संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बंगाल में पार्टियां तोहमत लगाने के साथ-साथ मोदी से कुछ सीख भी सकती थीं
सुनील कुमार ने लिखा है
05-May-2026 6:18 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बंगाल में पार्टियां तोहमत लगाने के साथ-साथ मोदी से कुछ सीख भी सकती थीं

पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का विश्लेषण को अधिक जानकार लोग बेहतर तरीके से कर सकेंगे, लेकिन हम उन कुछ मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जो सोशल मीडिया पर बड़ी तल्खी से उठाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में मतदाता पुनरीक्षण से लेकर दूसरे कई मुद्दों तक जो रूख दिखाया, उसे लेकर लोग उन्हें भाजपा गठबंधन में शामिल गिन रहे थे। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या पूरी की पूरी केन्द्र सरकार का किसी राज्य में जाकर अपने-आपको इस तरह झोंक देना चाहिए? कई और सवाल भी उठ सकते हैं, लेकिन किसी लोकतंत्र में अगर चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में काफी बहस हो चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट किसी बात को रोकने लायक नहीं पा रहा है, तो यह बहस चुनावी बहस नहीं रह जाती, यह देश की एक लोकतांत्रिक-संवैधानिक बहस जरूर हो सकती है कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था का रूख सत्ता की राजनीति का साथ देने वाला किस हद तक हो सकता है? लेकिन वह बहस चुनाव के बीच में किसी काम की नहीं है। वह बहस उस समय भी गैरजरूरी हो जाती है जब राजनीतिक दल चुनाव लडऩा तय करते हैं, शुरू कर देते हैं, जीत के दावे भी करते हैं, तब उनकी आशंका का वजन कुछ कम हो जाता है। हम उनकी आशंकाओं को सही या गलत ठहराने के चक्कर में नहीं पड़ रहे, किसी भी लोकतंत्र में किसी बात को साबित करने की एक प्रक्रिया होती है, अगर वह प्रक्रिया संभव नहीं है, तो फिर जो मौजूदा लोकतंत्र है, जनता बस उसी की हकदार रहती है। यह बात सिर्फ भारतीय संदर्भ में नहीं है, पूरी दुनिया के लिए यही कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जिसके कि वे हकदार होते हैं। हम सरकार से भी थोड़ा सा आगे जाकर इसे पूरे लोकतंत्र तक ले जाते हैं। चुनाव आयोग हो, या सुप्रीम कोर्ट, या दूसरी संवैधानिक संस्थाएं, या जांच एजेंसियां, ये सब जनता को उसकी चुनी हुई सरकार के माध्यम से ही नसीब होने वाली चीजें हैं। अगर किसी को यह खुशफहमी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने में, और उसके भी पहले हाईकोर्ट के जज बनने में सरकार का कोई दखल नहीं रहता, तो उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाज नहीं है। ऐसे में देश या प्रदेश के वोटरों का बहुमत जिसे चुनता है, उसे अपने हिसाब से बहुत कुछ करने का हक, या कम से कम मौका मिल जाता है, यह देखना हो तो महज भारत की तरफ देखने की जरूरत नहीं है, अमरीका की तरफ भी देखा जा सकता है, जो कि आज दुनिया की सबसे जलती-सुलगती मिसाल है।

लेकिन हम इन मुद्दों को यहीं पर छोडक़र कुछ आगे बढऩा चाहते हैं। ये चुनाव थे तो पांच राज्यों में, लेकिन असल चुनाव तो बंगाल में ही होते दिख रहा था। असम में भी विपक्ष मैदान में था, लेकिन वहां कोई टक्कर सुनाई नहीं पड़ती थी। केरल में टक्कर थी, लेकिन वहां भाजपा मैदान में नहीं थी, वहां वामपंथी गठबंधन, और कांग्रेस का गठबंधन आमने-सामने थे, और बाकी हिन्दुस्तान, खासकर हिन्दी-हिन्दुस्तान की दिलचस्पी केरल में कम थी। इसलिए भी कम थी कि केरल और तमिलनाडु में भाजपा मैदान में नहीं थी। उसके इक्का-दुक्का उम्मीदवार कहीं से विधायक बन जाएं, तो वह अलग बात थी, भाजपा जहां टक्कर दे सकती थी, वह सिर्फ बंगाल था। और बंगाल का चुनावी संघर्ष देश भर की दिलचस्पी का मुद्दा इसलिए भी था कि भाजपा एक नई जमीन पर सरकार बनाने का दावा कर रही थी, उसके लिए अपने अस्तित्व की सबसे कड़ी, और सबसे बड़ी लड़ाई भी लड़ रही थी। फिर यह भी है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का यह संघर्ष सिर्फ चुनाव का नहीं था, सिर्फ इसी चुनाव का नहीं था, पिछले चुनाव में भी भाजपा ने पूरा दम-खम लगाया था, और कांग्रेस और वामपंथियों को विधानसभा से बाहर करके खुद अकेले विपक्षी दल बनने तक तो पहुंची ही थी। अब उसे इस आखिरी मील का सफर और तय करना था, जो पूरी तरह, और बुरी तरह अनिश्चितता से भरा हुआ था। लोग आखिरी दिन तक पूछते थे कि बंगाल में क्या होगा? और इसका पुख्ता जवाब अधिकतर लोगों के पास नहीं था। चुनावी मैदान में मोदी और ममता की पार्टियों के अलावा चुनाव आयोग भी एक बड़ा खिलाड़ी था, और उस खिलाड़ी को पानी पिलाता हुआ सुप्रीम कोर्ट भी था। इसलिए लोगों की आशंकाएं थीं कि ये सब मिलकर ममता को हरा ही देंगे, या इन सबके बावजूद ममता जीत जाएगी? यह मुद्दा रह ही नहीं गया था कि इतने बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी चुनावी-राजनीतिक जुबान में एंटी इन्कमबेंसी का शिकार भी हो सकती हैं, चर्चा बस यही रहती थी कि क्या ममता चुनाव आयोग से ज्यादा वोट पा सकेंगी? हम केवल चर्चा की बात कर रहे हैं, अपनी कोई राय नहीं रख रहे, जबकि 2011 से 2026 तक, लगातार तीन बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी से वोटरों की कुछ स्वाभाविक नाराजगी भी हो सकती है, क्योंकि बंगाल के वोटर देश के अधिकतर राज्यों के मुकाबले राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक माने जाते हैं।

