत दिलचस्प है। दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ऐसी घटनाएं, और ऐसे मामले बाकी देशों के लिए भी एक सबक बनते हैं। अमरीकी संसद में अलग-अलग सांसदों ने इस नौबत पर काफी कुछ कहा, और डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सांसद ने कहा कि ट्रम्प द्वारा अपनी मर्जी से शुरू किए गए इस बेहद अलोकप्रिय युद्ध ने अमरीकी जनता पर बहुत भारी बोझ डाला है। संसद के पास इस नासमझीभरे संघर्ष पर ब्रेक लगाने की ताकत है, और आज इस उच्च सदन को राष्ट्रपति से साफ कहना चाहिए कि वह इस विनाशकारी युद्ध को तुरंत रोके। एक दूसरे सांसद ने कहा-डेमोक्रेट्स अब ट्रम्प के अवैध युद्ध पर रिपब्लिकन की चुप्पी की दीवार को तोड़ रहे हैं। पिछले 80 से अधिक दिनों से ट्रम्प ने बिना किसी योजना, बिना किसी साफ मकसद, और बिना किसी कानूनी अधिकार के अमरीका को इस महंगे और अराजक संघर्ष में झोंक रखा है। आज के वोट ने साबित कर दिया है कि हमारा दबाव काम कर रहा है, और रिपब्लिकन का किला अब धसक रहा है।

अमरीकी संविधान के मुताबिक बजट जारी करने का अधिकार केवल संसद के पास है, और अगर उच्च सदन के बाद यह वॉर पावर्स रिजोल्यूशन निचले सदन से भी पास हो जाता है, तो यह राष्ट्रपति के लिए ईरान में फंड इस्तेमाल करने को कानूनी रूप से रोक देगा। लेकिन अमरीकी संविधान में राष्ट्रपति का वीटो इसके बाद भी काम आ सकेगा, और उस नौबत में संसद के भीतर किस तरह दोतिहाई बहुमत ट्रम्प के खिलाफ जुटेगा, इसकी अभी कल्पना नहीं की जा सकती। संसद के इस कड़े रूख का असर दिखने लगा है, और ट्रम्प ने संसद में वोटिंग के ठीक पहले ईरान पर हमले की तय की जा चुकी घोषणाओं को टाल दिया है। यह पूरी नौबत राजनीति शास्त्र, शासन व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संबंध, और संसदीय व्यवस्था में दिलचस्पी रखने वालों के लिए बड़ी बारीकी से देखने का मौका है। हम तो अपने आम पाठकों के लिए बहुत मामूली जुबान में इस पूरे मुद्दे की एक सरल व्याख्या ही यहां पर कर रहे हैं, इतना जरूर है कि यह करते हुए हम किसी चूक से बचने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में अमरीका के भीतर का माहौल किस तरह ट्रम्प की नाक में नकेल डालेगा, यह देखना होगा।  

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