 

जब हम अब तक की चर्चा के किसी मुद्दे पर अपनी राय नहीं रख रहे, तो फिर हम आज यहां इस मुद्दे पर लिख क्यों रहे हैं? इसका जवाब आसान नहीं है। देश में मोदी के पहले भी दूसरी सरकारें रहते आई हैं, भाजपा के अलावा दूसरी पार्टियां या उनके गठबंधन देश पर राज कर चुके हैं। लेकिन मोदी की अगुवाई में भाजपा देश में चुनावों को जिस तरह से लड़ रही है, उसे देखकर बाकी पार्टियों को भी कम से कम कुछ बातें तो सीखनी चाहिए। हम मोदी या भाजपा की हर बात को जायज ठहराते हुए उनकी हर बात को सीखने की सलाह नहीं दे रहे, लेकिन किसी भी चुनाव को कितनी गंभीरता से लिया जाए, उसकी कितनी तैयारी की जाए, बाकी प्रदेशों से अपनी पार्टी के लोगों को किस तरह चुनावी राज्य में झोंका जाए, किस तरह के चुनावी मुद्दे उठाए जाएं, किस तरह उत्तर भारत, और हिन्दी भारत का वैष्णवी-सनातनी रूख बंगाल में छोडक़र वहां अपने नेताओं को मछली और मांस खाते हुए फोटो खिंचवाने में झोंका जाए, यह बात दूसरी पार्टियों को भाजपा से सीखना चाहिए। न तो दूसरे प्रदेशों से रेलगाडिय़ों में वोटरों को अपने प्रदेश भेजने में कुछ नाजायज है, न ही बाकी देश से अपने कार्यकर्ताओं को किसी प्रदेश भेजने में। अगर बाकी देश से बंगाल के, और बंगाली लोग अपने-अपने रिश्तेदारों को बंगाल चिट्ठियां भेजते हैं, तो यह काम तो बाकी पार्टियां भी कर सकती थीं, लेकिन अनमने ढंग से चुनाव लडऩे वाले न वामपंथियों को इसकी परवाह थी, न कांग्रेसियों को। जिस तरह देश के किसी भी मतदान के दिन नरेन्द्र मोदी भारत, बांग्लादेश, या नेपाल के किसी हिन्दू तीर्थ में जाकर पूरा दिन गुजारते हैं, और टेलीविजन पर दिन भर वे पूजा-पाठ की पोशाक में दिखते हैं, उस पर भी चुनाव आयोग की कोई रोक लागू नहीं होती। अब अगर ऐसी चुनावी रणनीति भाजपा लगातार इस्तेमाल करती है, और दूसरी पार्टियां न इससे कुछ सीखती हैं, और न ही इसका कोई विकल्प ढूंढ पाती हैं, तो ऐसी पार्टियों के हिस्से की मेहनत की उम्मीद तो मोदी से नहीं करनी चाहिए।

अपने हाथ में झालमुड़ी का ठोंगा हो, या अपनी पार्टी के नेताओं के हाथों में मछलियां हों, मांसाहार की प्लेट हो, मोदी की पार्टी ने बंगाल चुनाव में अनगिनत जायज तरीके भी इस्तेमाल किए हैं, जिनकी काट ढूंढने की कोशिश किसी और ने नहीं की। यह बात सिर्फ बंगाल में नहीं है, जहां कहीं भाजपा सरकार बनाने की हालत में थी, वहां कई जगहों पर उसने पूरा दम-खम लगाया, लेकिन पार्टटाईम चुनावी राजनीति करने वाली दूसरी पार्टियों, और दूसरे नेताओं ने इससे कुछ नहीं सीखा। अब अगर जायज तरीकों को भी टक्कर देने की कोशिश न हो, उसकी समझ न हो, तो नाजायज तरीकों के आरोपों पर क्या ही चर्चा की जाए? लोकतंत्र में सरकार या संसद के खिलाफ, चुनाव आयोग या किसी दूसरी संवैधानिक संस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ही एक आखिरी ठौर रहता है, अब अगर लोग उसके रूख और फैसलों से असहमत रहते हैं, तो उनके पास सर्वोच्च न्यायालय के रूख को बदलने के लिए देश में लोकतांत्रिक फेरबदल लाने का एक बहुत ही धीमा, और लंबा सफर रह जाता है। भारत में आज विपक्ष में जो पार्टियां हैं, उन पार्टियों को मोदी और भाजपा की चुनावी-खूबियों, और अपनी कमजोरियों, और खामियों के बारे में सोचना चाहिए, कुछ आत्ममंथन करना चाहिए। तीन-तीन कार्यकाल के बाद ममता जिस तरह से निपटी है, हो सकता है कि तृणमूल कांग्रेस, या दूसरी विपक्षी पार्टियां कुछ अधिक मेहनत करतीं, तो चुनाव आयोग की वजह से आया फर्क भी कुछ घट पाता। लोकतंत्र में तोहमत लगाने के साथ-साथ जहमत भी उठानी पड़ती है। 

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